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उपयोगितावाद...🦋

  मैं अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार व्यक्तियों में से एक हूं इसलिए उतनी ही व्यर्थ,अनुपयोगी और बेकार।यह एक आधार वाक्य से निगमित निष्कर्ष है जिसे अव्यवहित अनुमान कहते हैं। सरल शब्दों में तत्काल निकाला गया निष्कर्ष है जबकि पास में केवल एक आधार वाक्य हो। किंतु यह निष्कर्ष सत्य माना जा सकता है क्योंकि आधार वाक्य से यह अनिवार्यत: निगमित होता है।इसको एक दूसरे तरीके से भी जांच कर सकते हैं कि निष्कर्ष के विरोधी वाक्य का आधार वाक्य से व्याघात संबंध है और व्याघात संबंध में दो तर्कवाक्यों में कोई एक ही सत्य हो सकता है। अतः यदि न्याय वाक्य के नियमों से भी उपरोक्त बातों को जांचे तो यह सत्य ही बैठता है। इस प्रकार आकारिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार से इसकी सत्यता सिद्ध है। बहरहाल, मैंने जब-जब चाहा उपयोगी होना एक रंग उड़ गया मेरी आत्मा का,वह कुछ उद्धक लगने लगा।घबराकर मैंने आत्मा का रंग बचाना चाहा किंतु तब समय ने मुझे अनुपयोगी घोषित करने में देरी न की। अपने आत्मा के रंगों को लिए मैं दरकिनार की जाती रही, दरकिनार होती ही गई। दुनिया क्षणभर मेरी आत्मा के रंग को,उसकी सुंदरता को रूककर देखती,सराहती किंतु यह जान...
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पीड़ाएं और एकांत... 🍁

 एक अरसे से मेरे दो ही मित्र रहें हैं। एक बीते समय की स्मृतियों से उपजी पीड़ाएं और दूजा इन स्मृतियों में लिपटा मेरा एकांत।यद्यपि समय क्या है,ये मुझे कभी स्पष्ट नहीं हुआ।विज्ञान की विद्यार्थी रहती तो संभवतः कुछ स्पष्ट होता!दर्शन ने तो समय की अवधारणा को अंततः परमअनुभूति के हवाले छोड़ रखा है किंतु उतनी साधना का साहस अबतक मुझमें नहीं।तब जब समय की अवधारणा ही स्पष्ट नहीं तब क्या बीता हुआ! क्या आने वाला और क्या वर्तमान! वैसे भी बहुधा हम वर्तमान में जीने के आदी भी नहीं होतें। वर्तमान अद्वैत के माया जैसी है जो ‘है’ किंतु हाथ नहीं आती।  हां, पीड़ा और एकांत की अवधारणा मेरे लिए स्पष्ट है। एक ओर ये स्मृतियों में लिपटी पीड़ाएं मेरी देह पर बढ़ई के रन्दे की तरह चलती है तो दूसरी ओर सीने में पीड़ाओं की जलती अखंड भट्टी में मेरी स्मृतियां पक-पक कर मेरा एकांत बुनती हैं जिसमें रहती है अनंत तक फैली उदासी! जैसे ईश्वर के हाथों से छूट गई हो आधी-अधूरी बनी दुनिया और वह बैठा हो इस दुख में उदास कि अब यह दुनिया हाथ न आएगी,यह तो छूट गई… मेरे जीवन में पहले जब भी खुशियां आती, मैं उन्हें कसकर गले लगाती कि उन्हें ...

पुस्तकें...

बचपन में मेरी और दूसरों की भी मेरे बारे में यह भावना थी कि मुझमें कुछ कम बुद्धि है।मुझे भी अपनी बुद्धि कुछ मंद ही लगती।कई बार मुझे समझ नहीं आता था फलां स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए था!लोगों की मुझसे जो अपेक्षाएं होती थीं मैं समझ न पाती थी बहुधा।जब कोई कुछ पूछता तो मुझे स्पष्ट नहीं रहता था क्या कहना है अथवा क्या उत्तर देना है।कई बार जब उत्तर देने या कुछ कहने की कोशिश की भी तो वह बहुत अस्पष्ट और उस उत्तर से दूसरों को मेरे बारे में कम बुद्धि की सोच को बल ही मिलता था।चार लोगों के बीच जाने में मेरे हाथ-पांव फूलने लगते थें।भीड़ मेरे आत्मविश्वास को रसातल में ले जाती थी।जब बचपन में कोई मज़ाक उड़ाता तो आंखें नम हो जाती थीं।कोई प्यार से बोलता तो भी आंखें नम हो जाती थीं। गांव-जवार का कोई रिश्तेदार घरपर आता तो मां से कहता कि 'तोहार दूसर लईकन जइसे अन्नू ना हईन।एनपर धियान दा'।मेरे अत्यंत दुबले होने का भी मज़ाक उड़ाया जाता या मुझपे दया दिखाई जाती।जो मुझे कुछ रोष से भर देता और मुझे स्वयं पर दया आने लगती।कुल मिलाकर ऐसा लगता,'ये दुनिया,ये महफ़िल मेरे काम की नहीं'।आभास होता कि कहीं किस...

देवभूमि_उत्तराखंड 🏞️

इस बरस जब इन पहाड़ों पर जाना हुआ तब धूप अब अपने कोमल रूप में आ गई थी और इस कोमलता ने मन की कठोरता को हर लिया था।देवभूमि के पहाड़ों-झरनों और पांत में खड़े देवदार और चीड़ के वृक्षों से मिलकर ऐसा लगता है जैसे मन के भीतर का ख़ाली कटोरा लबालब हो गया हो किसी जादुई चीज़ से।ऐसा खाली कटोरा जिसे अपने भीतर लिए हर रोज़ घूमा करती हूँ बेचैन-व्याकुल। और मेरी सब बेचैनी -व्याकुलता,सब चिंताएं,मेरे मन के सब कलुष,मेरी ईष्याएं कपूर की मानिंद उड़ जाती है देवभूमि के स्पर्श मात्र से और आत्मा ऐसे धूल कर स्वच्छ हो जाती है जैसे कभी मलिन हुई ही नहीं थी। ऐसा अनुपम सौंदर्य इस स्थल का जिसको व्यक्त करने हेतु मेरे पास वैसी भाषा नहीं है।कठोर उदासी ओढ़े अपने एकांत से घिरा हर पहाड़ साधना में रत कोई साधु जैसे दिखता है।हरे रंग को भी जो लज्जा में डाल दें ऐसी हरितिमा युक्त अरण्य।कहीं पहाड़ों का सीना छलनी करते हुए तीव्र रूप में बहते झरने हैं तो कहीं पतली-दुबली काया वाले झरने।यही हाल पहाड़ी नदियों का है।कहीं इतनी कोमल,इतनी दुबली जैसे अब अगली बार आने पर ये अदृश्य हो जावेंगी अथवा छू लेने भर से मुरझा जायेंगी!कहीं कल-कल करती इतने ...

बरेली

 वर्ष 2011 - 12 की बात है;तब संघर्ष के दिन अपने पूरे यौवन पर थें।उन्हीं दिनों में बहन के घर से (बहेड़ी) जो उन दिनों डेरा था मेरा, से कार्यस्थल (बरेली) तक (जिसकी दूरी करीब पैंतीस किमी थी) रोज़ आना-जाना होता था।यात्रा का साधन कभी बस और अधिकतर रेलगाड़ी होती थी बहेड़ी से बरेली तक की रेलगाड़ी की यात्रा में करीब छोटे-छोटे सात-आठ स्टेशन पड़ते थें।किंतु मुझे उनमें बस एक ही नाम स्मृति में रहा,इज्ज़तनगर। स्मरण रहे जाने के दो कारण थें -एक तो नाम में ही जिसके इज्ज़त हो,उसे न याद रखना एक तरह से विश्वासघात ही होता अपने अतीत से और दूसरे इस स्टेशन या कहें छोटे से स्थान का स्थानीय लोगों द्वारा उच्चारण।वे इसे ऐजेडनगर कहकर बुलाते।अब भी बुलाते हैं,नहीं पता।मैं घर आकर अक्सर इस बात की खीझ बहन के सामने उतारती कि अच्छे भले नाम को लोग क्यों बिगाड़ते हैं!खैर, उन दिनों इस स्टेशन की हालत मुझ जैसी ही थी!समय का तंगहाल दौर!कमतरी के दोपहर,विषाद में डूबीं रातें,पीड़ाओं में आकंठ डूबा देह और मन।दोनों के बेतहाशा तपने के दिन थें। मौसम कौन सा रहे,इससे अंतर नहीं था। उन्हीं दिनों,घर से कार्यस्थल जाते समय ट्रेन में जब कभ...

जीवन की विधा

 कला(Arts) और मानविकी(Humanities) विषयों के छात्रों को तीन बातों में पारंगत होना चाहिए।(यूं तो प्रत्येक व्यक्ति को इन तीन बातों में कुशल होना चाहिए।) (1) लेखन (2) वक्तृत्व कला या बोलने की कला(3) आलोचनात्मक पाठ। उपरोक्त तीन में से दो में तो कुशल होना ही चाहिए। किंतु प्रश्न उठता है कि ये हम सीखें कैसे? यद्यपि आज तमाम तरह के कोर्स उपरोक्त तीनों विधा पर आधारित उपलब्ध हैं।नई शिक्षा नीति में तो इनपर आधारित कोर्स अब स्नातक के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं।मैं जब उन कोर्सेज के नाम देखती हूं तो थोड़ा अफसोस होता है कि हमारे ज़माने में ऐसा क्यों न था!उस समय कुछ पर्सनालिटी डेवलपमेंट के कोर्स होते थें किंतु जहां तक स्मरण आता है, उसके लिए अलग से कोर्स करना पड़ता था।वह सामान्य पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं ही होता था।तिसपर जिसकी फीस भरना हम जैसे मध्यमवर्ग के विद्यार्थियों के लिए संभव नहीं था।खैर, ऊपर उल्लिखित कला से संबंधित एक पाठ्यक्रम का उदाहरण यहां दे रहीं हूं,जैसे - पटकथा लेखन,अंग्रेजी में creative writing.इसके अतिरिक्त अन्य भी उपरोक्त शैलियों पर आधारित कोर्सेज हैं।मैंने उदाहरण के लिए केवल एक नाम दिय...

समय से छले गए हमलोग...

बहन-बेटियों के लिए मायके की धूल भी स्वर्ण जैसे प्यारी होती है।फिर मायके में कोई दुखद घटना घट जाए और पता भी न चले तो ह्रदय धक् से दुख के गहनतम तल पर जा धंसता है।या कोई अच्छी बात घटे तो उसे सुनकर प्रसन्न होती हैं किंतु इस प्रसन्नता में एक दबी सी आह छिपी होती है कि वे क्यों न सम्मिलित हो पाईं उस सुख या दुख में।उस दुख को बांटने या कहें कि उससे निकलने के लिए और वर्तमान में आने के लिए बहनें जो अलग-अलग देश में ब्याह दी गई हैं,एक-दूसरे से बातें करती हैं,पुराने दिनों को याद कर कभी रोती,कभी हंसती हैं।लेकिन इन तमाम बातों के बीच भी यह बात उन्हें अधिक सालती है कि फलाने आजी-बाबा,फलाने भैय्या-भौजी (और तमाम इस तरह के रिश्ते) अब नहीं रहें और यह खबर बेटियों तक देर से पहुंची।बेटियां सच में एकदिन इतनी परायी हो जाती हैं कि घरवाले गाॅंव-जवार की खबर देना भी बेटियों को आवश्यक नहीं समझतें। एक समय बाद वह घर जहां जन्म लियें,वह‌ गाॅंव,गाॅंव के लोग जिनके बीच पलकर बड़े हुए,रोते-रोते जिनसे यह कह कर विदा ली कि अब हंसते रहेंगे और अब जब अरसा बीत गया मायके गये तो जाने पर उनमें से कुछ से भेंट होगी,न होगी,कौन जाने! बहरहाल...

19/06/2025

मां जब बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि फिर पहले जैसी न हुईं,उन्हीं दिनों की बात है जब देह में एक अनजाने रोग ने दस्तक दी।दस्तक ही इतनी जोरदार थी कि लगा आगे क्या होगा।इन भय से भरे दिन में जब मां से मिलने गई किंतु बता न सकी कि मैं कितने दर्द में हूं,तभी कि बात है। बीमारी से पहले मां को न रोग बताने पड़ते थें न पीड़ाओं की गहराई,चाहे वह देह पर लगी हो या मन पर।न जाने कौन सी पढ़ाई उसने कहां से की थी कि कुछ कहना नहीं पड़ता था गो वह जानती थी कि मुझे शायद कहने नहीं आता या कहूंगी नहीं। तब दर्द से रातभर जगने के कारण अगली सुबह जब शरीर के कुछ कदम चलने में भी सहयोग देने से मना करने पर मां के बगल में लेटी।तब स्वयं पर जीवन में पहली बार दया आई।मन इस वेदना से मनो भारी हो गया कि अब दर्द को बिना कहे कोई समझने वाला नहीं है।अब बीमार पड़ने पर कोई दौड़-दौड़कर दवा लाने वाला नहीं है। वह पहली बार था जब बीमार पड़ने पर स्वयं पर रोना आया।अब भी बीमार पड़ती हूं,बीमारी में रोना आता है किंतु अब खुद पर उस दिन जैसी दया नहीं आती।अब कहने का सहूर भी आ गया है।यह न कहना भी कृतघ्नता होगी कि जीवन के सामाजिक दायरे ने ऐसा खुशनुमा विस्तार...

मेरा ह्रदय...💙

 ह्रदय के भीतर एक पहाड़ है रूखेपन का।करीब से जानने वाले अक्सर उस रूखेपन के पहाड़ से टकराते हैं।उस पहाड़ के पार एक नदी बहती है जिसका उद्गम स्रोत जाने किस पूर्वजन्म में है।जातिस्मरता की कुंजी गहन साधना के पास है। किंतु जो मुझसे दूर,बहुत दूर है। नदी में एक कंकड़ के जैसे कोई छल,कोई दुख,कोई चोट आ गिरता है और लहरें फैलती जाती हैं नदी की देह पर।वैसे ही कितने दुख,कितने चोट,कितने छल लहर उठाती है मन में। कौन जाने किस चोट पर कौन सा पुराना दर्द उभरता है।पता भी नहीं चलता कि किस दुख पर पहाड़ जैसा ह्रदय कहीं जरा सा नमी पा गया था।मन से अस्पर्श योग सधता नहीं है और अमनी भाव का सरल सूत्र देने को कोई गुरु मिलता नहीं। पहाड़ जरा सा कहीं दरकता है,कोई पत्थर कहीं से स्खलित होता है।किंतु वह वहां नहीं गिरता कि नदी के स्रोत का मुख बंद कर दें!वह नदी में जाकर गहरे धंसता है और नदी मसक उठती है। इधर नौतपा चल रहा है।कहते हैं सूर्य इन दिनों अपने सबसे पराक्रमी रूप में रहता है। किंतु सूर्य का पराक्रम कुछ कम हो गया है मानो।रोहिणी का सूर्य कमजोर पड़ गया है जरा सा!तप खंडित हुआ मार्तण्ड देव का जरा सा!और मैं भी इधर जीवन के...

रो-को

 रोहित शर्मा और विराट कोहली ने टेस्ट क्रिकेट से विदा ले ली।विदाई का अंदाज कह सकते हैं चुपके से था,अचानक था।ऑफफील्ड था।यह कुछ ऐसा है कि गहरी चोट लगी हो किंतु जिसका दर्द उभरेगा धीरे-धीरे,जब इन दोनों के बगैर भारतीय टीम सफेद बाॅल से क्रिकेट खेलने मैदान में उतरेगी। यूं तो इनके संन्यास की सुगबुगाहट बहुत दिनों से चल रही थी किंतु विराट की रन बनाने की जिद और रोहित के औरा के कारण यह कयास मैंने लगाया था कि सचिन तेंदुलकर के बाद एक शानदार विदाई कार्यक्रम द्वारा इन दोनों को विदा किया जाएगा। मैं सोच रही थी कि मैं जो हर जगह एक प्रोफेशनलिज्म की हिमायत करती हूं,जब इन दोनों ने इस तरह संन्यास की घोषणा कर ही दी तो क्या बुरा किया! किंतु एक व्यक्ति जब अपने क्षेत्र में कुछ योगदान करता है तब वह इतनी आस पालता है कि उसे उसके साथ के लोग ठीक से अलविदा कहेंगे।उसे ठीक से अलविदा कहने का अवसर देंगे!मनुष्यों के मूलभूत अधिकारों में एक अधिकार क्या यह नहीं होना चाहिए कि उसे ठीक से अलविदा कहने का अवसर दिया जाए!और मनुष्यों के मूलभूत कर्तव्यों में एक कर्तव्य यह भी हो कि वह अपने साथ कार्य कर रहे लोगों को ठीक से विदा करें!...

गर्मियों के दिन...

गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।कुछ शहरों के हाल तनिक भिन्न हो सकते हैं किंतु एक सामान्य रूप से बात यही है कि गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।हालांकि ठीक-ठीक इस मौसम को नाम देने का प्रयास करें तो कह सकते हैं कि यह मौसम के संधिकाल का समय है।यह प्रवेश द्वार है गर्मियों का।अब यहां से दिनमान और लंबे होते जायेंगे,दुपहरिया अब तपेंगी,शामें बच्चों की भिन्न तरह की क्रीड़ाओं से और रात्रि चहल-पहल से भरे होंगे। वह सूरज़ जिसके भाव बढ़े थें,अब उसके भाव एकदम से उतर जायेंगे।अब उसपर मीम बनेंगे,अपशब्दों के बाण चलेंगे उसपर कि अभी कुछ दिनों पहले की बात है जब उसके न दिखने पर उसके दिख जाने की कामना करने वाला लोक,अब चाहेगा कि वह थोड़ा कम तपे। अगर हम सूर्य को देव मानते हैं तो यह देव ही बताने के लिए सबसे उपयुक्त है कि सब दिन समान नहीं होतें,समय सबका एकसा नहीं होता,देव हो,दानव हो कि मनुज!अब सब कोसेंगे गर्मियों को और जाड़े के दिनों को याद करेंगे।किंतु मैं बिल्कुल नहीं करूंगी।मुझको तो गर्मियों के लंबे दिन,तपते-झुलसते दिन ही भाते हैं। गर्मियों के लंबे तपते दिनों में एक अजीब सा खालीपन है मानो समस्त सृष्टि खालीपन से...

कैलेंडर 2024

क्या कैलेंडर 2024 का वर्ष अच्छा था?इस प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न पुनः उठता है कि हम इस प्रश्न को समष्टिगत रूप से देखते हैं या व्यष्टिमूलक रूप में?किंतु दोनों ही रूपों में कुछ अच्छा होने के लिए बहुत सारी सुन्दरता चाहिए।चाहिए मन की शान्ति और संसार में पूर्ण न्याय की स्थिति।तब मैं अपने परिपेक्ष्य में ही उत्तर दे सकती हूं।किन्तु इसी प्रश्न को दूसरी तरह से पूछूँ कि क्या 2024 का कैलेंडर वर्ष बुरा था?तब मैं कहूँगी कि नहीं।और यह बात अपने आप में पर्याप्त शांतिदायक है। अपने परिप्रेक्ष्य में कहूँ तो 2017 से 2021 तक मृत्युओं, विपदाओं और अलगाव का क्रम बरस दर बरस लगा रहा।किंतु यह स्थिति 2022 से कुछ परिवर्तित होना आरंभ हुई।ज्योतिष और अंकशास्त्र के आधार पर जाना कि‌ स्थिति में और भी सुखद परिवर्तन होना चाहिए।इन विद्याओं को मैं पूर्णरूपेण तो जानती नहीं किंतु मुझको कुछ भरोसा बनता है इन विद्याओं पर।2022 और 2023 कुछ उपलब्धियों का वर्ष रहा।यूं तो 2017 से 2021 में भी सबकुछ बुरा ही रहा हो,ऐसा नहीं रहा।किंतु वे घोर मानसिक अशांति और चिंताओं का वर्ष रहा जिसने चित्त को उद्गिन ही रखा।आत्मा आकंठ वेदना में डूबी‌ ह...

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

हेमंत -भाग 2

जहाँ परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है,हम भला कहाँ रोक भी सकते थे उसे रोकने से;किंतु जाते हुए को ठीक से विदा तो करते!हर विदाई ठीक से अलविदा कहे जाने का अधिकार तो रखती है।  हेमंत वास्तव में वियोग का,विरह का अभ्यास है। साधना है वियोगी बनने की।यह वह आरंभबिंदु है जहाँ से सबकुछ धीरे धीरे छूटता जाता है।जहाँ भारतीय परंपरा में आनंद के स्रोत विभिन्न तीज त्यौहार एक अंतराल लेते हैं जो नागपंचमी से आरंभ हो कार्तिक पूर्णिमा पर आकर अवकाश लेता है। आनंद का स्रोत सूख तो नहीं गया किंतु जाने किस कारण वह रूक तो जाता है हेमंत में।हेमंत ने भला ऋत की व्यवस्था में क्या बाधा डाली थी जो ऋतु चक्र में यह लांछन इसपर आ लगा है!  हेमंत मुझमें इसलिए भी करूणा भरता है,अवसाद में ले जाता है यह सोचकर कि वह उजलापन जो देर तक रहता है गर्मियों में वह अब बड़ी शीघ्रता में होगा ढल जाने को। मैं प्रतीक्षा में रहती हूं कि कब गर्मियों के दिन लौटेंगे और दिवस दीर्घ होंगे।उजाला तब न केवल बाहर की दुनिया में होगा अपितु अंतर्तम भी प्रकाशित होगा!जब जब शीत की ऋतु बीत जाती है और किसी रोज़ जब सांझ ढले द्वार खोलने पर मैं पाती हूं कि अब तक उ...

उदास दिन...

मैं अक्सर बेहिसाब उदासी से भर जाती हूं।इतनी उदास कि इस उदासी से दुनिया में एक नया महासागर बन‌ सकता है और दुनिया के नक्शे में पांच महासागर की जगह कुल छह समंदर हो जाएं।जब मैं कहती हूं किसी अपने से कि बहुत उदास हूं तो वह मुझे समझाता है कि फलां-फलां कारण से उदास हो और फलां-फलां काम करो,मन लगाओ तो उदासी दूर हो जाएगी। गोया उदास होना बहुत बुरी बात हो।कोई नहीं मिलता जो ये कहे कि ओह!उदास हो!अच्छी बात है,रहो उदास और इस दुनिया की चिंता मत करो।यह उदासी तुम्हारी यानि मेरा किरदार है इस दुनियावी रंगमंच पर। वर्ष भर के किन्ही‌ कमजोर दिनों में मैं अपनी उदासी को साधने में नाकामयाब होती हूं और तब उन दिनों में मैं अपने पसंदीदा गाना नहीं गा पाती‌ हूं।उन गीतों को भी नहीं जो प्रसन्नता के दिनों में बड़े सुर में निकलते हैं।उदासी‌ भरे गीतों के तो बोल तक नहीं फूटते कंठ से जबकि मुझे लगता है मेरी आवाज़ पर वे ही गीत अधिक फबते हैं।इन बेहद गहरे उदास दिनों में कुछ लिखा‌ भी नहीं जाता।शब्द कहीं खो जाते हैं।अर्थ अपनी अभिव्यक्ति में असमर्थ से हो जाते हैं।उथले से वाक्य बनते हैं और बेहद छिछले से वाक्यांश।और कलम!साध लेती है च...

बरखा का गौनागीत...🌧️

  माह आश्विन (क्वार) का है और पक्ष पितरों का चल रहा है। समक्ष गिर रहीं संभवतः यह बरखा की बूंदों का मानसून के अपने घर वापसी के पहले का रूदनगीत हो।घर से कार्यस्थल जाने के रस्ते में मैं देख रही थी तेजी से बरखा की बूंदो को धरती पर गिरते हुए।मानो धरती के गले मिलने को कितनी आतुर हों कि अब मिलेंगे छह-सात माह बाद!मानो कह रहीं हों इस विदा की बेला में ढंग से मिल तो लें!यह भी कि सबके हिस्से आना चाहिए ठीक ढंग से अलविदा कहने का हक़।प्रकृति हो कि मनुष्य। इसके बाद अब उत्सवों के दिन लौटेंगे।ऋतुएँ पहले शरद का सुहानापन,फिर हेमंत की आत्मकरूणा,और पुनः शिशिर की आत्मदैन्यता ओढ़े-लपेटे आयेंगी अपने ठिठुरते दिनरात को लिए।धीरे-धीरे दिन की लंम्बाई घटती ही रहेगी।सब समेटा करेंगे इन दिनों में अब खुद को जल्दी-जल्दी।दिनमान छोटे हो जायेंगे।और रातें जाने किस शोक में गहरी और दीर्घ।  धूप का भी स्वर कोमल हो जाएगा।देखूंगी धूप के चढ़ाव के उतार को।किंतु मैं जिसके मन को भाता है दिनों का फैलाव और धूप का तेज,उचाट मन लिये देखूंगी दिनों को स्वयं को समेटते हुए शीघ्रता से,बेमन से।गोया जीवन को देखती हूँ उचाट मन से।यूँ भी भ...

पिताजी,राजा और मैं

  तस्वीर में दिख रहे प्राणी का नाम ‘राजा’ है और दिख‌ रहा हाथ स्वयं मेरा।इनकी एक संगिनी थी,नाम ‘रानी’।निवास मेरा गांव और गांव में मेरे घर के सामने का घर इनका डेरा।दोनों जीव का मेरे पिताजी से एक अलग ही लगाव था,जबकि इनके पालक इनकी सुविधा में कोई कमी न रखतें!हम नहीं पकड़ पाते किसी से जुड़ जाने की उस डोर को जो न मालूम कब से एक-दूसरे को बांधे रहती है।समय की अनंत धारा में बहुत कुछ है जिसे हम नहीं जानते;संभवतः यही कारण है कि मेरी दार्शनिक दृष्टि में समय मुझे भ्रम से अधिक कुछ नहीं लगता;अंतर इतना है कि यह भ्रम इतना व्यापक है कि धरती के सभी प्राणी इसके शिकार बन जाते हैं।बहरहाल बात तस्वीर में दिख रहे प्राणी की चल रही है। पिताजी से इनके लगाव का आलम यह था कि अन्य घरवालों के चिढ़ने-गुस्साने से इनको कोई फर्क नहीं पड़ता।जबतक पिताजी न कहें,ये अपने स्थान से हिल नहीं सकते थें।पिताजी के जानवरों से प्रेम के अनेकों किस्सों में एक यह मैंने बचपन से सुन रखा था बाबा से कि जो भी गाय घर में रखी जाती,वह तब तक नहीं खाती जब तक स्वयं पिताजी उनके ख़ाने की व्यवस्था न करतें। राजा अब अकेला जीवन जीता है,उसके साथ अब उसक...

शिक्षक दिवस:2023

विद्यार्थियों के लिए... प्रिय छात्र-छात्राओं, मैं चाहती हूँ कि आप अपने विचारों को लेकर बिल्कुल स्पष्ट रहें।एकदम क्रिस्टल क्लीयर।जीवन में जो कुछ भी करना है और जैसे भी उसे प्राप्त करना है,उसे लेकर मन में कोई द्वन्द्व न हो। अपने निर्णय स्वयं लेने का अभ्यास करें।सफल हों तो स्वयं को धन्यवाद देने के साथ उन सभी को धन्यवाद दीजिये जिन्होंने आपपर प्रश्न उठायें,आप की क्षमताओं पर शंका किया।किंतु जिन्होंने धूलीबराबर सहयोग दिया हो,उसको बदले में खूब स्नेह दीजिएगा। अपने लिये गये निर्णयों में असफलता हाथ लगे तो उसे स्वीकार कीजिये कि मैं असफल हो गया/हो गई।मन में बजाय कुंठा पालने के दुख मनाइएगा और यह दुख ही एकदिन आपको बुद्ध सा उदार और करूणाममयी बनाएगा। किसी बात से निराश,उदास,भयभीत हों तो उदास-निराश-भयभीत हो लीजिएगा।किन्तु एक समय बाद इन बाधाओं को पार कर आगे बढ़ जाइएगा बहते पानी के जैसे।रूककर न अपने व्यक्तित्व को कुंठित करियेगा,न संसार को अवसाद से भरिएगा। कोई गलती हो जाए तो पश्चाताप करिएगा किन्तु फिर उस अपराध बोध से स्वयं को मुक्त कर स्वयं से वायदा कीजिएगा कि पुनः गलती न हो और आगे बढ़ जाइएगा।रोना ...

प्रश्नों का बैताल...

नैतिक और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अव्यवस्थित इस संसार में एक प्रश्न गाहे-बगाहे मेरे समक्ष उठता है कि क्या प्रेम कोई वस्तुनिष्ठ चीज है अथवा यह नितांत व्यक्तिगत भाव है?यदि विषयी पर निर्भर है तो वह प्रेम जो किसी के ह्रदय में एक दिन ज्वार बनकर उमड़ा था,अचानक वह लुप्त कहाँ हो जाता है!किंतु व्यक्तिगत स्तर पर यह तथापि कुछ हद तक स्वीकार्य है कि प्रेमिल मन किसी कारण बदल गयें।जैसा कि एक गीत में गीतकार कहता है, "कब बिछड़ जायें हमसफ़र ही तो हैं, कब बदल जायें एक नजर ही तो है!" किंतु इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि यह नितांत निजी कोई भाव या धारणा है। वैसे भी इस भाव के व्यक्तिगत न होने का यह भी कारण है कि यदि दो प्रेमी मन से इतर प्रेम की बात करें तो प्रेम समस्त नैतिकता के मूल में है।अतः यह कोई विषयी पर निर्भर भाव मात्र नहीं अथवा कोई निजी‌ अवधारणा नहीं सिवाय इसके कि कौन कब किसके प्रेम में कोई पड़ जाय,यह कोई निश्चित बात नहीं है और यह नितांत व्यक्तिगत चाहना है।  किंतु यहाँ समस्या और गंभीर रूप धारण करती है जब प्रेम को वस्तुनिष्ठ रूप में देखा जाय!और हम एकदम सिरे से नकार भी नहीं सकतें कि यह कोई वस...

यात्राएं

  यह जीवन अपने आप में एक यात्रा है निरपेक्ष रूप से। जहाँ इसको किसी अन्य यात्रा की,यात्री की,गंतव्य की आवश्यकता नहीं है।पथ की,पथिक की आवश्यकता नहीं है।जीवन निरपेक्ष रूप से ठीक वैसे ही यात्रारूप है जैसे अद्वैत का परमब्रह्म(Super Conscious)।यात्रा जीवन का स्वरूप ही है जैसे प्रकाश सूर्य का। किंतु जीवन के आनन्तर्य में अनेकों सापेक्ष यात्राएं होती हैं, जो जीवन के इस रूप की ही पहचान करवाती हैं। कैसी पहचान! कैसी यात्रा! यही कि यात्राएं तो करनी पड़ेंगी चाहे अनचाही हों या चाही गई।क्योंकि अपने स्वरूप में निरपेक्ष जीवन इन सापेक्ष यात्राओं से ही गति पाती है। यही जीवन का स्वरूप है!यही इसकी पहचान! इस लेख में मेरे जीवन से जुड़ी दो यात्राओं की दो तस्वीरें हैं।पहली जब सूरज डूब रहा था।ठीक उसी समय कहीं सच में जीवन का सूरज डूब रहा था। यह एक अनचाही यात्रा थी। दूसरी,जब सूरज उदय हो रहा था। ठीक अगली सुबह कहीं सच में नवजीवन की पहली यात्रा की तैयारी थी।यद्यपि यह सूर्योदय होने में पांच बरस लग गयें।किंतु किसी ने ठीक ही कहा है कि'एक दिन बरसों का संघर्ष बड़े खूबसूरत तरीके से हमसे टकराता है' ।

शहर

आप जिससे प्यार करते हैं,उसके लिए उसके बेहतर जीवन की सबसे सुंदर कल्पना कीजिये! हम करते ही होंगे अपनों के लिए ऐसी सुंदर कल्पना!  ठीक वैसे ही जिसका सम्मान करते हैं,उसके ऐसा बन जाने की कल्पना कीजिये कि उसकी सुंदरता की गवाही को शब्द की आवश्यकता न पड़े! शुभकामनाओं का असर जब पड़ता है तो वे ताजे गुलाब सा निखर उठते हैं।ऐसा प्यार और सम्मान हम उन शहरों के लिए भी कर सकते हैं जहाँ हमने जन्म लिया!जहाँ हमारे सपने पूरे होते हैं।जहाँ हमारे अपने रहते हैं! जहाँ से रोजी-रोटी चलती है।  ऐसे ही समय की दहलीज पर बिखरा पड़ा मेरा अस्तित्व बरसों की मेहनत बाद एकदिन अपने सार को जब ग्रहण करता है तब यह वह दिन था जब मैंने उस शहर के बारे में जाना,जिसका नाम भी कभी नहीं सुना था।तमाम आशंकाओं-चिंताओं,कुछ मिलने की खुशी और कुछ छूट जाने के परिताप को अपने तेवर की पोटली में बांधकर एक नये शहर में प्रवेश करती हूँ।  जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक खुशी और अपनों से बिछोह का दुख एक ओर,और मैं खोज़ में रही एक अदद जगह की तलाश में जहाँ शामें गुजारी जा सकें,जहाँ सारा तनाव,सब चिंताएं बहाई जा सकें! द्वन्द्व सुलझाई जा सकें...

मेरे बाबा

    मेरा यह वर्तमान जीवन मेरे बाबा का आशीर्वाद है। आह ! द्वंद्वों से युक्त फिर भी कितना संतोषपूर्ण जीवन है। सब है यहाँ। दुःख-सुख, मान-अपमान, बदनामी-यश, प्रेम-विश्वास,पुस्तकें, खेल,राजनीति, बहस,सेहत,संगीत।  एक बेतरतीब बेवकूफी तो अबूझ उदासी फिर भी एक मस्तमौलापन। पाताललोक तक पहुंचा देने वाले बैचेनियों के साथ आकाश छूता आत्मविश्वास भी।तमाम निराशाओं के बाद भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण। यह भी मालूम है कि मेरे हाथ में बहुत कुछ नहीं हैं फिर भी कर्मशील बने रहने को सदैव तत्पर,मज़बूत इच्छाशक्ति भी, व्यक्तित्व की स्मार्टनेस भी। भौतिक चाहना के साथ आध्यात्म भी!सब तो है। क्यों है? क्योंकि यह जीवन मेरे बाबा का आशीर्वाद है। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली हूं कि अपने जीवन को अपनी सोच के अनुरूप ढालने के प्रयास में सफल हूँ । और जो कुछ रह गया है,वह भी शीघ्र होगा। जो देरी है, वह मेरी कमी है।किंतु मैं उन तमाम सेनाओं के विरुद्ध जिन्होंने मेरी आत्मा के उजले पक्ष पर घेरा डाला है,मैं उन सबसे जीत जाऊंगी एक दिन।  क्यों? क्योंकि मेरे बाबा के लिए मैं स्पेशल हूँ। वे मुझे कभी हारने नहीं देंगे।  मेरे ...

Simone de Beauvoir

  सिमोन,दुनिया के उन कुछ व्यक्तित्व में से एक हैं जो मुझे बेहद पसंद हैं।जबकि उनके सिद्धांतों,उनके जीवन जीने के तरीकों,उनके प्रेम संबधों,उनके विचारों से मुझे घोर असहमति है।किन्तु फिर भी सिमोन मेरी फेवरेट हैं।फेवरेट या पसंद करने के लिए,किसी का आदरणीय बनने के लिए बिलकुल आवश्यक नहीं कि हम उसके प्रत्येक बातों-विचारों से सहमत ही हों। बहरहाल,  सिमोन मुझे पसंद हैं क्योंकि उन्होंने जीवन को अपनी शर्तों पर जिया।अपने सपने पूरे करने के लिए जीवन में रिस्क लिया।अपने उसूलों,अपने सिद्धांतों के लिए अपने प्रेम (उनके समकालीन महान अस्तित्ववादी दार्शनिक ज्यां पाॅल सार्त्र से उनके प्रेम प्रसंग उन दिनों पूरे यूरोप में चर्चा का विषय था) को भी ठुकराने से गुरेज़ नहीं किया।मुझे वो लोग पसंद आते हैं जो जीवन में किसी से प्रेम करते हैं और बेइंतहा करते हैं जैसे सिमोन ने सार्त्र से किया।किन्तु मुझे वो लोग बहुत पसंद आते हैं जो जीवन में अपने कैरियर,अपनी स्वतंत्रता को प्रत्येक स्थिति में प्राथमिकता देते हैं और दोनों का बेहतरीन तालमेल जीवन में बिठाते हैं।जैसे कि सिमोन ने किया।सार्त्र से बेहद प्रेम करने के बाद भी अ...

दर्शन और साहित्य का सम्बंध और निर्मल वर्मा

  निर्मल को पढ़ते समय दर्शन में बुद्धिवादियों की देह-मन की समस्या सुलझती हुई दिखती है।इतनी कोमल भाषा कि देह की जड़ता गल जाती है और मन,देह का सारा पानी सोखकर नम हो जाता है।        तब जड़ और चेतन,मन और शरीर की समस्या जो इतनी गहरा गई थी पाश्चात्य चिंतन में कि डेकार्ट को द्रव्य का द्वैत स्वीकारना पड़ा और स्पिनोज़ा को गुणों का द्वैत जबकि उनकी दर्शन प्रतिध्वनि है अद्वैत की,यह एक समस्या इस प्रतिध्वनि को थोड़ा कर्कश बना देती है।और लाइबनित्ज़ को जिन्होंने सबकुछ चेतन माना और स्वतंत्र माना,उसे भी इस द्वैत को सुलझाने के लिए असंगत कल्पना करनी पड़ती है और ईश्वर को परम चिद्णु कहकर चिद्णुओं की स्वतंत्रता ही छीन लेते हैं।किंतु निर्मल इस द्वैत को झट से सुलझा देते हैं और दोनों के द्वैत के अहम को गला देता है।                    निर्मल बहुत सूक्ष्म और गम्भीर बातें कहते हैं बहुत ही नाजुकता से।ऐसा लगता है कि दर्शन के,जीवन के गूढ़ रहस्यों का रेशा-रेशा खोलते हैं।किंतु इतनी मसृण भाषा में कि समझने के लिए रूकना ठहरना पड़ेगा इसदौड़ती-भागती ज...