एक दसबजिया,छोटा-सा फूल जिसकी प्रासंगिकता नगण्य है।शास्त्र उसका वर्णन नहीं करते।किसी देवता का प्रिय पुष्प होने का सौभाग्य उसे नहीं मिला।कोई महाकाव्य,कोई महान कथा जिसकी विषयवस्तु प्रेम हो, उसमें इसे स्थान नहीं मिला। सौंदर्य का कोई बिंब का प्रतिबिंब यह न बन सका।प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं को देने के लिए इसे कभी नहीं चुना,न तो प्रेमिकाओं ने इसे अपने केशों में टांका। इन प्रपंचों से कहीं बहुत दूर,सौंदर्य के विशाल समंदर से दूर ,उपेक्षित सा चुपचाप खड़ा रहा दसबजिया।और तो दार्शनिकों ने भी उसमें कोई दृष्टांत नहीं तलाशें। किंतु मैं कभी न बिसरा पाई इसे। संभवतः ऐसा बचपन की स्मृतियों के कारण हो जो अब अतीत हो चुका है और जहां तक अब केवल मन की गति है किंतु मन वहां बारंबार जाता है। खैर, किंतु दसबजिया स्मृतियों के कारण ही गहरे मानस में पैठा रह गया,ऐसी बात भी नहीं।एक तो गुलाब को गुलाब होने का बड़ा दंभ है।कमल को वर्तमान सत्तादल का प्रतीक होने का दंभ है।सबके अपने-अपने कारण है दंभी होने के जबकि दसबजिया को किसी बात का दंभ नहीं है।उसे अपना रुआब नहीं झाड़ना।उसपर विशेष होने का भी कोई दबाब नहीं है।यूं वह अपनी अप्...
गंगा,गंडक एवं घाघरा नदी से घिरा छपरा अपने तमाम पुरातात्त्विक एवं धार्मिक स्थलों के साथ भारत में मानव बसाहट के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक है जहाॅं का पुरातत्व स्थल चिरांद इसकी ऐतिहासिकता का गवाह है। छपरा से 11 किलोमीटर दूर स्थित यह पुरातत्व स्थल ईसा पूर्व 2000, यानी आज से 4000 साल पुराना माना जाता है। वह सिद्धार्थ जिन्होंने मनुष्य रूप में सर्वोच्च नैतिकता के स्तर को प्राप्त किया और बुद्ध कहलाएं;जिन्होंने सर्वोच्च दार्शनिक अवधारणा निर्वाण (मुक्ति) को यथार्थ बनाया,ऐसी मान्यता है कि उनके प्रिय शिष्य आनंद ने इसी स्थल पर जलसमाधि ली थी।इसी कारण इस स्थल का नाम चिरांद है कि वह जो यहां समाधिस्थ हुयें,चिर (कभी न समाप्त होने वाले) + आनंद में समाधिस्थ हैं। संभवतः आमजन की बोली में यह चिर आनंद चिरांद हो गया। बहरहाल, नवपाषाणकाल का प्रथम उत्खनन भारत में यहीं प्राप्त हुआ। पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण में ताम्रपाषाणिक युग, नवपाषाण और लौह युग के अवशेष बरामद किए गए है। यहाँ 2500 ईसापूर्व से 40 ईस्वी तक के बनाये गए घरों के अवशेष भी बरामद किए गए है।खुदाई के दौरान कृषि में उपयोग किये जाने वाले सामग्री सहित ...