ह्रदय के गर्भगृह में अब भी गहरे जड़ जमाकर बैठी हैं वेदनाएं। वही वेदनाएं जो बिछोह के काल में घटित असंख्य कष्टकारी क्षणों से जन्मी थीं।ऐसी दाहाग्नि में झुलसती रहती है मेरी आत्मा और मेरा अहम्। तुम्हारी गली से गुजरते वक्त न जाने कितनी ही बार अपने मौन आंसुओं से अर्घ्य दिया वहां के स्थान देवताओं को ; चाहा कि उस अर्घ्य में सालों से जमी चित्त की विकलता को विसर्जित कर दूं; कितनी साधनाओं,ध्यान के प्रयासों में अपनी चेतना को तुम्हारी स्मृतियों से मुक्त करना चाहा; किंतु ,उन तमाम प्रयासों, प्रार्थनाओं, मुक्ति के पथ पर चलने की चेष्टाओं, आध्यात्मिक चर्चाओं की समाप्ति पर मैंने अपने सम्मुख तुम्हें पाया,.... मुझे यह बार-बार स्मरण दिलाता हुआ कि मुक्ति के लिए किये गये मेरे समस्त प्रयास केवल छलावा है; मन का बहलना है.... मैं अपने दुःख में अब भी तुम्हें पाती हूं,सुख तो अधूरा ही है तुम्हारे बिना... और मुक्ति व्याकुल आत्माओं के लिए नहीं हैं.... वह स्थिर चित्त का हासिल है और तुम्हें खोकर मैंने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया,उसका हासिल अंततः शून्य ही रहा... तब मुझे ज्ञात हुआ कि कुछ वेदनाएँ ऐसी ...
अबकी जब जाऊंगी गांव ... सबसे पहले जाऊंगी कुल देवी के दुआरे...लेटकर करूंगी पलग्गी,रोऊंगी दिल खोलकर वहीं लेटे -लेटे, अपने आंसुओं से जब बुझा लूंगी हिय की प्यास और कुल के देवी से कह दूंगी सारे दुख तब जाऊंगी बाबूजी के घर... घर जाने के रस्ते में पड़ती है वह नदी जिसके किनारे बैठकर बचपन में देखती थी सूरज को डूबते,बत्तखों को तैरते... मैं कहूंगी नदी से,किनारों से,मैं तैर न पाई और डूब गई माया में जबकि तुम्हारे किनारे बैठ देखा था बत्तखों के झूंड को तैरते हुए...ओ तटिनी !....रो पड़ूंगी अंजुरी में पानी भरते हुए कि मैं तो लौट आई थी,बचपन यहीं कहीं छूट गया है तुम्हारे किनारे..अब छूट गया तो संभाल कर रखना,अगले जनम लौटा देना ,यही बचपन,यही किनारा,यही गांव,वही अम्मा-बाबूजी... घर में जब प्रवेश करूंगी भाभी के सांझ बारने तक भटकती रहूंगी एक कमरे से दूसरे कमरे,ओसारे से रसोई तक लगाऊंगी दौड़...झांक झांककर लौट आया करूंगी अम्मा के हाथ का बना मिट्टी का चूल्हा... देखूंगी स्टील का बना कोठिला और याद करूंगी अम्मा के हाथों बने मिट्टी के कोठिला को...मिट्टी का कोठिला ढह गया...मिट्टी की देह भी ढह जाएगी...यही सोच -सोच थक कर धं...