भारतीय दर्शन में या यूं कहें कि विश्व दर्शन में कुछ अवधारणाएं ऐसी हैं जिनपर दो पक्ष है किंतु अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। यदि ज्ञान का विस्तार करें तो विज्ञान भी इसमें सम्मिलित है। किंतु क्योंकि मैं दर्शन की विद्यार्थी हूं तो दर्शन पर अपनी बात केन्द्रित करती हूं।इन तमाम अवधारणाओं में है - आकाश,समय ,दिशा,कारण-कार्य,कर्मनियम, पुनर्जन्म इत्यादि। विसंगति यह है कि रोजमर्रा के अपने जीवन में मैं नितप्रति इन अवधारणाओं की संकरी गली से गुज़रती हूं। किंतु एक तो ज्ञान का प्रकाश कुछ मद्धम है मुझमें तो रोज़ ही डूबना-उतराना होता है। मैं जब इन प्रश्नों से निजात पाने की सोचकर वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करती हूं तो पाती हूं कि इस मल्टीमीडिया सेट जैसे समय में मैं तो बटन टिपने वाली मोबाइल जैसे हूं। दूसरे, शब्दों में कहें तो समयानुकूल नितांत अयोग्य हूं। मैं जो वर्तमान में हूं, यदि वह नहीं होऊं तो मुझे और कुछ भी नहीं आता है।तब मैं पुनः घबरा कर अपने कमरे में पड़े किसी दार्शनिक अवधारणा को उठाती हूं और उसपर चिंतन करने का अभिनय करती हूं। किंतु यह अभिनय मुझे मुंह चिढ़ाता है कि ऐसा अभिनय...
लोककलाएं अपने भूगोल में देसी होती हैं किंतु व्याप्ति में एक समूचे राष्ट्र और उसकी सांस्कृतिक पहचान को समेटे होती हैं।वे शास्त्रों के ज्ञान को भदेस में लोक तक संचारित करती है। यदि ऐसा न हो तो सुप्रीम कोर्ट में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा श्री राम को काल्पनिक बताने वाले अपनी कुचाल में सफल न हो जाता अगर राम की दामाद के रूप में लोक में चेतना न होती। यही लोककला है जो गाती है कि,'ऐ पहुना,ऐही मिथिला में रहना'। और मां जानकी के साथ अपने राजा को यह राष्ट्र बिहार क्षेत्र में पाहुन बनाकर पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृतियों में संजोकर रखता है। लोककला जिसकी काया देसी है किंतु आत्मा राष्ट्रीय। महादेव,श्रीराम और श्रीकृष्ण इस भारत राष्ट्र की आत्मा हैं।यह वह भित्ति है जिसपर भारत का चित्र बना है।उसकी सांस्कृतिक चेतना की बुनाई इन्हीं तीनों से हुई हैं। किंतु जिस शलाका पर यह चेतना बुनी है वह भारत की लोककलाएं हैं।अपने रूप में देसी किंतु आत्मा से राष्ट्रीय। भारत के किसी कोने में बैठकर जब किसी ने इक भारी-भरकम - गरजती आवाज़ में सुना होगा,'तो चलिए अब चलते हैं कुरूक्षेत्र की ओर जहां कौरव और पांडव की सेना आमने-सामने ...