1. बचपन कैसा रहा? बिल्कुल वैसा जैसा एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार के बच्चों का होता है।सिवाय अन्य बच्चों से इतना ही अंतर था कि मेरे ही साथियों द्वारा मेरा इस बात पर मजाक उड़ाया जाता था कि मैं कुछ अलग हूं औरों से। हालांकि कभी मुंह पर नहीं कहा। नहीं तो बचपन भयंकर मारपीट के किस्सों से भरा होता। वैसे थोड़े शरारतों, थोडी पढ़ाई, भाई-बहनों से भरा घर,उनकी डांट-मार और प्यार के साथ ही आत्मकरूणा से भरा रहा बचपन। आज़ सहानूभूति भर-भरकर मिले, ऐसे अनेकों किस्से हैं किंतु इस स्थिति के बहुत विश्लेषण में जाने से बहुत विवरण बढ़ेंगे और बहुत भावुकता भी। ये चीज़ें व्यक्ति को लचर बना देती हैं। ऐसी घटनाएं मिटा देने की चीज़ है। उसे भूलिए मत, लेकिन ध्यान खींचने के लिए बेवजह याद भी मत कीजिए। 2.ज़माने से क्या मिला? स्नेह,दया,प्रेम,मान,दोस्ती,साथ,सहयोग,सहायता,सह्रदयता,सुख और मंजिल! यह भी... घृणा, उपेक्षा,अपमान ,असहयोग, दोस्ती में छल,निष्ठुरता, अभाव,अन्याय,दुख और भटकाव... 3. लेखन जीवन में उतरा या जीवन से लिखने की प्रेरणा? लेखन की कला जन्मजात तो नहीं थी इसलिए कह सकते हैं कि जीवन के कटु अनुभव ही स्याही बने या लि...
एक दसबजिया,छोटा-सा फूल जिसकी प्रासंगिकता नगण्य है।शास्त्र उसका वर्णन नहीं करते।किसी देवता का प्रिय पुष्प होने का सौभाग्य उसे नहीं मिला।कोई महाकाव्य,कोई महान कथा जिसकी विषयवस्तु प्रेम हो, उसमें इसे स्थान नहीं मिला। सौंदर्य का कोई बिंब का प्रतिबिंब यह न बन सका।प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं को देने के लिए इसे कभी नहीं चुना,न तो प्रेमिकाओं ने इसे अपने केशों में टांका। इन प्रपंचों से कहीं बहुत दूर,सौंदर्य के विशाल समंदर से दूर ,उपेक्षित सा चुपचाप खड़ा रहा दसबजिया।और तो दार्शनिकों ने भी उसमें कोई दृष्टांत नहीं तलाशें। किंतु मैं कभी न बिसरा पाई इसे। संभवतः ऐसा बचपन की स्मृतियों के कारण हो जो अब अतीत हो चुका है और जहां तक अब केवल मन की गति है किंतु मन वहां बारंबार जाता है। खैर, किंतु दसबजिया स्मृतियों के कारण ही गहरे मानस में पैठा रह गया,ऐसी बात भी नहीं।एक तो गुलाब को गुलाब होने का बड़ा दंभ है।कमल को वर्तमान सत्तादल का प्रतीक होने का दंभ है।सबके अपने-अपने कारण है दंभी होने के जबकि दसबजिया को किसी बात का दंभ नहीं है।उसे अपना रुआब नहीं झाड़ना।उसपर विशेष होने का भी कोई दबाब नहीं है।यूं वह अपनी अप्...