कुछ तस्वीरें जो ईश्वर को नयी सृष्टि के लिए सहेज लेना चाहिए इस दुनिया के एल्बम से..... आत्मीय लोग स्मृति बन जाते हैं;प्राण से प्यारे एक दिन प्राण त्याग जाते हैं;लोग सपना बन जाते हैं तो सपने धुआं और सुख कपूर बनकर उड़ जाता है।जीवन को अर्थ देने वाले सब सिद्धांत एक दिन भ्रम सिद्ध होते है फिर मूल्यों की बात क्या कहूं!उम्र को तो बढ़ना ही है,धीरे-धीरे चेहरे की पुस्तक के पन्नों का रंग भी उड़ जाता है।हंसने की अदा भी एक दिन भूलने में आती है।सांसों की धवल धमक एक दिन क्षीण से क्षीणतर और मन पर बोझ लगने लगती है कि वह अब छूटी कि तब छूटी… शहर-दर-शहर भटकते-भटकते उसे अपनी जवानी दीजिए वो विदा में बेगानापन ही लौटाती है।एक दिन घर लौटने का भी कोई अर्थ नहीं बचता।अंततः एक दिन जीवन इस पेड़ की भांति खंख ही बचा रहता है।यही इसकी नियति है -खंख हो जाना।अहंकार इन दिनों में बूढ़े के लाठी जैसा क्या सहारा बनती होगी? मैं यही सोच रही थी रास्ते में अपनी खटखटिया स्कूटी रोककर।आने-जाने वाले मुझे देखतें और देखते हुए मानो उनकी दृष्टि व्यंग्यात्मक ढंग से पूछ रही थी मुझसे,"पागल हो क्या"?,उनको उत्तर देती मेरी निगाहें कह ...
मैं अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार व्यक्तियों में से एक हूं इसलिए उतनी ही व्यर्थ,अनुपयोगी और बेकार।यह एक आधार वाक्य से निगमित निष्कर्ष है जिसे अव्यवहित अनुमान कहते हैं। सरल शब्दों में तत्काल निकाला गया निष्कर्ष है जबकि पास में केवल एक आधार वाक्य हो। किंतु यह निष्कर्ष सत्य माना जा सकता है क्योंकि आधार वाक्य से यह अनिवार्यत: निगमित होता है।इसको एक दूसरे तरीके से भी जांच कर सकते हैं कि निष्कर्ष के विरोधी वाक्य का आधार वाक्य से व्याघात संबंध है और व्याघात संबंध में दो तर्कवाक्यों में कोई एक ही सत्य हो सकता है। अतः यदि न्याय वाक्य के नियमों से भी उपरोक्त बातों को जांचे तो यह सत्य ही बैठता है। इस प्रकार आकारिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार से इसकी सत्यता सिद्ध है। बहरहाल, मैंने जब-जब चाहा उपयोगी होना एक रंग उड़ गया मेरी आत्मा का,वह कुछ उद्धक लगने लगा।घबराकर मैंने आत्मा का रंग बचाना चाहा किंतु तब समय ने मुझे अनुपयोगी घोषित करने में देरी न की। अपने आत्मा के रंगों को लिए मैं दरकिनार की जाती रही, दरकिनार होती ही गई। दुनिया क्षणभर मेरी आत्मा के रंग को,उसकी सुंदरता को रूककर देखती,सराहती किंतु यह जान...