लोककलाएं अपने भूगोल में देसी होती हैं किंतु व्याप्ति में एक समूचे राष्ट्र और उसकी सांस्कृतिक पहचान को समेटे होती हैं।वे शास्त्रों के ज्ञान को भदेस में लोक तक संचारित करती है। यदि ऐसा न हो तो सुप्रीम कोर्ट में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा श्री राम को काल्पनिक बताने वाले अपनी कुचाल में सफल न हो जाता अगर राम की दामाद के रूप में लोक में चेतना न होती। यही लोककला है जो गाती है कि,'ऐ पहुना,ऐही मिथिला में रहना'। और मां जानकी के साथ अपने राजा को यह राष्ट्र बिहार क्षेत्र में पाहुन बनाकर पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृतियों में संजोकर रखता है। लोककला जिसकी काया देसी है किंतु आत्मा राष्ट्रीय। महादेव,श्रीराम और श्रीकृष्ण इस भारत राष्ट्र की आत्मा हैं।यह वह भित्ति है जिसपर भारत का चित्र बना है।उसकी सांस्कृतिक चेतना की बुनाई इन्हीं तीनों से हुई हैं। किंतु जिस शलाका पर यह चेतना बुनी है वह भारत की लोककलाएं हैं।अपने रूप में देसी किंतु आत्मा से राष्ट्रीय। भारत के किसी कोने में बैठकर जब किसी ने इक भारी-भरकम - गरजती आवाज़ में सुना होगा,'तो चलिए अब चलते हैं कुरूक्षेत्र की ओर जहां कौरव और पांडव की सेना आमने-सामने ...
1. बचपन कैसा रहा? बिल्कुल वैसा जैसा एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार के बच्चों का होता है।सिवाय अन्य बच्चों से इतना ही अंतर था कि मेरे ही साथियों द्वारा मेरा इस बात पर मजाक उड़ाया जाता था कि मैं कुछ अलग हूं औरों से। हालांकि कभी मुंह पर नहीं कहा। नहीं तो बचपन भयंकर मारपीट के किस्सों से भरा होता। वैसे थोड़े शरारतों, थोडी पढ़ाई, भाई-बहनों से भरा घर,उनकी डांट-मार और प्यार के साथ ही आत्मकरूणा से भरा रहा बचपन। आज़ सहानूभूति भर-भरकर मिले, ऐसे अनेकों किस्से हैं किंतु इस स्थिति के बहुत विश्लेषण में जाने से बहुत विवरण बढ़ेंगे और बहुत भावुकता भी। ये चीज़ें व्यक्ति को लचर बना देती हैं। ऐसी घटनाएं मिटा देने की चीज़ है। उसे भूलिए मत, लेकिन ध्यान खींचने के लिए बेवजह याद भी मत कीजिए। 2.ज़माने से क्या मिला? स्नेह,दया,प्रेम,मान,दोस्ती,साथ,सहयोग,सहायता,सह्रदयता,सुख और मंजिल! यह भी... घृणा, उपेक्षा,अपमान ,असहयोग, दोस्ती में छल,निष्ठुरता, अभाव,अन्याय,दुख और भटकाव... 3. लेखन जीवन में उतरा या जीवन से लिखने की प्रेरणा? लेखन की कला जन्मजात तो नहीं थी इसलिए कह सकते हैं कि जीवन के कटु अनुभव ही स्याही बने या लि...