जीवन की सरंचना बताती है कि एक न्यायशील व्यक्ति के संग यह सबसे बड़ी विसंगति होती है कि न्यायपूर्वक अपने कर्तव्यों के निर्वहन के बाद भी वह उपेक्षित होता है। अपने ही लोगों द्वारा। ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा उसका शत्रु भी करता है, मित्र तो करते ही हैं। किंतु वह किसी अपने का भी प्रिय नहीं होता। न्यायपूर्ण होना और प्रिय होना संभवतः दो विरोधी बातें होंगी! कौन जाने सामाजिक ढांचे और मनुष्यों के चित्त के अंतरतम को कौन सा सूत्रात्मक मूल्य संरचित करता है। खैर, समस्त कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन के बाद ऐसा मनुष्य जब संतुष्टि की श्वांस भरता होगा और अपने द्वन्द की कहानी कहने के लिए जब अपने चारों ओर देखता होगा तो उसको पता लगता है,वे सभी जो उसके प्रशंसक भी थे,इतनी दूरी पर थें कि आप उनसे अपने संघर्ष नहीं बता सकते। तो अंततः उपयोगितावाद के सिद्धांत पर चलने वाला यह विश्व न्यायशील मनुष्य को स्वीकृत नहीं कर पाता क्योंकि उसे पता होता है कि यह किसी के लिए हितकारी नहीं है और कभी भी किसी के लिए समस्या बन सकता है। तब समझ आता है सामाजिक मूल्यों की संरचना में कई बार नैतिक मूल्यों की अपेक्षा सुखकारी मूल्य अर्थ...
ह्रदय के गर्भगृह में अब भी गहरे जड़ जमाकर बैठी हैं वेदनाएं। वही वेदनाएं जो बिछोह के काल में घटित असंख्य कष्टकारी क्षणों से जन्मी थीं।ऐसी दाहाग्नि में झुलसती रहती है मेरी आत्मा और मेरा अहम्। तुम्हारी गली से गुजरते वक्त न जाने कितनी ही बार अपने मौन आंसुओं से अर्घ्य दिया वहां के स्थान देवताओं को ; चाहा कि उस अर्घ्य में सालों से जमी चित्त की विकलता को विसर्जित कर दूं; कितनी साधनाओं,ध्यान के प्रयासों में अपनी चेतना को तुम्हारी स्मृतियों से मुक्त करना चाहा; किंतु ,उन तमाम प्रयासों, प्रार्थनाओं, मुक्ति के पथ पर चलने की चेष्टाओं, आध्यात्मिक चर्चाओं की समाप्ति पर मैंने अपने सम्मुख तुम्हें पाया,.... मुझे यह बार-बार स्मरण दिलाता हुआ कि मुक्ति के लिए किये गये मेरे समस्त प्रयास केवल छलावा है; मन का बहलना है.... मैं अपने दुःख में अब भी तुम्हें पाती हूं,सुख तो अधूरा ही है तुम्हारे बिना...मुक्ति व्याकुल आत्माओं के लिए नहीं हैं.... वह स्थिर चित्त का हासिल है और तुम्हें खोकर मैंने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया,उसका हासिल अंततः शून्य ही रहा... तब मुझे ज्ञात हुआ कि कुछ वेदनाएँ ऐसी होती...