Skip to main content

कैलेंडर 2024

क्या कैलेंडर 2024 का वर्ष अच्छा था?इस प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न पुनः उठता है कि हम इस प्रश्न को समष्टिगत रूप से देखते हैं या व्यष्टिमूलक रूप में?किंतु दोनों ही रूपों में कुछ अच्छा होने के लिए बहुत सारी सुन्दरता चाहिए।चाहिए मन की शान्ति और संसार में पूर्ण न्याय की स्थिति।तब मैं अपने परिपेक्ष्य में ही उत्तर दे सकती हूं।किन्तु इसी प्रश्न को दूसरी तरह से पूछूँ कि क्या 2024 का कैलेंडर वर्ष बुरा था?तब मैं कहूँगी कि नहीं।और यह बात अपने आप में पर्याप्त शांतिदायक है।

अपने परिप्रेक्ष्य में कहूँ तो 2017 से 2021 तक मृत्युओं, विपदाओं और अलगाव का क्रम बरस दर बरस लगा रहा।किंतु यह स्थिति 2022 से कुछ परिवर्तित होना आरंभ हुई।ज्योतिष और अंकशास्त्र के आधार पर जाना कि‌ स्थिति में और भी सुखद परिवर्तन होना चाहिए।इन विद्याओं को मैं पूर्णरूपेण तो जानती नहीं किंतु मुझको कुछ भरोसा बनता है इन विद्याओं पर।2022 और 2023 कुछ उपलब्धियों का वर्ष रहा।यूं तो 2017 से 2021 में भी सबकुछ बुरा ही रहा हो,ऐसा नहीं रहा।किंतु वे घोर मानसिक अशांति और चिंताओं का वर्ष रहा जिसने चित्त को उद्गिन ही रखा।आत्मा आकंठ वेदना में डूबी‌ ही रही।

बदले कैलेंडर के पूर्व बरस में जो बड़ा बदलाव हुआ कि एक शहर से दूसरे शहर स्थानांतरण हुआ।आज ठीक एक बरस हुए स्थानांतरण को,ठौर बदले एक शहर से दूसरे शहर को।स्थानांतरण की योजना और प्रक्रिया के दौरान कुछ आत्मीयों ने कहा कि ऐसा क्यों कर रही हूं मैं!यहां सबकुछ कितना अच्छा है मेरे लिए!यह ठीक ही प्रश्न था कि एक शहर जिसने सोचे से अधिक प्यार-सम्मान और उपलब्धियां दीं,एक पहचान दी,शहर मुझे जानने पहचानने लगा था।तब एक अंजान‌ शहर में क्यों जाना?आर्थिक रूप से भी यह मेरे लिए हर तरह से घाटे का एक सौदा था।

किंतु कुछ नया करने की प्रवृत्ति,अपने कम्फर्ट जोन को तोड़ने की प्रवृत्ति ने आखिरकार शहर बदलवा ही दिया।तमाम अन्य सुविधाओं के साथ यह सबसे अधिक इसलिए अच्छा रहा क्योंकि बनारस और समीप हो गया।बनारस इसलिए मुझे अत्यधिक प्रिय नहीं है कि वह‌ मेरी जन्मस्थली है,वह जगह अपने आप में कुछ अनूठी ऊर्जा लिये हुए है।वैसी ऊर्जा,वैसा आनंद,वैसा जीवन के प्रति उत्साह अन्यत्र नहीं मिलता मुझे जबकि भारत के आधे से अधिक राज्यों में जाने का अवसर मिला है संयोग से।

किंतु जो सबसे महत्वपूर्ण रहा कि बीते वर्षों से 2024 इस मायने में अलग रहा कि पिछले बरस जो चित्त को मानसिक शांति मिली,वैसी मानसिक शांति मुझे पूर्व के किन वर्षों में मिली थी,स्मरण में नहीं।अद्भुत आनंद था/है इस मानसिक शांति में। बदले हुए कैलेंडर में बस यही चाह है कि अब यह शांति भंग न हो।

बहरहाल,

2024 में कुछ संकल्प किये।खूब पढ़ा किंतु लिखा बहुत कम।इस वर्ष इच्छा है कुछ लिख लूं और प्रकाशित भी करूं।कार्य प्रक्रिया में है किंतु अत्यधिक मेहनत और धैर्य की आवश्यकता है।धैर्य से याद आया बीता बरस इस मायने में भी विशेष रहा कि मौन रहने का खूब अभ्यास हुआ।मन के भीतर और बाहर संसार में भी।शहर नया होने से भी इस साधना में कुछ सहयोग ही मिला।

मौन रहकर पता चला बोलना भी एक प्रकार से अपने अहंकार का प्रदर्शन है और मौन में बहुत सुख है। और इससे सूक्ष्म से सूक्ष्म अहंकार भी पहचान में आ जाता है जिससे कि उससे छुटकारा संभव हो पाता है।

तथापि बाहरी संसार बराबर स्वयं में उलझाने के प्रयास में रहा। महात्वाकांक्षाएं रह-रह मन के समंदर में उठती रहीं।किंतु भीतर में कुछ और ही पुकार रही।दोनों को साधने की चेष्टा की।पूरी तरह कुछ भी सधा नहीं।किन्तु प्रयास बराबर किया।यद्यपि जानती हूं यह खींचतान मन के भीतर-बाहर आजीवन रहेगा।प्रार्थना बस इतनी है समय से की वह मानसिक शांति जो मिली 2024 में वह क्षणभंगुर न हो।अधिक से अधिक विषादयोग टूटे,राग-द्वेष छूटे, क्रोध-आवेश न हो,मन में कुंठा-ईष्या न हो,कषाय से अब चित् निर्मल हो।अधिक से अधिक साक्षी भाव दृढ़ हो।

ये भी कि यह जो हरदम प्रतीत होता है कि कहीं कुछ है जो मिसिंग है वह पकड़ में आए।एक ठौर मिले कि जहां पहुंचकर लगे कि बस यहीं आना था।यही था जो मिसिंग था।इसी के लिए शांति आई जीवन में कि इसको जान समझकर इसको ही साधना है।चित् को यहीं अवकाश मिलेगा।

अंत में इसी कामना और प्रार्थना के साथ इस लेख को साझा कर रही हूं कुछेक आत्मीयजन से कि आगामी दो-चार बरस में अगर कभी बदले कैलेंडर में पिछले बरस का हिसाब देखूं तो इस लिखे के समीक्षा में लिख सकूं कि,"अहा!यह शांति क्षणभंगुर न निकली जबकि सबकुछ क्षणभंगुर है।"

तस्वीर आज सुबह की जब धुंध में मेरा शहर सोया था और मैं उसे विदा करने निकली थी जिसने अपने शहर से न केवल पिछले वर्ष मुझे विदा किया बल्कि नये शहर में मुझे अपना डेरा जमाने में अपना पूर्ण सहयोग दिया।



Comments

Popular posts from this blog

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

19/06/2025

मां जब बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि फिर पहले जैसी न हुईं,उन्हीं दिनों की बात है जब देह में एक अनजाने रोग ने दस्तक दी।दस्तक ही इतनी जोरदार थी कि लगा आगे क्या होगा।इन भय से भरे दिन में जब मां से मिलने गई किंतु बता न सकी कि मैं कितने दर्द में हूं,तभी कि बात है। बीमारी से पहले मां को न रोग बताने पड़ते थें न पीड़ाओं की गहराई,चाहे वह देह पर लगी हो या मन पर।न जाने कौन सी पढ़ाई उसने कहां से की थी कि कुछ कहना नहीं पड़ता था गो वह जानती थी कि मुझे शायद कहने नहीं आता या कहूंगी नहीं। तब दर्द से रातभर जगने के कारण अगली सुबह जब शरीर के कुछ कदम चलने में भी सहयोग देने से मना करने पर मां के बगल में लेटी।तब स्वयं पर जीवन में पहली बार दया आई।मन इस वेदना से मनो भारी हो गया कि अब दर्द को बिना कहे कोई समझने वाला नहीं है।अब बीमार पड़ने पर कोई दौड़-दौड़कर दवा लाने वाला नहीं है। वह पहली बार था जब बीमार पड़ने पर स्वयं पर रोना आया।अब भी बीमार पड़ती हूं,बीमारी में रोना आता है किंतु अब खुद पर उस दिन जैसी दया नहीं आती।अब कहने का सहूर भी आ गया है।यह न कहना भी कृतघ्नता होगी कि जीवन के सामाजिक दायरे ने ऐसा खुशनुमा विस्तार...

उदास दिन...

मैं अक्सर बेहिसाब उदासी से भर जाती हूं।इतनी उदास कि इस उदासी से दुनिया में एक नया महासागर बन‌ सकता है और दुनिया के नक्शे में पांच महासागर की जगह कुल छह समंदर हो जाएं।जब मैं कहती हूं किसी अपने से कि बहुत उदास हूं तो वह मुझे समझाता है कि फलां-फलां कारण से उदास हो और फलां-फलां काम करो,मन लगाओ तो उदासी दूर हो जाएगी। गोया उदास होना बहुत बुरी बात हो।कोई नहीं मिलता जो ये कहे कि ओह!उदास हो!अच्छी बात है,रहो उदास और इस दुनिया की चिंता मत करो।यह उदासी तुम्हारी यानि मेरा किरदार है इस दुनियावी रंगमंच पर। वर्ष भर के किन्ही‌ कमजोर दिनों में मैं अपनी उदासी को साधने में नाकामयाब होती हूं और तब उन दिनों में मैं अपने पसंदीदा गाना नहीं गा पाती‌ हूं।उन गीतों को भी नहीं जो प्रसन्नता के दिनों में बड़े सुर में निकलते हैं।उदासी‌ भरे गीतों के तो बोल तक नहीं फूटते कंठ से जबकि मुझे लगता है मेरी आवाज़ पर वे ही गीत अधिक फबते हैं।इन बेहद गहरे उदास दिनों में कुछ लिखा‌ भी नहीं जाता।शब्द कहीं खो जाते हैं।अर्थ अपनी अभिव्यक्ति में असमर्थ से हो जाते हैं।उथले से वाक्य बनते हैं और बेहद छिछले से वाक्यांश।और कलम!साध लेती है च...