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पीड़ाएं और एकांत... 🍁

 एक अरसे से मेरे दो ही मित्र रहें हैं।

एक बीते समय की स्मृतियों से उपजी पीड़ाएं और दूजा इन स्मृतियों में लिपटा मेरा एकांत।यद्यपि समय क्या है,ये मुझे कभी स्पष्ट नहीं हुआ।विज्ञान की विद्यार्थी रहती तो संभवतः कुछ स्पष्ट होता!दर्शन ने तो समय की अवधारणा को अंततः परमअनुभूति के हवाले छोड़ रखा है किंतु उतनी साधना का साहस अबतक मुझमें नहीं।तब जब समय की अवधारणा ही स्पष्ट नहीं तब क्या बीता हुआ! क्या आने वाला और क्या वर्तमान! वैसे भी बहुधा हम वर्तमान में जीने के आदी भी नहीं होतें। वर्तमान अद्वैत के माया जैसी है जो ‘है’ किंतु हाथ नहीं आती।

 हां, पीड़ा और एकांत की अवधारणा मेरे लिए स्पष्ट है।

एक ओर ये स्मृतियों में लिपटी पीड़ाएं मेरी देह पर बढ़ई के रन्दे की तरह चलती है तो दूसरी ओर सीने में पीड़ाओं की जलती अखंड भट्टी में मेरी स्मृतियां पक-पक कर मेरा एकांत बुनती हैं जिसमें रहती है अनंत तक फैली उदासी! जैसे ईश्वर के हाथों से छूट गई हो आधी-अधूरी बनी दुनिया और वह बैठा हो इस दुख में उदास कि अब यह दुनिया हाथ न आएगी,यह तो छूट गई…

मेरे जीवन में पहले जब भी खुशियां आती, मैं उन्हें कसकर गले लगाती कि उन्हें नित्य समझा और लगा वे कभी नहीं जायेंगी मेरे पास से। मैं बार-बार उनसे कहती कि कभी मत जाना मुझे छोड़कर! मैं विनती करती, कसमें देतीं लेकिन कुछ ठहरा है भला इस क्षणभंगुर संसार में! खुशियाँ जाती रहीं .. फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मन से खुशियों की चाह भी जाती रही और एक दिन मन बिल्कुल खाली हो गया खुशियों की चाहना से,तब इस मन में घर कर लिया स्मृतियों ने,उचाट एकांत ने।

अब एक आवरण है मेरे चारों ओर।जैसे ही कोई खुशी आती है मेरी ओर मैं सिमट जाती हूं,छुप जाती हूं इस आवरण में। न! मुझे कोई भय नहीं है कि ये जो कुछ भी है वह क्षणिक है।क्षण से मुझे भय नहीं किंतु मैं छल से उदास हूँ…

अब छल मेरे प्रेमी हैं .. वैसा प्रेमी जो प्रिय का गला तबतक घोंटता है जबतक वो मरने-मरने को न हो और फिर झट से गला छोड़ देता है जैसे सोये-सोये अचानक जग जाए कोई नींद से जैसे कोई बुरा स्वप्न देखा हो!

वैसे जगराते वाली रातों की मुर्दा ठंडक में मैं ऐसे सिकुड़ कर सो जाती हूं जैसे मां के गर्भ में कोई शिशु! यद्यपि यह सच्चाई स्पष्ट रहती है कि यह मां का सुरक्षित घेरा नहीं। ये तो दीर्घकालिक कोई अभिशाप है जो मेरे पीठ से चिपका है।पीठ से चिपका न होता तो मैं छल से उदास न होती…

आत्मा तक को आहत कर रखने वाली मेरा एकांत मेरे पूरे व्यक्तित्व को निचोड़ लेती है किंतु अब दृढ़ हूं कि मैं क्षणिक को नहीं अपना सकती… 

संभवतः यही इन पीड़ाओं में एक सुखद बात है कि उनमें एक सम्यक बोध है कि चाहे जो हो क्षणिक को नहीं अपनाना है।

अब तो बस यही चाह है मेरा एकांत जो अब तक उचाट है, उदास है,वह भी सम्यक भाव को प्राप्त हो…बुद्धत्व को प्राप्त हो…

बुद्धत्व कोई आनंद की अवस्था है?

न! यह आनंद और दुख,दोनों से पार की कोई अवस्था है। प्राप्त हुआ तो बताऊंगी अगर बताया जा सकता हो!

दर्शन तो कहता है यह अनुभूति वर्णन के परे की अनुभूति है…





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