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19/06/2025

मां जब बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि फिर पहले जैसी न हुईं,उन्हीं दिनों की बात है जब देह में एक अनजाने रोग ने दस्तक दी।दस्तक ही इतनी जोरदार थी कि लगा आगे क्या होगा।इन भय से भरे दिन में जब मां से मिलने गई किंतु बता न सकी कि मैं कितने दर्द में हूं,तभी कि बात है।

बीमारी से पहले मां को न रोग बताने पड़ते थें न पीड़ाओं की गहराई,चाहे वह देह पर लगी हो या मन पर।न जाने कौन सी पढ़ाई उसने कहां से की थी कि कुछ कहना नहीं पड़ता था गो वह जानती थी कि मुझे शायद कहने नहीं आता या कहूंगी नहीं।

तब दर्द से रातभर जगने के कारण अगली सुबह जब शरीर के कुछ कदम चलने में भी सहयोग देने से मना करने पर मां के बगल में लेटी।तब स्वयं पर जीवन में पहली बार दया आई।मन इस वेदना से मनो भारी हो गया कि अब दर्द को बिना कहे कोई समझने वाला नहीं है।अब बीमार पड़ने पर कोई दौड़-दौड़कर दवा लाने वाला नहीं है।

वह पहली बार था जब बीमार पड़ने पर स्वयं पर रोना आया।अब भी बीमार पड़ती हूं,बीमारी में रोना आता है किंतु अब खुद पर उस दिन जैसी दया नहीं आती।अब कहने का सहूर भी आ गया है।यह न कहना भी कृतघ्नता होगी कि जीवन के सामाजिक दायरे ने ऐसा खुशनुमा विस्तार किया कि अब सुनने-समझने वाले प्रिय भी हैं।

किंतु उस दिन की,उस भाव की और उस बीमारी से उपजे दर्द की स्मृति ज़ेहन में इतनी ताजी है कि लगता है कल की‌ ही बात है।जबकि मां को देह त्यागे आज सात बरस हो गए हैं।न जाने मां की स्मृतियां इतनी गाढ़ी हो गईं या देह स्मृतियों का बोझ उठाते थक गया है कि वह रोग पुराना फिर से लौटा है और लौटने का दिन भी क्या चुना,जब आज मां की पुण्यतिथि है।

खैर, मां को दसबजिया फूल बहुत पसंद थें।सो उसकी पसंद के फूल इस ब्लॉग पर लगा रहीं हूं कि यह भी संजोग कि इन दिनों मेरा डेरा दसबजिया से रौनक पाए हुए हैं।विनोद कुमार शुक्ला लिखते हैं-’दीवार में एक खिड़की रहती थी’।मैं लिखूंगी कोई पुस्तक तो कहूंगी-’खिड़की में रंग-बिरंगे दसबजिया फूल रहते हैं’।


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Hamesha ki tarah umda lekhan is bar tis ke sath. Sajha pida

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