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जीवन की विधा

 कला(Arts) और मानविकी(Humanities) विषयों के छात्रों को तीन बातों में पारंगत होना चाहिए।(यूं तो प्रत्येक व्यक्ति को इन तीन बातों में कुशल होना चाहिए।)

(1) लेखन (2) वक्तृत्व कला या बोलने की कला(3) आलोचनात्मक पाठ।

उपरोक्त तीन में से दो में तो कुशल होना ही चाहिए।

किंतु प्रश्न उठता है कि ये हम सीखें कैसे?

यद्यपि आज तमाम तरह के कोर्स उपरोक्त तीनों विधा पर आधारित उपलब्ध हैं।नई शिक्षा नीति में तो इनपर आधारित कोर्स अब स्नातक के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं।मैं जब उन कोर्सेज के नाम देखती हूं तो थोड़ा अफसोस होता है कि हमारे ज़माने में ऐसा क्यों न था!उस समय कुछ पर्सनालिटी डेवलपमेंट के कोर्स होते थें किंतु जहां तक स्मरण आता है, उसके लिए अलग से कोर्स करना पड़ता था।वह सामान्य पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं ही होता था।तिसपर जिसकी फीस भरना हम जैसे मध्यमवर्ग के विद्यार्थियों के लिए संभव नहीं था।खैर,

ऊपर उल्लिखित कला से संबंधित एक पाठ्यक्रम का उदाहरण यहां दे रहीं हूं,जैसे - पटकथा लेखन,अंग्रेजी में creative writing.इसके अतिरिक्त अन्य भी उपरोक्त शैलियों पर आधारित कोर्सेज हैं।मैंने उदाहरण के लिए केवल एक नाम दिया है) इनके नाम ही मुझे बड़े सुंदर लगते हैं। मानो पाठ्यक्रम बनाने वाले ने बड़ी रूचि से इनके नाम रखे हैं।

किंतु मूल प्रश्न है कि आज उपलब्ध तमाम तरह के पाठ्यक्रम लेखन,आलोचनात्मक पाठ और वक्तव्य कला में पारंगत बना सकते हैं?कम से कम उपरोक्त तीन में दो में तो पारंगत होना चाहिए।

किंतु मुझे लगता है इन तीनों कलाओं का वास्तविक शिक्षक तो हमारा संघर्ष है।ये तीन विशेषताएं कोई स्कूल और विश्वविद्यालय हमारे अंदर उत्पन्न नहीं कर सकता। संघर्ष और बार-बार संघर्ष करने का जज़्बा ही हमें यह सीखा सकता है। बार-बार हारना और हारकर,निराश होकर भी अपने संघर्षों को,अपनी हार को,अपनी निराशा को रचनात्मक दिशा देना, हमें यह कला सीखा सकती है।कोई स्कूल या विश्वविद्यालय जो सिखाएगी,इसकी तुलना में कम ही सिखाएगी।

बोलने,लिखने और आलोचनात्मक पाठ की कुशलता,यह हमारे भीतर तब आएगी जब जीवन आपको बार-बार हराए,संघर्ष कराए किंतु आप श्रीकृष्ण की तरह इतने आत्मविश्वास से भरे हों कि हर संघर्ष और हर हार को मुस्कुराकर कहें कि,”तुम अभी ठीक से मुझे नहीं जानते,मैं वापस लौटूंगा/लौटूंगी और वापसी के लिए तुम्हीं एक दिन आवाज़ दोगे’,तब मैं वापस आऊंगा’।

यदि कोई विद्यार्थी इस पोस्ट को पढ़ रहा हो तो उससे यही कहना है कि प्लीज़ अच्छा पढ़ना,अच्छा लिखना और अच्छा बोलना सीखिए।यह आवश्यक है ताकि आप उस युद्ध को जीत सकें जिस युद्ध की विजय जीवन में आपको आत्मनिर्भर बना सके।आपके अंदर वह आत्मविश्वास उत्पन्न कर सके कि आप जो चाहते हैं,वह कर सकें।अंततः जीवन-संघर्ष में वही युद्ध और उसकी विजय ही महत्वपूर्ण है।फिर आप से पिछली पराजयों का कोई हिसाब नहीं लेगा।

इति।।

तस्वीर: मेरे मित्र द्वारा खींची गई है और कितनी सुंदर खींची गई है!अहा!!


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