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उदास दिन...

मैं अक्सर बेहिसाब उदासी से भर जाती हूं।इतनी उदास कि इस उदासी से दुनिया में एक नया महासागर बन‌ सकता है और दुनिया के नक्शे में पांच महासागर की जगह कुल छह समंदर हो जाएं।जब मैं कहती हूं किसी अपने से कि बहुत उदास हूं तो वह मुझे समझाता है कि फलां-फलां कारण से उदास हो और फलां-फलां काम करो,मन लगाओ तो उदासी दूर हो जाएगी। गोया उदास होना बहुत बुरी बात हो।कोई नहीं मिलता जो ये कहे कि ओह!उदास हो!अच्छी बात है,रहो उदास और इस दुनिया की चिंता मत करो।यह उदासी तुम्हारी यानि मेरा किरदार है इस दुनियावी रंगमंच पर।

वर्ष भर के किन्ही‌ कमजोर दिनों में मैं अपनी उदासी को साधने में नाकामयाब होती हूं और तब उन दिनों में मैं अपने पसंदीदा गाना नहीं गा पाती‌ हूं।उन गीतों को भी नहीं जो प्रसन्नता के दिनों में बड़े सुर में निकलते हैं।उदासी‌ भरे गीतों के तो बोल तक नहीं फूटते कंठ से जबकि मुझे लगता है मेरी आवाज़ पर वे ही गीत अधिक फबते हैं।इन बेहद गहरे उदास दिनों में कुछ लिखा‌ भी नहीं जाता।शब्द कहीं खो जाते हैं।अर्थ अपनी अभिव्यक्ति में असमर्थ से हो जाते हैं।उथले से वाक्य बनते हैं और बेहद छिछले से वाक्यांश।और कलम!साध लेती है चुप्पी।

वह जो बेहद प्यारा है खुद को,उससे कुछ कह के उसे परेशान करने का मन नहीं करता इन दिनों में जबकि प्रसन्नता से भरे दिनों में उसी से बातें करते वक्त का पता नहीं चलता।मैं तलाश करती हूं फोन के संपर्क सूची में कि कोई है जिनको इन उदास भरे दिनों में फोन किया जा सकता है?जिससे यह बताने की आवश्यकता भी न पड़े कि इस समय मन में क्या भाव पक रहे हैं।

मैं पुस्तकों में सहारा ढूंढती हूं किंतु नाकाम रहती हूं।अपनी असफलताओं,नाकामियों,दुखों,अपमानों-तानों के अध्यायों को पलट कर देखती हूं तो और भी उदास होती हूं।

मैं सफलता,प्रशंसा,सम्मान,प्यार -दुलार के अध्यायों को भी देखती हूं जिससे उपजती है एक ऊब!एक निरर्थकता का‌ बोध,एक भावशून्यता कि‌ सफलता से उपजे परिणामों से मैं पीछा भी नहीं छुड़ा सकती वर्तमान जीवन में और बाकी सब से जीवन की भौतिक आवश्यकताएं पूरी नहीं की जा सकतीं।

फिर भी किसी को मुझसे मिलना हो तो वह‌ इन दिनों में मुझसे मिले क्योंकि इन दिनों मैं अपने सबसे वास्तविक स्वरूप में रहती हूं।इस उदास मनुष्य को तुम झेल सकते हो उसको इस तरबियत में तब कहना कि तुम्हें मुझसे प्यार है।किंतु अपने जोखिम पर आना‌।अगर उदासी के समंदर में डूबे जाने का माद्दा हो और फिर निकल आने का हूनर भी आता हो,तभी आना।

मुझे ऐसा भी लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि "उदासी",इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं!यह अब तक के कहे गये सबसे व्यर्थ शब्द और इस शब्द से बने वाक्य अब तक के कहे गए सबसे व्यर्थ के वाक्यों में से एक हो!

मैं विट्गेंस्टाइन की कोई पुस्तक देखती हूं कि इस विरले दार्शनिक ने ऐसे किसी वाक्य की व्याख्या की है क्या?कहीं ऐसा तो नहीं कि "उदासी" यह शब्द भी ईश्वर,सत्ता,अस्तित्व,शून्य इन शब्दों जैसे हो जो कुछ होने का भ्रम उत्पन्न तो करते हैं किंतु है ये योगदर्शन के विकल्प जैसे?जिनका कहीं कोई अर्थ नहीं,कोई संगत तात्पर्य नहीं।

यह भी संभावित है कि कोई चिकित्सक यह कहकर हमारा मजाक उड़ावे कि उदासी जैसा कुछ नहीं होता,शरीर में फलां विटामिन्स की कमी से ऐसा अनुभव हो रहा है और दवा की कुछ गोली मेरी दार्शनिक बुद्धि पर प्रश्न चिन्ह लगा दे?

किंतु अगर ऐसा नहीं तो चित्त की यह अवस्था आखिर है क्या और यह अवस्था होती है क्यों?

तब मैं लौटती हूं अपने प्रिय दार्शनिक सार्त्र की ओर,काफ्का की ओर। मैं बौद्ध और वेदांतिक आचार्यों के ग्रंथों-भाष्यों में भी ढूंढती हूं वह डोर जो इस अनसुलझी गुत्थी को सुलझा सके।

देखते हैं कुछ मिलता है या फिर से हाथ लगते हैं यही बेहद उदास दिन!


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