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समय से छले गए हमलोग...


बहन-बेटियों के लिए मायके की धूल भी स्वर्ण जैसे प्यारी होती है।फिर मायके में कोई दुखद घटना घट जाए और पता भी न चले तो ह्रदय धक् से दुख के गहनतम तल पर जा धंसता है।या कोई अच्छी बात घटे तो उसे सुनकर प्रसन्न होती हैं किंतु इस प्रसन्नता में एक दबी सी आह छिपी होती है कि वे क्यों न सम्मिलित हो पाईं उस सुख या दुख में।उस दुख को बांटने या कहें कि उससे निकलने के लिए और वर्तमान में आने के लिए बहनें जो अलग-अलग देश में ब्याह दी गई हैं,एक-दूसरे से बातें करती हैं,पुराने दिनों को याद कर कभी रोती,कभी हंसती हैं।लेकिन इन तमाम बातों के बीच भी यह बात उन्हें अधिक सालती है कि फलाने आजी-बाबा,फलाने भैय्या-भौजी (और तमाम इस तरह के रिश्ते) अब नहीं रहें और यह खबर बेटियों तक देर से पहुंची।बेटियां सच में एकदिन इतनी परायी हो जाती हैं कि घरवाले गाॅंव-जवार की खबर देना भी बेटियों को आवश्यक नहीं समझतें।

एक समय बाद वह घर जहां जन्म लियें,वह‌ गाॅंव,गाॅंव के लोग जिनके बीच पलकर बड़े हुए,रोते-रोते जिनसे यह कह कर विदा ली कि अब हंसते रहेंगे और अब जब अरसा बीत गया मायके गये तो जाने पर उनमें से कुछ से भेंट होगी,न होगी,कौन जाने!

बहरहाल,बीते दिनों गाॅंव से खबर आई कि फलां व्यक्ति न रहें। बहनें इस आश्चर्य में कि आज चार दिन पर उन्हें बताया जा रहा है।उससे अधिक दुख में कि ओह!यह तो उम्र नहीं थी अभी जाने की।तिसपर अब यह चिंता भी‌ कि पड़ोस का ऐसा व्यक्ति चला गया जो पिताजी के जमाने से आजतक परिवार के साथ खड़े रहें।जीवन के अनगिन उतार-चढ़ाव उस परिवार ने देखें,अनगिन उतार-चढ़ाव मेरे परिवार ने। किंतु इन सबमें जो सामान्य बात थी वह कि दोनों परिवार सुख-दुख में साथ रहें थें।

आगे की अब कौन जाने!

बहनों ने मुझे फोन किया,दुख व्यक्त किया।वे एक वेदना से गुजर रही थीं अपने -अपने दुःखों को कहते समय।एक जमाना जिसमें उनका मायका था,गांव था,मां -पिताजी थें,गाॅंव-जवार के लोग थें, क्रिकेट की,राजनीति की चर्चाएं थीं,वह जमाना अब नहीं रहा।

अब गाॅंवों में भी वह आत्मीयता न रही जिसकी याद बहनों को साल रही थी।

खैर, मैंने उन्हें दुखद यादों से कुछ सुखद यादों की ओर ले चलने का प्रयास किया।उनकी शरारतों की उन्हें याद दिलाई।तब बचपन के किस्सों की श्रृंखला शुरू हो गई। मैं सुनती रही।मैं तब भी न बोल पाई जब वे मुझसे पूछती कि 'तुम्हें फलां व्यक्ति याद हैं?',फिर मेरे कुछ कहने से पहले खुद ही जवाब दे देतीं कि "तुम्हें कैसे याद होगा तब तो तुम मेरी गोद में थी या कि बहुत छोटी थी।"

अंतत: वे वर्तमान में लौटती हैं मन की एक दीर्घ शल्यक्रिया के उपरांत और तब एक ठंडी आह भरकर कहतीं कि 'तुम लिखो इसपर कुछ।तुम्हें लिखना चाहिए' वस्तुत: वे एक और आसरा ढूंढती हैं जहाॅं रूककर वे बीते हुए को जी सकें।मैं उनको कहती,'हां प्रयास करूंगी।'

मैं जो उनको सुनते हुए सोच रही थी यह संसार एक निरंतर जलती हुई भट्टी है जिसमें आत्मा जाने कैसे और कब गिर गई।उसकी स्मृतियां उस भट्टी की ईंधन बनती हैं और मन-देह उन स्मृतियों से उत्पन्न ऑंच को महसूस करने का माध्यम।

अमरीकी कवयित्री लुईस ग्लूक की कविता का एक अंश ध्यान में आता है कि, “हम दुनिया को एक बार देखते हैं,बचपन में।बाक़ी सब स्मृतियाँ हैं।”अहा!कितना सच लिखा है।

कभी-कभी लगता है यदि समय का अस्तित्व होगा तो वह अवश्य ही कोई मायावी होगा।यह जीवन समय में घटित होता है किंतु यदि स्मृतिचिह्न न हो तो कोई चिह्न न होगा बीते हुए जीवन का।समय एक क्रूर शासक की तरह अपनी धार में सबकुछ बहा ले जाता है।

मैं सोचती हूं पीड़ा इस बात की नहीं है कि कुछ था जो बीत गया है।शोक इस बात का है कि वह जीवन जो कितना ठोस था, भोगा हुआ यथार्थ था,वह अब भी है किंतु इतना आभासी,इतना अवास्तविक कि हम उसे अब बस स्मृतियों में ही जी सकते हैं।उसे छू भी नहीं सकते,बस सोच सकते हैं उसके बारे में।

हम समय से छले गए लोग हैं।





Comments

Anonymous said…
हकीकत बयां करती हुई पंक्तियां...
🙏🙏

Anonymous said…
Nice 🙂

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