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देवभूमि_उत्तराखंड 🏞️

इस बरस जब इन पहाड़ों पर जाना हुआ तब धूप अब अपने कोमल रूप में आ गई थी और इस कोमलता ने मन की कठोरता को हर लिया था।देवभूमि के पहाड़ों-झरनों और पांत में खड़े देवदार और चीड़ के वृक्षों से मिलकर ऐसा लगता है जैसे मन के भीतर का ख़ाली कटोरा लबालब हो गया हो किसी जादुई चीज़ से।ऐसा खाली कटोरा जिसे अपने भीतर लिए हर रोज़ घूमा करती हूँ बेचैन-व्याकुल। और मेरी सब बेचैनी -व्याकुलता,सब चिंताएं,मेरे मन के सब कलुष,मेरी ईष्याएं कपूर की मानिंद उड़ जाती है देवभूमि के स्पर्श मात्र से और आत्मा ऐसे धूल कर स्वच्छ हो जाती है जैसे कभी मलिन हुई ही नहीं थी।

ऐसा अनुपम सौंदर्य इस स्थल का जिसको व्यक्त करने हेतु मेरे पास वैसी भाषा नहीं है।कठोर उदासी ओढ़े अपने एकांत से घिरा हर पहाड़ साधना में रत कोई साधु जैसे दिखता है।हरे रंग को भी जो लज्जा में डाल दें ऐसी हरितिमा युक्त अरण्य।कहीं पहाड़ों का सीना छलनी करते हुए तीव्र रूप में बहते झरने हैं तो कहीं पतली-दुबली काया वाले झरने।यही हाल पहाड़ी नदियों का है।कहीं इतनी कोमल,इतनी दुबली जैसे अब अगली बार आने पर ये अदृश्य हो जावेंगी अथवा छू लेने भर से मुरझा जायेंगी!कहीं कल-कल करती इतने तीव्र रूप में प्रवाहित कि बड़े-बड़े चट्टानों को यूं बहा ले जाती हैं जैसे समय हमें बहाए ले जा रहा है और हम कुछ नहीं कर पाते सिवाय स्वयं को गुजरते हुए देखने के।

ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर एक अनुशासन और धैर्य से खड़े देवदार और चीड़ की श्रृंखला।समझ में ही नहीं आता कि किसने किसको थाम रखा है!पत्थरों ने वृक्षों को या वृक्षों ने कठोर पत्थरों को!किंतु जिसने जिसको थाम रखा हो क्या अंतर पड़ता है!सबका गुरु एक है स्वच्छ-धवल नीला आसमान जो पहाड़ों -वृक्षों के कर्णो में झुक-झुक जाने कौन सा ज्ञान देता रहता  है हर बखत!किंतु इन्हें देखकर लगता है संपूर्ण देवभूमि सामूहिक रूप से बरसों से एक लंबी-गहरी सघन साधना में डूबा हुआ है।

संपूर्ण देवभूमि का एक-एक स्थल घूम आइए,एक भिन्न ही प्रकार की सुगंध से युक्त है यहां का कण-कण।संभवतः यह सुगंध आध्यात्मिकता की है जिसे मैदानी क्षेत्रों में हमने प्रदुषित कर दिया है कि ये अनन्य उपहार प्रकृति ने उत्तराखंड को ही दिया है!

मैं जब इन पहाड़ी रास्तों से गुजरती हूं तो लगता है कि मेरे पास यदि होती महादेवी वर्मा सी करूणा,जयशंकर प्रसाद जैसी भाषा की प्रबुद्धता,पंत जैसी भाषा की कोमलता और निराला जैसी होती भावों की सघनता!अथवा हिंदी के छायावादी युग के साहित्यकारों जैसे होती प्रकृति के सूक्ष्म किंतु मनोहारी चित्रण की प्रतिभा!या कि मेरे पास होती अज्ञेय जैसी प्रखर सृजनात्मक मेधा या कि निर्मल वर्मा जैसे चित्त के सूक्ष्म भावों को पकड़ने और उनको भाषा में व्यक्त करने का कौशल या मुझको आता विनोद कुमार शुक्ल जैसे शब्दों से जादुई संसार रचने का जादू तो मैं एक पूरी पुस्तक लिखती इस देवभूमि पर।अथवा मैं जीवन भर लिखती ही रहती इन पहाड़ों-पर्वतों पर कि दुनिया केवल हिम्मत से चलती है इसलिए कभी मत हारना हिम्मत,कड़ी धूप,प्रचंड वर्षा में भी।मैं लिखती नदियों -झरनों और यहां के तालों पर और कहती कि निरंतर चलते रहना ही जीवन है,कोई बिछड़े,कौन मिला,इससे बेपरवाह रहकर।मैं लिखती चीड़-देवदारों के अनुपम सौंदर्य और उनके अनुशासन पर कि धैर्य ही कुंजी है जीते रहने की।

मैं लिखती और प्रसिद्ध पाती आदि कवि कालिदास के जैसे और मेरी रचनाएं उनकी रचनाओं के जैसे पढ़ी जाती सारे संसार में।जिसे पढ़कर लोग बुझते इस अनुपम सौंदर्य के स्रोत को।तृप्त होतीं मनुष्यों की आत्माएं इनके सौंदर्य राशि का पान कर।लोग कहते,अहा ऐसा सौंदर्य!यह तो स्वर्ग के सौंदर्य को भी लजवा दे!कि यह समस्त पृथ्वी क्यों न हुई देवभूमि उत्तराखंड जैसी पवित्र।

संपूर्ण देवभूमि में सौंदर्य ऐसे बिखरा पड़ा है जैसे शुक्र ग्रह अपने सौंदर्य का खजाना लेकर कहीं जा रहे हों और रस्ते में उनके खजाने का ढक्कन खुल गया और वह अपूर्व सौंदर्य राशि इस जगह बिखरती ही चली गई!

मेरी इच्छा है एकबार जब जाऊं देवभूमि के सबसे बीहड़ स्थल, वहां से लौटकर न आना हो।वहीं कहीं खो जाऊं।किसी झरने में बह जाऊं या कि भागीरथी अपने किसी नाम राशि में डूबो ले मुझे।अलकनंदा,मंदाकिनी!जिह्वा से उच्चरित करते हुए लगता है नाम है या कोई जादू।जैसे कोई रसभरी मिठाई रख ली हो जिह्वा पर जिसकी मिठास केवल गले को तर नहीं करती बल्कि आत्मा भी भर जाती है अकथनीय मिठास से।जिसकी मिठास वैसे ही अनिर्वचनीय है जैसे गूंगे के लिए गुड़ का स्वाद बताना।

ऐसा प्रतीत होता है कोई अदृश्य देव हैं जिनके जिम्मे ईश्वर ने बस इस जगह की निगेहबानी सौंप रखी है कि 'हर पहर खुले नेत्रों से इस जगह के सौंदर्य की रक्षा करनी है और तुम्हें कोई काम नहीं है'।काश मुझे भी ईश्वर कहता कि तुम बस इन उत्तराखंड की पहाड़ियों में खो जाओ और इनके अनुपम सौंदर्य का बखान अपनी कलम से करती रहो अनंतकाल तक।

यद्यपि भारत के विभिन्न आध्यात्मिक स्थलों को जब चक्रों में विभाजन किया जाता है तब हरिद्वार को मूलाधार चक्र का केंद्र माना गया है।परमात्मा का द्वार अथवा हरि का द्वार।एक तरह से यह ठीक भी है मूलाधार चक्र अर्थात जब देह-मन की जड़ता टूटती है और जीवन में उत्साह का संचार आरंभ होता है।व्यक्ति आध्यात्म के क्षेत्र में अब प्रवेश करने योग्य हो गया है।किंतु मुझे प्रतीत होता है मानो उत्तराखंड जैसे सहस्त्रार चक्र में विद्यमान सहस्त्र दल वाला कमल का पुष्प है जो पहाड़ों की धूप की संगत पाकर बरसों से खिला हुआ है।हमीं हैं कि माया में फंसे हुए हैं और ज्ञानोदय के इस चक्र में प्रवेश नहीं कर पा रहें।यह कचोट तो और भी चित्त को घायल करती है कि मैं इस सहस्त्रार चक्र में एक पर्यटक की तरह आती हूं।

किंतु इस अनुपम सौंदर्य राशि में पुनः-पुनः डूबकी लगाकर लौटना धनी होकर ही लौटना होता है और यह धन ऐसा है कि जिसे कोई भी,कभी भी लूट नहीं सकता।ईश्वर इस देवभूमि की सुंदरता को,इसकी अबूझ किंतु गहन चेतना को प्रलयकाल में भी बनाए रखें और अनंतकाल तक बनाए रखें।ताकि जब-तब अवसर मिले,मैं लौट-लौट यहां आती रहूं और एक दिन इसके सबसे बीहड़ में खो जाऊं...

यूं तो मोबाइल की गैलरी में सैकड़ों तस्वीरें हैं देवभूमि की किंतु उस स्थल के अनुपम सौंदर्य को और उसकी पवित्रता को व्यक्त करती यह तस्वीर हरिद्वार की मित्र शगुफ्ता नाज़ जी के सौजन्य से मिली।फिलहाल इस पोस्ट में उसी तस्वीर को टांक रहीं हूं...


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