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पुस्तकें...

बचपन में मेरी और दूसरों की भी मेरे बारे में यह भावना थी कि मुझमें कुछ कम बुद्धि है।मुझे भी अपनी बुद्धि कुछ मंद ही लगती।कई बार मुझे समझ नहीं आता था फलां स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए था!लोगों की मुझसे जो अपेक्षाएं होती थीं मैं समझ न पाती थी बहुधा।जब कोई कुछ पूछता तो मुझे स्पष्ट नहीं रहता था क्या कहना है अथवा क्या उत्तर देना है।कई बार जब उत्तर देने या कुछ कहने की कोशिश की भी तो वह बहुत अस्पष्ट और उस उत्तर से दूसरों को मेरे बारे में कम बुद्धि की सोच को बल ही मिलता था।चार लोगों के बीच जाने में मेरे हाथ-पांव फूलने लगते थें।भीड़ मेरे आत्मविश्वास को रसातल में ले जाती थी।जब बचपन में कोई मज़ाक उड़ाता तो आंखें नम हो जाती थीं।कोई प्यार से बोलता तो भी आंखें नम हो जाती थीं।

गांव-जवार का कोई रिश्तेदार घरपर आता तो मां से कहता कि 'तोहार दूसर लईकन जइसे अन्नू ना हईन।एनपर धियान दा'।मेरे अत्यंत दुबले होने का भी मज़ाक उड़ाया जाता या मुझपे दया दिखाई जाती।जो मुझे कुछ रोष से भर देता और मुझे स्वयं पर दया आने लगती।कुल मिलाकर ऐसा लगता,'ये दुनिया,ये महफ़िल मेरे काम की नहीं'।आभास होता कि कहीं किसी अनुपयुक्त स्थान पर आ गई हूं या कि मेरी अयोग्यता मुझे समायोजित नहीं होने देती इस संसार से।

किंतु अब तो फेंक दी गई थी संसार में तो जीवन को निभाना ही था।तब आसरा मिला समाचार-पत्रों में,कथा-कहानियों में, कविताओं में,पुस्तकों में।इससे बेहतर कोई आसरा है भी नहीं। पुस्तकें न होती तो क्या होता इस दुनिया में!क्या करता मेरे जैसा कोई इस दुनिया में!कहां आसरा पाते मेरे जैसे लोग!जो यह बौद्धिक संपदा न होती और क्या होता संसार में जो इतना अनमोल होता!

कितनी थोथी और खंख होती यह दुनिया! मूल्यहीन,नीतिहीन,ज्ञानहीन होती यह दुनिया!


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