ह्रदय के भीतर एक पहाड़ है रूखेपन का।करीब से जानने वाले अक्सर उस रूखेपन के पहाड़ से टकराते हैं।उस पहाड़ के पार एक नदी बहती है जिसका उद्गम स्रोत जाने किस पूर्वजन्म में है।जातिस्मरता की कुंजी गहन साधना के पास है। किंतु जो मुझसे दूर,बहुत दूर है।
नदी में एक कंकड़ के जैसे कोई छल,कोई दुख,कोई चोट आ गिरता है और लहरें फैलती जाती हैं नदी की देह पर।वैसे ही कितने दुख,कितने चोट,कितने छल लहर उठाती है मन में। कौन जाने किस चोट पर कौन सा पुराना दर्द उभरता है।पता भी नहीं चलता कि किस दुख पर पहाड़ जैसा ह्रदय कहीं जरा सा नमी पा गया था।मन से अस्पर्श योग सधता नहीं है और अमनी भाव का सरल सूत्र देने को कोई गुरु मिलता नहीं।
पहाड़ जरा सा कहीं दरकता है,कोई पत्थर कहीं से स्खलित होता है।किंतु वह वहां नहीं गिरता कि नदी के स्रोत का मुख बंद कर दें!वह नदी में जाकर गहरे धंसता है और नदी मसक उठती है।
इधर नौतपा चल रहा है।कहते हैं सूर्य इन दिनों अपने सबसे पराक्रमी रूप में रहता है। किंतु सूर्य का पराक्रम कुछ कम हो गया है मानो।रोहिणी का सूर्य कमजोर पड़ गया है जरा सा!तप खंडित हुआ मार्तण्ड देव का जरा सा!और मैं भी इधर जीवन के सम्मोहन में फंस गई हूं।नदी भी कुछ गहरा गई है सूर्य के ताप के कम होने से।
किंतु पहाड़ ने नदी की रक्षा की है सदा! वहां कोई खर-पतवार नहीं है, नदी की सतह ऐसी है कि आपको तल दिखेगा नदी का। किंतु लोग तो लोग हैं, पहाड़ों से टकराकर लौट जाते हैं।
मेरा ह्रदय जैसे कोई पहाड़ी शहर जिसके समानांतर एक नदी भी बहती है।

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