वर्ष 2011 - 12 की बात है;तब संघर्ष के दिन अपने पूरे यौवन पर थें।उन्हीं दिनों में बहन के घर से (बहेड़ी) जो उन दिनों डेरा था मेरा, से कार्यस्थल (बरेली) तक (जिसकी दूरी करीब पैंतीस किमी थी) रोज़ आना-जाना होता था।यात्रा का साधन कभी बस और अधिकतर रेलगाड़ी होती थी बहेड़ी से बरेली तक की रेलगाड़ी की यात्रा में करीब छोटे-छोटे सात-आठ स्टेशन पड़ते थें।किंतु मुझे उनमें बस एक ही नाम स्मृति में रहा,इज्ज़तनगर।
स्मरण रहे जाने के दो कारण थें -एक तो नाम में ही जिसके इज्ज़त हो,उसे न याद रखना एक तरह से विश्वासघात ही होता अपने अतीत से और दूसरे इस स्टेशन या कहें छोटे से स्थान का स्थानीय लोगों द्वारा उच्चारण।वे इसे ऐजेडनगर कहकर बुलाते।अब भी बुलाते हैं,नहीं पता।मैं घर आकर अक्सर इस बात की खीझ बहन के सामने उतारती कि अच्छे भले नाम को लोग क्यों बिगाड़ते हैं!खैर,
उन दिनों इस स्टेशन की हालत मुझ जैसी ही थी!समय का तंगहाल दौर!कमतरी के दोपहर,विषाद में डूबीं रातें,पीड़ाओं में आकंठ डूबा देह और मन।दोनों के बेतहाशा तपने के दिन थें। मौसम कौन सा रहे,इससे अंतर नहीं था।
उन्हीं दिनों,घर से कार्यस्थल जाते समय ट्रेन में जब कभी बैठने की जगह मिल जाती,तब इस छोटे से स्टेशन पर ट्रेन के रूकने पर एक सुंदर नाम को धारण करने वाले किंतु यत्र-तत्र फैली गंदगी को खुद की देह पर बर्दाश्त कर रहे इस छोटे से स्टेशन को देखकर सोचती कि क्या कभी यह स्वच्छ हो सकता है? कभी कोई प्रशासक इसके सुंदरीकरण पर ध्यान देगा?मानो मैं उस स्टेशन के बहाने स्वयं के लिए भी सोचती कि क्या मेरे भी दिन कभी बहुरेंगे?नियति के खेले का पासा क्या कभी मेरे हक़ में गिरेगा? इन्हीं सोच में लगभग एक वर्ष का सफर हुआ और हरदिन एक ही प्रश्न खुद के लिए,इस छोटे से स्टेशन के लिए।
किंतु नियति से निरंतर लड़ते हुए मन ने एकदिन कहा,अब बस!अब अपने शहर लौट चलना चाहिए।मन ने कहा और एकदिन बहन-जीजा को कहकर कि 'अब जाती हूं,दिल नहीं लगता यहाॅं'।उस छोटे से स्टेशन को उसकी बदहाली में छोड़कर और अपनी तंगहाली को कंधे पर लेकर आखिरकार एक दिन वहां से अपने शहर लौटी।
शहर बदला किंतु कहानी ऐसे ही चलती रही धक्के खाने की एक शहर से दूसरे शहर में।धक्के बसों की,रेलगाड़ियों की और लोगों के तानों की भी।शायद ये धक्के ही थें जो मुझे आगे धकेल रहे थे जबकि अंधकार के अतिरिक्त उन दिनों मुझे कुछ सूझता नहीं था।तब उन तानों को ही अपना प्रकाशयंत्र बना लेती थी।
लेकिन कहते हैं न कि घूरे के भी दिन बदलते हैं और एकदिन दिन बदला,समय ने करवट ली।संघर्ष के दिनों ने विराम लिया।उधर जीजाश्री के स्थानांतरण के कारण अब बहन और जीजाश्री बरेली आकर रह रहें थें।वे मुझे निरंतर बुलाते रहें।लगभग आठ बरस बाद मैं जब बरेली गई,तब जीजाश्री ने बताया कि इज्जतनगर स्टेशन यहां से पांच मिनट की दूरी पर ही है और बहुत सुंदर बन गया है।लोग अब सुबहो-शाम वहां टहलने के लिए जाते हैं। मैंने यूं ही अनमने भाव से सोचा क्या ही बदला होगा!फिर एकदिन बहन के कहने पर और भांजी के चाय पीने की जगह की खूबसूरती का वर्णन करने के बाद अंततः चली ही गई काॅलोनी से निकलकर,सड़क को पारकर अतीत के घर में। जैसे ही उस छोटे से स्टेशन के परिवेश में प्रवेश किया,अतीत मानो चलचित्र के जैसे समक्ष चलने लगा।
मैं प्रसन्न हुई।उससे अधिक आश्चर्यचकित थी क्योंकि मुझे विश्वास नहीं था कि यह वही इज़जतनगर स्टेशन है। किंतु प्रसन्न और आश्चर्य होने से अधिक शायद बहुत भावुक कि मैंने ऐसा क्यों सोचा कि क्या ही बदला होगा!जब जीवन ने मुझे एक सुंदर मोड़ दिया तब भला इस छोटे से स्टेशन की सूरत क्यों न बदलेगी।आज़ यह छोटा सा स्टेशन इतना सुव्यवस्थित,इतना सुन्दर बना है जिसकी सुंदरता का वर्णन मुझे एक अलग पोस्ट में करना होगा।रेलवे के डिब्बे में बना छोटा सा सुंदर रेस्तरां,एक कोने में छोटा सा टी-कैफे,जिसके बाहर से बैठकर देखने पर एक ओर से रेलगाड़ियां आती-जाती दिखेंगी और एक ओर से सूरज़ ढलता हुआ। थोड़ी-थोड़ी दूर पर चंपा के फूलों से लदे पेड़ दिखेंगे।दिखेंगी साफ-सुथरी खाली बेंचें अपने यात्रियों की प्रतीक्षा में रत।एक ओर बच्चों के खेलने के लिए गेम-जोन। छोटे से स्टेशन पर आपको एक्सीलेटर दिखेगा,दिखेगी रौशनियों में नहाती हुई रातें।रात को तो स्टेशन ऐसा चमकता है कि बड़े शहरों के बड़े स्टेशनों को लजा़ दे।
स्टेशन की राहें इतनी साफ कि आप जहां दिल करे,बैठ सकते हैं बेतरतीब होकर।छोटा स्टेशन होने के कारण बहुत भीड़ तो नहीं होती किंतु कुछ-कुछ देर के अंतर पर वह आपको याद दिलाएगी कि मैं कौन हूं।एक ओर आपको रेलवे की तमाम बेकार चीजों से बनी हुई दिखेंगी तमाम कलाकृतियां।जिन्हें देखते हुए मैं सोचती हूं कि कुछ भी बेकार नहीं होता।आप उन तमाम कूड़े में फेंक देने वाले सामानों से बना सकते हैं कोई सुंदर कलाकृति।वैसे ही हमारे चरित्र को स्वरूप देने में जितना महत्व अच्छाइयों का है,उतना ही जीवन की कुरूपताओं का भी।
खैर,
इधर जब बरेली में माहौल बिगड़ा तो चिंता हो आई बहन की,जीजा श्री की, शहरवासियों की,उन सबकी जिन्होंने मुझ में तब विश्वास दिखाया था जब मेरा खुद पर विश्वास पेंडूलम की भांति डगमगाया रहता था।चिंता हुई कि किसी के मन की कुरूपता और अराजकता से इस शहर की खूबसूरती न बिगड़े।
आज़ जब बहन ने बताया कि अब सब ठीक है,तब अतीत के इस पन्ने को उलटने का जी चाहा।पन्ने पलटते वक्त बस यही चाहना रही कि हर उस जगह को जहां किसी की बहन हों,जहां किसी के कठिन समय में संबल देने वाले जीजा श्री हों,जहां कार्यस्थल पर एक संघर्षशील इंसान में भरोसा रखने वाले विद्वान सीनियर्स हों,उस जगह को अनंतकाल तक खुशहाल रहना चाहिए।किसी की बुरी नज़र न लगे उस शहर को।
कोई अगर इधर बरेली जाए तो एक काला टीका लगा देगा उस शहर को। बहुत खूबसूरत है वह शहर।
तस्वीर उसी छोटे से स्टेशन के टी-कैफे में बैठकर स्टेशन की खाली पटरियों को निहारते हुए...

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