कुछ तस्वीरें जो ईश्वर को नयी सृष्टि के लिए सहेज लेना चाहिए इस दुनिया के एल्बम से.....
आत्मीय लोग स्मृति बन जाते हैं;प्राण से प्यारे एक दिन प्राण त्याग जाते हैं;लोग सपना बन जाते हैं तो सपने धुआं और सुख कपूर बनकर उड़ जाता है।जीवन को अर्थ देने वाले सब सिद्धांत एक दिन भ्रम सिद्ध होते है फिर मूल्यों की बात क्या कहूं!उम्र को तो बढ़ना ही है,धीरे-धीरे चेहरे की पुस्तक के पन्नों का रंग भी उड़ जाता है।हंसने की अदा भी एक दिन भूलने में आती है।सांसों की धवल धमक एक दिन क्षीण से क्षीणतर और मन पर बोझ लगने लगती है कि वह अब छूटी कि तब छूटी…
शहर-दर-शहर भटकते-भटकते उसे अपनी जवानी दीजिए वो विदा में बेगानापन ही लौटाती है।एक दिन घर लौटने का भी कोई अर्थ नहीं बचता।अंततः एक दिन जीवन इस पेड़ की भांति खंख ही बचा रहता है।यही इसकी नियति है -खंख हो जाना।अहंकार इन दिनों में बूढ़े के लाठी जैसा क्या सहारा बनती होगी?
मैं यही सोच रही थी रास्ते में अपनी खटखटिया स्कूटी रोककर।आने-जाने वाले मुझे देखतें और देखते हुए मानो उनकी दृष्टि व्यंग्यात्मक ढंग से पूछ रही थी मुझसे,"पागल हो क्या"?,उनको उत्तर देती मेरी निगाहें कह रही थीं कि कृपया रूककर मुझसे यही सवाल कीजिए तब तो मैं बताऊं "मैं आपके समय की दार्शनिक हूं"।अपनी ओर से यह सवाल भी उनके समक्ष रखूं कि क्या आपका समय दार्शनिकों को पागल समझता है?
खैर,
यदि कोई पूछता कि यहां रूककर किस चीज़ की तस्वीर मैं उतार रही थी?क्या एक सूखें पेड़ की?इसमें क्या है?मेरा उत्तर होता,"हां इस सूखे पेड़ की तस्वीरें उतार रहीं हूं क्योंकि अपने अनूठे सौंदर्य के साथ यह जीवन की अवस्थाओं की परिणति बता रहा है कि एक दिन ढल जाना है।पेड़ नहीं है केवल;अंधेरी उदास रातों में व्यथा का कोई विलंबित स्वर हो जैसे!यह विलंबित स्वर उस मौन को आवाज़ देती है जो ह्रदय के गहरे खोह में खो गए हैं;यह उजाड़ उस चेतना को जगाती है जो सुषुप्ति से पार पाता ही नहीं"!
लोग कहेंगे,हमें तो नहीं दिखता।तब मैं अपने पूर्वज़ दार्शनिकों का गौरव अपने श्वांसो में भरकर कहूंगी,"आप कैसे देखेंगे?आप दार्शनिक नहीं हैं”।वह एक दार्शनिक ही हो सकता है जो उसको देख लें जो अन्य नहीं देख पातें और यही दर्शन है कि 'जो है' किंतु नजरों से ओझल है,उसे देखना।उसे बताना दुनिया को कि सत्य केवल वह नहीं जो दिखता है। दिखने में बड़ी भ्रांति हो जाती है।उसे तो बड़े जतन से देखना-समझना होता है अन्यथा ऋषि अपने शिष्यों से क्यों कहतें कि "हिरण्यमेन सत्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्"!!
यूं भी प्रकृति शब्दों में स्वयं को अभिव्यक्त नहीं करती;वह संकेतों में स्व को खोलती है।परंतुक दर्शक नहीं साक्षी बनकर उपस्थित होना होगा। जैसे एक दृश्य का यह उजाड़ हमें हमारे होने की स्मृति करता है किंतु तब उपेक्षित कर के,उपेक्षित होके रूकना होगा कुछ क्षण!यह भावनाओं का एक जुदा आयाम है।यूं तो बौद्ध आचार्यों ने सैकड़ों चित्त की वृत्तियां बताईं हैं किंतु एक ये पकड़ में नहीं आती मेरे जो वैशेषिकों के भाव के अभाव के जैसे बसर का उजाड़ देख मन में घर कर लेता है।मेरे लिए यह एक बिल्कुल भिन्न अनुभव होता है जो मुझे मुक्त कर देती यदि माया मुझे खींचकर पुनः संसार की ओर फेंक नहीं देती!
बहरहाल,
किसी ने मुझसे रूककर कुछ नहीं पूछा।मैंने किसी से कुछ नहीं कहा।मैं यह जानती भी थी इसलिए लोगों की दृष्टि को अनदेखा कर मैंने इस पेड़ की कुछ तस्वीरें उतारीं और अपनी खटखटिया किंतु लाख टके की स्कूटी पर सवार घर की ओर चल पड़ी।

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