Skip to main content

उजाड़ का सौंदर्य...💜

कुछ तस्वीरें जो ईश्वर को नयी सृष्टि के लिए सहेज लेना चाहिए इस दुनिया के एल्बम से.....

आत्मीय लोग स्मृति बन जाते हैं;प्राण से प्यारे एक दिन प्राण त्याग जाते हैं;लोग सपना बन जाते हैं तो सपने धुआं और सुख कपूर बनकर उड़ जाता है।जीवन को अर्थ देने वाले सब सिद्धांत एक दिन भ्रम सिद्ध होते है फिर मूल्यों की बात क्या कहूं!उम्र को तो बढ़ना ही है,धीरे-धीरे चेहरे की पुस्तक के पन्नों का रंग भी उड़ जाता है।हंसने की अदा भी एक दिन भूलने में आती है।सांसों की धवल धमक एक दिन क्षीण से क्षीणतर और मन पर बोझ लगने लगती है कि वह अब छूटी कि तब छूटी…

शहर-दर-शहर भटकते-भटकते उसे अपनी जवानी दीजिए वो विदा में बेगानापन ही लौटाती है।एक दिन घर लौटने का भी कोई अर्थ नहीं बचता।अंततः एक दिन जीवन इस पेड़ की भांति खंख ही बचा रहता है।यही इसकी नियति है -खंख हो जाना।अहंकार इन दिनों में बूढ़े के लाठी जैसा क्या सहारा बनती होगी?

मैं यही सोच रही थी रास्ते में अपनी खटखटिया स्कूटी रोककर।आने-जाने वाले मुझे देखतें और देखते हुए मानो उनकी दृष्टि व्यंग्यात्मक ढंग से पूछ रही थी मुझसे,"पागल हो क्या"?,उनको उत्तर देती मेरी निगाहें कह रही थीं कि कृपया रूककर मुझसे यही सवाल कीजिए तब तो मैं बताऊं "मैं आपके समय की दार्शनिक हूं"।अपनी ओर से यह सवाल भी उनके समक्ष रखूं कि क्या आपका समय दार्शनिकों को पागल समझता है?

खैर,

यदि कोई पूछता कि यहां रूककर किस चीज़ की तस्वीर मैं उतार रही थी?क्या एक सूखें पेड़ की?इसमें क्या है?मेरा उत्तर होता,"हां इस सूखे पेड़ की तस्वीरें उतार रहीं हूं क्योंकि अपने अनूठे सौंदर्य के साथ यह जीवन की अवस्थाओं की परिणति बता रहा है कि एक दिन ढल जाना है।पेड़ नहीं है केवल;अंधेरी उदास रातों में व्यथा का कोई विलंबित स्वर हो जैसे!यह विलंबित स्वर उस मौन को आवाज़ देती है जो ह्रदय के गहरे खोह में खो गए हैं;यह उजाड़ उस चेतना को जगाती है जो सुषुप्ति से पार पाता ही नहीं"!

लोग कहेंगे,हमें तो नहीं दिखता।तब मैं अपने पूर्वज़ दार्शनिकों का गौरव अपने श्वांसो में भरकर कहूंगी,"आप कैसे देखेंगे?आप दार्शनिक नहीं हैं”।वह एक दार्शनिक ही हो सकता है जो उसको देख लें जो अन्य नहीं देख पातें और यही दर्शन है कि 'जो है' किंतु नजरों से ओझल है,उसे देखना।उसे बताना दुनिया को कि सत्य केवल वह‌ नहीं जो दिखता है। दिखने में बड़ी भ्रांति हो जाती है।उसे तो बड़े जतन से देखना-समझना होता है अन्यथा ऋषि अपने शिष्यों से क्यों कहतें कि "हिरण्यमेन सत्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्"!!

यूं भी प्रकृति शब्दों में स्वयं को अभिव्यक्त नहीं करती;वह संकेतों में स्व को खोलती है।परंतुक दर्शक नहीं साक्षी बनकर उपस्थित होना होगा। जैसे एक दृश्य का यह उजाड़ हमें हमारे होने की स्मृति करता है किंतु तब उपेक्षित कर के,उपेक्षित होके रूकना होगा कुछ क्षण!यह भावनाओं का एक जुदा आयाम है।यूं तो बौद्ध आचार्यों ने सैकड़ों चित्त की वृत्तियां बताईं हैं किंतु एक ये पकड़ में नहीं आती मेरे जो वैशेषिकों के भाव के अभाव के जैसे बसर का उजाड़ देख मन में घर कर लेता है।मेरे लिए यह एक बिल्कुल भिन्न अनुभव होता है जो मुझे मुक्त कर देती यदि माया मुझे खींचकर पुनः संसार की ओर फेंक नहीं देती!

बहरहाल,

किसी ने मुझसे रूककर कुछ नहीं पूछा।मैंने किसी से कुछ नहीं कहा।मैं यह जानती भी थी इसलिए लोगों की दृष्टि को अनदेखा कर मैंने इस पेड़ की कुछ तस्वीरें उतारीं और अपनी खटखटिया किंतु लाख टके की स्कूटी पर सवार घर की ओर चल पड़ी।



Comments

Popular posts from this blog

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

आत्म-समीक्षा के दिन...

 भारतीय दर्शन में या यूं कहें कि विश्व दर्शन में कुछ अवधारणाएं ऐसी हैं जिनपर दो पक्ष है किंतु अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। यदि ज्ञान का विस्तार करें तो विज्ञान भी इसमें सम्मिलित है। किंतु क्योंकि मैं दर्शन की विद्यार्थी हूं तो दर्शन पर अपनी बात केन्द्रित करती हूं।इन तमाम अवधारणाओं में है - आकाश,समय ,दिशा,कारण-कार्य,कर्मनियम, पुनर्जन्म इत्यादि। विसंगति यह है कि रोजमर्रा के अपने जीवन में मैं नितप्रति इन अवधारणाओं की संकरी गली से गुज़रती हूं। किंतु एक तो ज्ञान का प्रकाश कुछ मद्धम है मुझमें तो रोज़ ही डूबना-उतराना होता है। मैं जब इन प्रश्नों से निजात पाने की सोचकर वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करती हूं तो पाती हूं कि इस मल्टीमीडिया सेट जैसे समय में मैं तो बटन टिपने वाली मोबाइल जैसे हूं। दूसरे, शब्दों में कहें तो समयानुकूल नितांत अयोग्य हूं। मैं जो वर्तमान में हूं, यदि वह‌ नहीं होऊं तो मुझे और कुछ भी नहीं आता है।तब मैं पुनः घबरा कर अपने कमरे में पड़े किसी दार्शनिक अवधारणा को उठाती हूं और उसपर चिंतन करने का अभिनय करती हूं। किंतु यह अभिनय मुझे मुंह चिढ़ाता है कि ऐसा अभिनय...

बरेली

 वर्ष 2011 - 12 की बात है;तब संघर्ष के दिन अपने पूरे यौवन पर थें।उन्हीं दिनों में बहन के घर से (बहेड़ी) जो उन दिनों डेरा था मेरा, से कार्यस्थल (बरेली) तक (जिसकी दूरी करीब पैंतीस किमी थी) रोज़ आना-जाना होता था।यात्रा का साधन कभी बस और अधिकतर रेलगाड़ी होती थी बहेड़ी से बरेली तक की रेलगाड़ी की यात्रा में करीब छोटे-छोटे सात-आठ स्टेशन पड़ते थें।किंतु मुझे उनमें बस एक ही नाम स्मृति में रहा,इज्ज़तनगर। स्मरण रहे जाने के दो कारण थें -एक तो नाम में ही जिसके इज्ज़त हो,उसे न याद रखना एक तरह से विश्वासघात ही होता अपने अतीत से और दूसरे इस स्टेशन या कहें छोटे से स्थान का स्थानीय लोगों द्वारा उच्चारण।वे इसे ऐजेडनगर कहकर बुलाते।अब भी बुलाते हैं,नहीं पता।मैं घर आकर अक्सर इस बात की खीझ बहन के सामने उतारती कि अच्छे भले नाम को लोग क्यों बिगाड़ते हैं!खैर, उन दिनों इस स्टेशन की हालत मुझ जैसी ही थी!समय का तंगहाल दौर!कमतरी के दोपहर,विषाद में डूबीं रातें,पीड़ाओं में आकंठ डूबा देह और मन।दोनों के बेतहाशा तपने के दिन थें। मौसम कौन सा रहे,इससे अंतर नहीं था। उन्हीं दिनों,घर से कार्यस्थल जाते समय ट्रेन में जब कभ...