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हेमंत -भाग 2

जहाँ परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है,हम भला कहाँ रोक भी सकते थे उसे रोकने से;किंतु जाते हुए को ठीक से विदा तो करते!हर विदाई ठीक से अलविदा कहे जाने का अधिकार तो रखती है। 

हेमंत वास्तव में वियोग का,विरह का अभ्यास है। साधना है वियोगी बनने की।यह वह आरंभबिंदु है जहाँ से सबकुछ धीरे धीरे छूटता जाता है।जहाँ भारतीय परंपरा में आनंद के स्रोत विभिन्न तीज त्यौहार एक अंतराल लेते हैं जो नागपंचमी से आरंभ हो कार्तिक पूर्णिमा पर आकर अवकाश लेता है। आनंद का स्रोत सूख तो नहीं गया किंतु जाने किस कारण वह रूक तो जाता है हेमंत में।हेमंत ने भला ऋत की व्यवस्था में क्या बाधा डाली थी जो ऋतु चक्र में यह लांछन इसपर आ लगा है!

 हेमंत मुझमें इसलिए भी करूणा भरता है,अवसाद में ले जाता है यह सोचकर कि वह उजलापन जो देर तक रहता है गर्मियों में वह अब बड़ी शीघ्रता में होगा ढल जाने को। मैं प्रतीक्षा में रहती हूं कि कब गर्मियों के दिन लौटेंगे और दिवस दीर्घ होंगे।उजाला तब न केवल बाहर की दुनिया में होगा अपितु अंतर्तम भी प्रकाशित होगा!जब जब शीत की ऋतु बीत जाती है और किसी रोज़ जब सांझ ढले द्वार खोलने पर मैं पाती हूं कि अब तक उजाला है तब बड़ी प्रसन्नता और मन के चहक जाने के भाव से द्वार पर बड़ी देर तक खड़ी ही रहती हूं और प्रसन्न होती हूं यह सोचकर कि हेमंत में जो हमने दिनों का,धूप का,किसी की विदाई का अपमान किया था;करूणा को विषाद से भर देने का,मानवता को आत्मघाती बना देने का पाप किया था जिसका प्रायश्चित शीत अपनी पूरी तीव्रता से करा रहा था,उस पश्चाताप की अवधि अब पूर्ण हुई।अब शीघ्र ही दिन फिर लम्बे हो जाएंगे।हमारी देह और मन जो सिमटा था, सिकुड़ गया था,वह अब विस्तार पाएगा और संभवतः किसी ऐसे ग्रीष्म में,किसी ग्रीष्म की बुद्ध पूर्णिमा पर चेतना निर्मल हो समय के,ऋत के,भव के चक्र से निकल रहेगा। 

किंतु इसके ठीक उलट हेमंत धूप को गला देने की शीघ्रता में रहता है।काम से लौटने के उपरांत यदि सांझ को द्वार खोलने या छत पर जाने में तनिक देरी हुई नहीं कि धूप रेत की मानिंद हाथों से फिसल जाता है।रह जाती है टीस कि थोड़ी शीघ्रता क्यों न की द्वार खोलने में,छत पर आने में। 

हेमंत मुझे स्मरण कराता है गुलमोहर की,अमलतास की।किसी नवयुवती द्वारा पहने जाने वाले झुमकों जैसे अमलतास अनगिन झुमकों को अपने पर लादे खड़ा रहता है चटक धूप में किसी प्रेमी की प्रतीक्षा में।किसी प्रेमिका को छांव देने।किसी प्रेम को जीवटता प्रदान करने के लिए!मैं सोचती हूँ कितने बड़भागी होते होंगे वे जो प्रेम में अमलतास का झुमका देते होंगे-पाते होंगे। मैंने तो बस तस्वीरें ही उतारी हैं इनकी!

मुझे याद आता है गुलमोहर,उसका गाढ़ा-चटक रक्त वर्ण।मैं सोचती हूँ हम प्रेम में कितने ही पक क्यों न जाएं गुलमोहर जैसे लेकिन कोई हेमंत आता है और हमारा प्रेम का चटक लाल वर्ण बदल जाता है शीत की सफेदी में।तब भी यदि मैं प्रेम में होऊं तो गुलमोहर के जैसे ही रक्त वर्ण की आभा लिए चमकती रहूं प्रेम में।ओह; किंतु यह हेमंत का ठंडापन,यह उसकी सफेदी धूप के जैसे धवल-उज्जवल नहीं है।यह तो वह श्वेत वर्ण है जो प्रेम के पगे भाव को भाप बना उड़ा देता है,प्रेम में डूबे मन को अवसाद में ढकेल देती है। 

हेमंत में याद आता है पिता का इस लोक से जाना।पिता जो जीवन के सूर्य होते हैं।वह मेरे जीवन का सूर्य सात बरस पीछे के एक हेमंत में दक्षिण में डूब गया था।उस अंधेरे को जो तब से व्याप्त है जीवन में उसे अनेकों ग्रीष्म ऋतुओं के सूर्य मिलकर भी न छांट सकेंगे।करोड़ों करोड़ ब्रहांड के सूर्य मिलकर भी इस अंधेरे को दूर न कर सकेंगे। 

जाने कितनी करूण कहानियों से,कितनी रूमानी किस्सों के अंत से बुना गया है हेमंत। कितनी बातें,कितने किस्से और कहानियां कहीं जाएं!यदि हेमंत पर केवल कभी कोई स्वतंत्र लेखन हुआ तो वहाँ कुछेक कहानियों को स्थान मिल सकेगा,ऐसा मैं भरोसा कर सकती हूं स्वयं पर किंतु तब तक अब यहीं हेमंत की कथा को विराम देती हूँ।

इति!!!

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