रोहित शर्मा और विराट कोहली ने टेस्ट क्रिकेट से विदा ले ली।विदाई का अंदाज कह सकते हैं चुपके से था,अचानक था।ऑफफील्ड था।यह कुछ ऐसा है कि गहरी चोट लगी हो किंतु जिसका दर्द उभरेगा धीरे-धीरे,जब इन दोनों के बगैर भारतीय टीम सफेद बाॅल से क्रिकेट खेलने मैदान में उतरेगी।
यूं तो इनके संन्यास की सुगबुगाहट बहुत दिनों से चल रही थी किंतु विराट की रन बनाने की जिद और रोहित के औरा के कारण यह कयास मैंने लगाया था कि सचिन तेंदुलकर के बाद एक शानदार विदाई कार्यक्रम द्वारा इन दोनों को विदा किया जाएगा।
मैं सोच रही थी कि मैं जो हर जगह एक प्रोफेशनलिज्म की हिमायत करती हूं,जब इन दोनों ने इस तरह संन्यास की घोषणा कर ही दी तो क्या बुरा किया!
किंतु एक व्यक्ति जब अपने क्षेत्र में कुछ योगदान करता है तब वह इतनी आस पालता है कि उसे उसके साथ के लोग ठीक से अलविदा कहेंगे।उसे ठीक से अलविदा कहने का अवसर देंगे!मनुष्यों के मूलभूत अधिकारों में एक अधिकार क्या यह नहीं होना चाहिए कि उसे ठीक से अलविदा कहने का अवसर दिया जाए!और मनुष्यों के मूलभूत कर्तव्यों में एक कर्तव्य यह भी हो कि वह अपने साथ कार्य कर रहे लोगों को ठीक से विदा करें!
अब टेस्ट क्रिकेट में विराट नहीं दिखेंगे!उनकी मजबूत कलाइयों से लगाई गई कलात्मकता से भरी ड्राइव और नजाकत से भरी फ्लिक नहीं देखने को मिलेगी।रोहित का हुक और पुल देखने को नहीं मिलेगा।छक्का लगाने का वह स्टाइल जो क्रिकेट में विरलों के पास होता है और जो रोहित के पास था,अब वह टेस्ट क्रिकेट में देखने को नहीं मिलेगा।
टी-ट्वेंटी से पहले ही दोनों ने अलगाव कर लिया है।बहुत शीघ्र एकदिवसीय में भी ये नहीं दिखेंगे।तब हमें कहीं नहीं दिखेगा रोहित का बेपरवाह अंदाज।नहीं दिखेगी विराट की मैदान पर असीम ऊर्जा!जीत जाने की जिद!और यह भी कि कैसी परिस्थिति हो,कोई कप्तान हो,विराट अपने अग्रेशन के साथ अपने गेंदबाजों और साथी बल्लेबाजों के साथ हमेशा खड़े दिखें।औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए किंतु भारत के हीनभाव से भरे युवाओं को सचिन तेंदुलकर ने जहां सपने देखना सिखाया,गांगुली ने विरोधी की आंखों में आंखें डालकर देखना सिखाया।उनकी कप्तानी ने भारत के युवा वर्ग में आत्मविश्वास भरने का कार्य किया।किंतु विराट ने इनसे दो कदम आगे बढ़ कर मैदान पर केवल अपने एग्रेशन से पटखनी देना सिखाया।खेल में अब सचिन की सौम्यता,गांगुली की आत्मविश्वास भरी ठसक की जगह विराट की आक्रामकता ने ले ली।यह बदले भारत की अनेकों तस्वीर में से एक तस्वीर है।
किंतु इससे इतर विराट और रोहित की क्रिकेट से विदा की घोषणा में जीवन के सुंदरतम लम्हों के खो जाने की प्रतिध्वनि है।कसक इस घोषणा से दिल में केवल यह नहीं उठी कि अब हम रोहित -विराट को कल खेलते नहीं देखेंगे!कसक इस बात की भी है कि विदा की इस पदचाप में बहुत सी विदाइयों की पदचाप की स्मृति की भी प्रतिध्वनि है।
इसमें जीवन के प्रियतम लोगों के खो जाने की प्रतिध्वनि है। अपने बचपन के विदा लेने की प्रतिध्वनि है।उन लम्हों के खो जाने की प्रतिध्वनि है जिसे हमने उन अपनों के साथ बिताया था यह वायदा करते हुए कि एकदिन जिंदगी की सूरत-ए-हाल बदलेगी,किंतु जब सूरत-ए-हाल बदला तो उन लम्हों को जिनके साथ जिया था या तो उनकी जीवन राह बदल गई या उन्होंने जीवन को अलविदा कह दिया है।इसलिए जब भी विदा शब्द सुनती हूं,जाने कौन सा दर्द उठता है?किस विदा का दर्द उठता है?
फिर यह तो क्रिकेट से विदा ले रहे अपने समय के श्रेष्ठ खिलाड़ियों की विदाई की घोषणा है।अचेतन में बसे तमाम विदाईयों की हुक अवचेतन को तो महसूस होनी ही थी।किंतु अब जब उन्होंने यह घोषणा कर ही दी तो एक क्रिकेट प्रेमी की ओर से यही शुभकामनाएं है कि ईश्वर उन्हें वह सब प्रसन्नता, यश-कीर्ति दे जिसके लिए उनका जन्म हुआ है।
अंत में बस यही कि विदा में एक दीनता का भाव है।मैं जब विदा लूंगी कहीं से,इसी दीनता भाव के कारण चुपके से विदा लूंगी कि मेरे जानने वाले जब सुबह उठें तो उन्हें पता चले कि फलां चली गई और शाम तक यह खबर उस अखबार की तरह एक कोने में पड़ी हो जिसके लिए सुबह घर में रार मचती है कि मैं पहले पढ़ लूं!
यूं तो रोहित के छक्के मारने के अंदाज और विराट की आक्रामकता पर कितना कुछ कहना बाकी ही रह गया!
किंतु अभी बस इतना ही...

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सिर्फ़ नज़राने दीजिए
उनका रास्ता अब अलग है
उनको जाने दीजिए !!!