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उपयोगितावाद...🦋

 

मैं अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार व्यक्तियों में से एक हूं इसलिए उतनी ही व्यर्थ,अनुपयोगी और बेकार।यह एक आधार वाक्य से निगमित निष्कर्ष है जिसे अव्यवहित अनुमान कहते हैं।

सरल शब्दों में तत्काल निकाला गया निष्कर्ष है जबकि पास में केवल एक आधार वाक्य हो। किंतु यह निष्कर्ष सत्य माना जा सकता है क्योंकि आधार वाक्य से यह अनिवार्यत: निगमित होता है।इसको एक दूसरे तरीके से भी जांच कर सकते हैं कि निष्कर्ष के विरोधी वाक्य का आधार वाक्य से व्याघात संबंध है और व्याघात संबंध में दो तर्कवाक्यों में कोई एक ही सत्य हो सकता है। अतः यदि न्याय वाक्य के नियमों से भी उपरोक्त बातों को जांचे तो यह सत्य ही बैठता है।

इस प्रकार आकारिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार से इसकी सत्यता सिद्ध है।

बहरहाल,

मैंने जब-जब चाहा उपयोगी होना एक रंग उड़ गया मेरी आत्मा का,वह कुछ उद्धक लगने लगा।घबराकर मैंने आत्मा का रंग बचाना चाहा किंतु तब समय ने मुझे अनुपयोगी घोषित करने में देरी न की। अपने आत्मा के रंगों को लिए मैं दरकिनार की जाती रही, दरकिनार होती ही गई।

दुनिया क्षणभर मेरी आत्मा के रंग को,उसकी सुंदरता को रूककर देखती,सराहती किंतु यह जानकर कि इसकी कोई उपयोगिता नहीं है,वह आगे बढ़ गई। 

पढ़ाई के दिनों में जितना समझ नहीं आया था उपयोगितावाद,अब समझ आ रहा जब जीवन ने यह सिद्धांत ही मुझपर उतार दिया !कि अनुपयोगी होना कैसे आपके अस्तित्व को खंख कर देता है जीते जी।

हां, किंतु अब भी यह कह सकती हूं कि मैं अपने समय की सबसे शानदार व्यक्ति हूं किंतु उतनी ही व्यर्थ,अनुपयोगी और बेकार...

नोट: शब्द तो मेरे हैं किंतु तस्वीर मेरे संस्थान में कार्यरत फोटोग्राफर महोदय के कैमरे से उतारी गई और क्या शानदार तस्वीर उतारी गई है।


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