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ईश्वर...

  🟥.ईश्वर कोई चिड़ुकवा बुजुर्ग है जो अपने ही घर के बच्चों को हंसते-खेलते देखकर चिढ़न में उन्हें पीटता है और नाम देता है हमारे कर्मों को। 🟥. ईश्वर अपने घर की सबसे बडी सन्तान है जिसे जितना भी अधिकार और सम्मान दे दो, उसके अहंकार की तुष्टिकरण नही होती और इसका बदला वह अपने छोटे भाई बहनों से लेता है।कितना भी प्रेम कर लो,करेगा धूर्तता ही। 🟥. ईश्वर कोई बेहद खराब प्रशासक है जिसकी व्यवस्था चौपट है।वह अपना काम समय पर नहीं करता जिसके कारण हमारे करमों की फल-व्यवस्था में झोल ही झोल हो गया है। 🟥. ईश्वर किसी भ्रष्ट देश का आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा बडा़ बाबू है,जब तक उसे चढावा नहीं,तब तक सब कार्य पेंडिंग।उसके बाद भी काम होने की गारंटी नहीं। 🟥. ईश्वर कोई लाड़-प्यार में बिगडा़ बच्चा है,वह वही करेगा,जो उसे नहीं करना चाहिए। 🟥. ईश्वर घूस देकर सर्वोच्च पद पाया व्यक्ति है जिसकी उगाही वह हम मनुष्यों को दंड देकर करता है। 🟥. ईश्वर ऐसा शिष्य है कि उसकी हां में हां मिलाओ तो पांव पूजेगा,डांटो तो उसे गुरु के विचारों से ही समस्या होने लगती है जिन विचारों पर वह लहालोट था कभी। 🟥.ईश्वर झगडालू औरतों के ...

ईश्वर का दुर्व्यवहार या परममुर्खता…

  संसार में एक ही दुःख है-मित्रता । संसार में एक ही सुख है-मित्र न होना। ओशो ने कहा है “मित्रता प्रेम से भी ऊपर है “। इसलिए प्रेम का डंसा बच भी जाए,पर मित्रता से डंसा हुआ पानी भी नहीं मांग पाता,मर भी नहीं पाता। अपनी प्यास,अपना दुःख लिए वह भटकता रहता है प्रेत की तरह।उसको कोई नहीं सुनता क्यूंकि दुनिया मित्रता के नशे में है।बस पता नहीं है कौन किसको पहले डसेगा! अमैत्रेय ही है इस दुनिया का स्वरूप,अन्यथा क्यूँ आते बुद्ध मैत्रेय बनकर पुनः मित्रता सिखाने! शास्त्र कहता है “ओम मित्रेभ्य नमः” मैं कहती हूँ “ओम अमित्रेभ्य नमः” मेरा बस चले तो प्रत्येक मंत्र के बाद तीन के स्थान पर चार बार शांति कहूँ, चौथा मित्रता रूपी ताप की शांति के लिए। क्लोरोफार्म के आविष्कारक सिम्पसन के बारे में कहा जाता है कि वह आजीवन एक सच्चे मित्र की खोज में रहे और अन्ततोगत्वा एकाकी मरे। फिर भी निश्चयतः वे शांति से मरे होंगे। हर उस मित्र को जिसे हम देते हैं जितनी ज्यादा निजता, आत्मीयता, संवेदनात्मक संस्पर्श, उसे लौटाता है वह उस निजता को चौराहे पर नीलामी लगाकर, आत्मा का गला रेतकर, संवेदनात्मक संस्पर्श को वासना के कीचड़ में ...

माते...(15/08/2021)

माते... कुछ दुर्घटनाएं जीवन में ऐसी घटती हैं जिनपर समस्त विश्व के शब्दों को खर्च कर दिया जाए,फिर भी शब्द उन भावों को  छू भी नही सकते जो ह्रदय पर आरी की तरह वक्त हर क्षण चलाता है।जैसे तुम्हारा देह त्यागना।क्या सितम है कि विदा का वह क्षण मुझ पर बीता फिर भी मैं न रीत गई! समस्त आकाश को उसके सब उत्तरदायित्वों को छोड़कर अगर यह काम दे दिया जाए कि वह विदा के क्षण तुम्हारे होंठो पर आकर जो टिक गए थे,उन सब शब्दों को सुन सके,तो अनंत ब्रह्मांड के अनंत आकाश भी उसे न सुन सकेंगे। खैर छोड़ो!कहने-सुनने में क्या रखा है!!कहने वाला वही कहता,जो उसे कहना रहता है और सुनने वाला वही सुने जो उसे सुनना चाहिए तो दुनिया की खूबसूरती में बढ़ोत्तरी ही होती।किन्तु यह संसार तो मानो फंसा हुआ है यंत्रणाओं के एक बंद बोतल में।अब ढक्कन इस बोतल की खोले कौन?कोई ईश्वर कहीं नही है।वो अलग बात है मैं हर पल उसे नकारते हुए उसे ही ढूंढ रहीं हूँ। बहरहाल,  मैं फिर वेदना का सुर पकडूं,उससे अच्छा है हम-तुम अपना हाल सुनाते हैं। यद्यपि जानती हूं तुम कैसे अपना हाल कहोगी!मेरा कैसे सुनोगी!मेरे लिखे अनेक चिट्ठियों की तरह यह भी अनपह...

अगस्त...

  बुद्ध कहते हैं 'सर्वं दुखम्'।इसकी व्याख्या में आगे बौद्ध ग्रन्थों में उल्लेखित है कि प्रिय से वियोग,अप्रिय से संयोग दुख ही तो उत्पन्न करता है।यही नहीं,हम जिसे आज प्रिय समझते हैं,वह भी कल दुःख का कारक बन जाता है।जैसे कल से आरंभ हो रहा अगस्त। क्योंकि यह भी रीत जाएगा बीते हुए लम्हों की कसक जगाकर।  अगस्त कि भरोसा जगता है कि उमस भरे मौसम से कुछ राहत मिलेगी।अगस्त  कि त्यौहारों का मौसम आ गया है,यह सूचित करता हुआ।अगर किसी एक माह को मुझे वर्ष के बारहो माह में चुनना हो तो मैं झट अगस्त को चुन लूंगी।धरती,जब अपनी हरितिमा में इठलाती है।कौन बहता है,कौन संभलता है,की चिंता छोड जब-तब अपने यौवन के पूरे उफान को कभी छूती है।कभी मारे क्रोध के मनुष्यों को बताती है कि संयम रखना सीखो!अन्यथा पानी की एक बौछार बहुत है हम मनुष्यों को अपनी औकात बताने के लिए।          किंतु अगस्त अब बुद्ध का पाठ पढाते आता है जीवन में कि जो भी प्रिय था,जिनसे खुशियों के क्षण चुन चुनकर एक हार बना रही थी,जिसे जीवन के कठिनतम माह में पहन सकूं,वह हार बन ही न पाया। बन भी नहीं सकता क्योंकि जीवन में क...

ईश्वर के नेत्रों की अश्रु हूँ,तुहिन बिन्दु हूं...

  ईश्वर के नेत्रों की अश्रु हूँ,तुहिन बिन्दु हूं... सकल ब्रम्हांड जिसमें सिमट जाए,वेदना की वह कृष्ण विवर हूं। वह मौन हूं जहां तक वाणी अगम्य है, उस मौन को कहने के फेर में रच गई प्रपंच हूं। कारण तक पहुंच करूँ मुक्ति का उपाय,उससे पहले विज्ञानमयकोश द्वारा खींच ली जाती हूं। आनन्द मय कोश तक पहुंच कर भी, पिपलिका की भांति आनन्द से चिपकी ही रह जाती हूं। मनोमयकोश में डोलती,अन्नमय तक ही रह जाती हूं। बुला लेते हैं प्रारब्ध मेरे,और वासना के पंख उस कोश पर चिपका हुआ छोड, पुनः रचती हूं नववासनामय संसार। मात्र प्रज्ञ हूं,किन्तु असार हूँ। स्थूल से सूक्ष्म तक चक्कर काटते व्याकुल हूं,आकुल हूं, किन्तु सुषुप्ति तक पहुंच नहीं,तुरीय को साधने की फिर क्या बात हो। द्वैत की चाह में अद्वैतीभाव भी विलीन हुआ सा, न द्वैत से सामंजस्य,न अद्वैत की साधना। प्रकृतस्थ हो गतिशील होकर भी जड़ हूँ, चेतन होकर भी पुरूषत्व सुप्त है,जबकि   कहीं न आना न जाना। सच्चिदानंद हूं,किन्तु जाने किस मोह में मायापति बनी, फूट पड़ा जिससे सम्पूर्ण ब्रह्मांड,मोह का वह आरंभिक बिन्दु हूँ, ईश्वर के नेत्रों की अश्रु हूँ,तुहिन बिन्दु हूं।।...

गुरूपूर्णिमा...

  माता-पिता के बाद जीवन में कुछ संबध इस अनिर्वचनीय जगत में ऐसा मिल जाए जो चित्त को निर्मल-निष्कलुष कर दे,जिसके समीप केवल बैठने भर से चित्त की ग्रन्थियां खुल जाएं,जिसका संकल्प मात्र ही इतना पूर्ण हो कि उसके चाहने भर से वह संकल्प घटित हो जाए,उनमें एक गुरु-शिष्य संबंध है।                      आज जबकि मैं एक शिक्षक हूं तो सोचती हूं मुझे एक शिक्षक के रूप में कैसा होना चाहिए!निःसंदेह आप जैसा होना चाहिए। किन्तु समस्या यह है कि अब भी मुझमें कर्त्तापन का भाव है।मुझे यह भ्रम है कि मैं कुछ किसी को सीखा-बता सकती हूं,यह जानते हुए कि सिखाने का प्रयत्न करना मात्र एक भ्रामक स्थिति में स्वयं को रखना है।जो वास्तविक गुरू होता है,उसे सिखाने के लिए प्रयत्न नही करना होता।जैसे आपने कभी प्रयास नहीं किया हमसब गुरूभाई-बहनों को कुछ बताने-सिखाने का।किन्तु हमसब जीवन में अपने पैर पर खड़े हैं और जैसे भी हैं,संतुष्ट हैं।और यह मात्र आपके सद्संकल्प का प्रताप है।उस ब्रह्म की तरह जिसके चाहने मात्र से सृजन हो जाता है। ...

कोने में पड़ी कंपकंपाती चिट्ठियां'

  पत्र लिखना उसके प्रिय कार्यो में से एक था।भूल यह हुई कि लिखते समय अपना ह्रदय खोलकर रख देती कि पढ़ने वाला उसकी आंच को बर्दाश्त कर सके!उसकी कोमलता को सम्भाल सके!और शब्द दर शब्द उन्हें ऐसे पलटे कि पलटे जाने का शोर पढने वाले के सीने में किसी चक्रवात सा उठे किन्तु इस तरह सहेज भी सके कि दूसरा उस शोर को सुन न सके। लिखते समय वह बराबर इस बात का ध्यान रखती थी कि पढने वाले को जब कोई शब्द या वाक्य इतना नम लगे कि उसके नेत्र भी सजल हो सकें तो अगला कोई काॅमा, किसी वाक्य का मोड ऐसा हो कि आगे के वाक्य, शब्द की सजलता के साथ पढने वाले की नेत्रों की नमी भी सोख ले और अगला कोई वाक्य, कोई शब्द खिल उठे बसंत की तरह। और यह बसंत उसके ओंठो पर बिखर कर अपने पूरे यौवन को प्राप्त कर सके। उन अनगिन पत्रों के कोई वाक्य बुद्ध की मुस्कान जैसी थी तो कोई वाक्य सांख्य के विवेकज्ञान के जैसे!कोई शब्द, कोई वाक्य अपने एकांत के साथ थी किन्तु उसका यह एकांत इतना सम्पूर्ण था जैसे अद्वैत का ब्रह्म। कोई वाक्य यथार्थ को पूरे निर्ममता के साथ स्वीकार करना बताने वाला भी रहा तो कोई वाक्य ऐसा भी था जिसने कहा कि कभी-कभी कोई चोट मात्र ...

व्याघात संबंध...

बेतरतीब किताबों, बिखरे पन्नों, खुले कलम के बीच जबकि बिस्तर पर आधा जगह इन सबने घेर रखा हो और तमाम ऐकैडमिक कार्यों की वक्त से लम्बी लिस्ट सामने  से  दबाव बनाये हुऐ है कि इन्हें किसी भी तरह तय समय पर पूर्णता चाहिए ही और मैं भी ख्वाब ही देख रही थी कि मैं जिंदा रहूँ तो भी किताबों के बीच,मरूं भी तो इन्हीं के बीच।डरती हूं कोई किताब जो बिस्तरे पर बिखरी है,मेरे पैर छू न जाय उनसे,तब भी जितना हो सके सजा दूं घर,आलमारी,मेज, खिड़की, बिस्तर को केवल और केवल किताबों से कि शायद सार्त्र के इस वक्तव्य का कि “मानव जीवन जीने के लिए अभिशप्त है”का जवाब ढूंढ सकूं बृहदारण्यक के ऋषि  के उद्घोष मे कि “अहं ब्रह्मास्मि” ।तब भला! मै क्यूं अभिशप्त बनी रहूँ जीवनभर।और यह भी कि ब्रह्म होने से पहले जान पाऊँ कि  “स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है” और यह भी कि ये जानते हुए भी सिमोन ने किस भांति भला प्रेम किया और निभाया इस तरह प्रेम को कि जैसे अपने सिद्धांतों को ही सच करने के फेर मे किया गया था प्रेम,और ये भी भगीरथ प्रयास कर पाऊं  कि काफ्का की तलाश को लुम्बिनी के वनों मे ले जाकर खत्म करूँ, कि शोपेन...

अजनबीपन...

जब कभी निकलती हूं कमरे से(वैसे अब यह निकलना भी बहुत कम ही होता है)सब्जी लेने या कोई घर का सामान;रास्ते में पडने वाले घरों की छतों पर,बरामदे में खड़े पुरूषों,उनके बराबर खड़ी महिलाओं,बरामदे में फोन पर बतियाती लड़कियों और गली क्रिकेट खेलते लड़कों-बच्चों को देखती हूं तो लगता है जैसे वो किसी और दुनिया के लोग हैं,मैं किसी और दुनिया की।सबकुछ अनजाना,अनचिन्हा लगता है।इतना अनचिन्हा कि लगता है न वो मुझे पहचानते हैं न मैं उनको।वो अलग बात है कि हमदोनो एकदूसरे को पहचानने का पूरा प्रयास करते हैं।किन्तु यह प्रयास मेरे संकोची प्रवृत्ति के कारण प्रायः असफल ही रहता है।मैं इस बात से भय खाती हूं कि गलत समझा जाना मेरी नियति है।बस मैं इस गलत समझ जाने और होने से परे होकर मर सकूं,इसी प्रयास में सब प्रयास विफल रह जाते हैं।यूं तो मैं उन लोगों के प्रति आभारी हूं जिनसे मैने एक शब्द भी कभी बात नही की,फिर भी वो जाने क्या समझकर मेरी प्रशंसा कर देते हैं।निःसंदेह यह सामने वाले मन की उदारता का परिचायक है।                    ...
  गमला मात्र फूलों से भरा नही है,इसके चारों ओर बिखरा हैं अम्मा का आंचल।इसकी मिट्टी में बसी है उनके पायल की धुन।धुन जो आंगन से होते हुए ओसारे से रसोई तक एक लय में गतिशील,मानो साधना में मगन किसी योगी की सांसो की निर्मल धुन हो।इसके डंठल पर अब भी है उनके हाथों के स्पर्श,जैसे मेरे गाल पर रह गई है उनकी आखिरी छुअन।पूजा के लिए अर्पण होने जाते फूलों पर है एक शरारत भरी मुस्कान,जो अम्मा के मुझको लगाए गए डांट से उनके गालों पर खिली थी।जो खिल न पाएं है उन कलियों पर अब भी धरे है अम्मा की चिंताएं।चिंताएं,जो सब दुश्वारियों के बाद भी जीने का आधार थीं। फूलों से भरा गमला मात्र नही है,यह ड्योढी पर बैठकर प्रतीक्षा में रत सुषुप्ति और जाग्रत का संधिस्थल है।जिससे पार जाकर एक बार पुनः जीवन वहां आकर ठहरता है,जहां अम्मा हैं,उनकी गुड़ से मीठी 'बच्ची पुकारती' बोली है,बाबूजी का मंजन हाथ में लिए मौन है,आश्वस्त सी करती कि अब कहकर देखूं मैं अपनी,वह सुनेंगे और समझेंगे।गांव की सहेलियां हैं,भर दुपहरिया रास्ते की धूल फांकते।पेडों-डालों से तोड़े गए कच्चा पपीता,अमरूद-आम है।घर लौटने पर शंका से भरा मन है कि किसी ने दे...

देह दान_____________

  मेरे बटुए में कुछ चीजें हमेशा रहती हैं, जैसे-एक पहचान पत्र, एटीएम कार्ड,एक फोटो,कुछ रूपये।रूपये इतने,कि गलती से अगर किसी को बटुआ हाथ लग भी जाए तो सिवाय गाली के कुछ न देगा। और एक कार्ड,जिसपर अंकित है कि मैने अपने सभी अंगों को और पूरी देह को दान कर दिया है।यह इसी कारण हरदम बटुए में पड़ा रहता है कि कभी मृत्यु आए तो कोई अंग खराब होने से पहले किसी आत्मा के देह रूपी वस्त्र के लिए काम आ सके। यूं अचानक ख्याल आया कि क्या देह की भी स्मृति होती है!उसे भी याद होगा कोई आत्मीय स्पर्श!किसी प्रिय के गले लगने पर बस गई होगी आत्मा के साथ उसके देह में भी उसकी गंध! नहीं पता।कुछ भी तो नहीं पता। लेकिन देह और चेतना का जो मेल ‘मेरे’,’मैं’ के रूप में है,इससे पहले कि बिछुडे, यही चाहत मैं हर अंग में भर देना चाहती हूं कि मेरी आंखें जब खुले कहीं और, तब देखे प्रकृति को सहचरी के रूप में।देखे हर इंसान को करूणा की निगाह से।मुक्त रहे नज़र की वासना से। ह्दय बना रहे सह्रदय।बस जब तब निकाल कर मत रख दे हर किसी के सामने। ये भी कि मत बलिदान कर देना इसे अब  मित्रता के नाम पर कि विकल्प हो मित्र या सांप को दूध पिलाने का,...

मेरे भीतर एक काफ्का रहता है…

  मेरी माँ ने तो कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे घबराहट साये की तरह मेरे साथ हो जाए।बल्कि जब घबराए तो सब निशान मिटा दिए घबराहट के।  एक बार याद है जब मैं 20-21 साल की थी,माँ खाना बना रहीं थीं और मैं चाय बनने की जल्दी में चूल्हे के पास बैठी थी,उसने मुझसे नमक का डिब्बा बंद कर रखने को कहा,न जाने क्यों बार बार ढक्कन खुल कर गिर जाता,माँ ने डाँटा।मैंने चिढ़ कर कहा हो जाता है कभी-कभी, इतना भी क्यूँ गुस्सा होना!शायद मैं नींद में थी दिन के 9 बजे! फिर एक दिन दूध गिरा दिया मैंने पूरा।मैं तब बहुत डरी घबराई थी कि बहुत ही डांट सुनने को मिलेगी पर वह चुपचाप उठी जबकि दोपहर में वह एक घंटे आराम करती थी,उसके आराम में खलल पडा,किन्तु बिना एक शब्द बोले उसने जमीन पर दूध के एक कतरे का निशान न रहा,इस तरह साफ किया।मुझे लगा अब बिगड़ेंगी,पर फिर वह चुपचाप सो गई।अब मुझे दूसरी चिंता ने जकड लिया की शाम में चाय कैसे बनेगा और फिर सबको दूध के नुकसान का पता भी चल जाएगा, पर चाय ठीक बनने से पहले न जाने कब उसने दूध घर में लाकर रख दिया था,और कोई बात भी नहीं हुई दूध के नुकसान की।शाम में पिता की कटोरी में भी दूध था रोटी...

कर्मशील जीवन,वेदांत दर्शन और स्वामी विवेकानंद…

  कोई सिद्धांत बिल्कुल ठीक,तार्किक,तथ्यात्मक होने पर भी यदि कार्यरूप में परिणत न हो तो बौद्धिक व्यायाम ही होता है वह।और जीवन पथ पर चलने के लिए फिर इस प्रकार के सिद्धांत का कोई और मूल्य भी नहीं रह जाता।अतः जीवन के कर्मरूपी दर्शन में सधने के लिए हर प्रकार के विचार दर्शन को धरातल पर उतरना ही होगा।केवल यही नहीं, आध्यात्म हो कि भौतिकवाद, आदर्श हो कि व्यवहारवाद,इनके बीच के भेद को भी मिटा सके।एक सिद्धांत वही सर्वथा अनुकूल है मानव जीवन के, जो इनके मध्य के अंतर को ठीक ठीक पाट सके।पर्वत, गुफाओं, जंगलों में से जन से भरे नगर में तो आना ही होगा सिद्धांत को, उसे विचार से कार्य रूप में भी परिणित होना पड़ेगा।कोई सिद्धांत या मत अथवा विचार उतने ही अंश में सर्वोत्कृष्ट है जो संसार के मनीषियों के सांसारिक कर्मों में परिलक्षित हो पाए। इसका सर्वोत्तम उदाहरण स्वयं  आचार्य शंकर,चाणक्य  तथा इनके जैसे अनेक अन्य मनीषियों, चिंतकों, का जीवन रहा।और इसी बात का संसार को उपदेश देते हैं,  संग्रामस्थल के मध्य गीता का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण ।प्रत्येक श्लोक में मानो यही स्वर ,यही उपदेश है-कर्मण्यता का...

ईश्वर,रंग-रूप,प्रेम,मित्र…

  मैं इसी भय से ही तो  ईश्वर  को स्वीकारे हूं,जबकि मैं जानती हूं कि दर्शन में जितने तर्क ईश्वर की सिद्धि के लिए है उतने ही उसके असिद्धि के लिए भी है। विज्ञान,मानो न मानने वाले का ही सहायक है और मेरी श्रद्धा! वह कभी भय मुक्त होती है या नहीं, मुझे नहीं पता ठीक ठीक।इसलिए मैं जानती हूं मेरी श्रद्धा में ये मेरे भय, मेरे घबराहट की मिलावट है जो उसको माने है। जबकि यह लिखते वक्त भी मैं डर रहीं हूं कि वह हो और यह पढ़कर कहीं गुस्से में मुझे उन संकटों में पड़ने पर फिर से न निकाले तो, जिनसे उसने कई बार मुझे निकाला है!  मैं ऐसे ही हमेशा संशय ग्रस्त रहती हूँ।वह कभी भूले से दिखता भी तो नहीं।जैसे  प्रेम! कहाँ दिखता है,हम केवल कहते हैं।विभिन्न तरीकों से, व्यक्त करते हैं प्रेम को।तभी तो बार-बार कहने-बताने के बाद भी कहते हैं।मानो शब्द शब्द नहीं होते, सेतु हों। कि एक के हृदय के भावों को दूसरे के हृदय तक पहुचाने वाले मजदूर हों।हम दिखा कहाँ पाते हैं प्रेम को,प्रेम की सच्चाइयों को।कितना प्रेम है,कहाँ दिखा पाते हैं हनुमान जी की तरह सीना चीरकर कि देखो मेरे हृदय में तुम ही तो हो।तभी तो एक...

मैं सुकरात बनना चाहती हूं...

  मैं सुक़रात बनना चाहती हूं!सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने रहना चाहती हूं। हो जाना चाहती हूं प्लेटो और देखना चाहती हूं दार्शनिक को बनते राजा। बनना चाहती हूं अरस्तू कि ज्ञान का कोई पक्ष अछूता न रह जाए। मैं बनना चाहती हूं डेकार्ट कि स्व को,आत्मा को खोजना है बिना ईश्वर के और ईश्वर को सिद्ध करना है प्रज्ञा से। और फिर स्पिनोजा कि तरह सबकुछ ईश्वरमय घोषित कर सकूं। चाहती तो यहीं हूं कि मरते वक्त कह सकूं लाइबनित्ज की तरह कि 'ये दुनिया सभी संभावित दुनिया में सबसे अच्छी है'। यद्यपि मैं अभी शोपेनहावर से सहमत हूं कि 'ये दुनिया सभी संभावित दुनिया में सबसे बुरी है'।।           मैं चाहती हूं लाॅक बनना और सबकुछ अपने अनुभव से जानना चाहती हूं, चाहती हूं बर्कले कि तरह पत्थर को प्रत्ययरूप सिद्ध करना कि आदमी तो प्रस्तर हो चुका है।                              किंतु ...

अमलतास को दूं अमरता का आशीष...

कोई सुगढ़,सुंदर चित्र गढ रही थी कि काला रंग बिखर गया और बिखरता ही जा रहा है,फैलता ही जा रहा है ब्रह्मांड की तरह! अब सूझता नहीं रंग कौन सा भरूं!दिखता भी नहीं।मेरे आंखो पर लगे हैं जो देशकाल के चश्में,व्याकुलता में मन में आता है कि इसे चकनाचूर कर सब शीशों को पिघला कर बना दूं पानी,जो सबकी आंखों में सदैव चमकता रहे! मेरे इस चित्र में था मेरा अपना एक सौरमंडल, अभी सब ने अपनी-अपनी धुरी पर चलना सीखा ही था कि मेरे सूरज को निगल गया कोई! मुझे जिस पृथ्वी ने धारण किया था,प्राणहीन हो गई अपने सूरज के बिना,और एक दिन पूरी पृथ्वी गल गई कागज की तरह! हर किसी के हिस्से है एक सूरज और सूरज को उसकी धरती,मैं अपने सूरज की खोज में भटक कर जागे से स्वप्न, स्वप्न से सुषुप्ति का चक्कर काटती हूं,लेकिन न सूरज मिलता है,न तुरीय का कोई छोर हाथ लगता है! रोष और क्षुब्धता में जी में आता है सब गुलमोहर के लालिमा को निचोड़ दूँ! सारे अमलतास को लगा है मेरी ही क्षणभंगूरता का श्राप! इस विकलता से भरे दौड़ और घबराहट में 'माया' के हाथों से भी छूट गया है उसका सारथी।ह्रदय में एक उफान है कि उस अग्नि को जिसने शक्ति को...

अंतिम विदा…

अंतिम विदा… अंतिम विदा… _____________ यम के भी कांपे होंगे हाथ, जब उसने देखा होगा, पांच सालों से बीमार और दो दिन से अचेत पड़े,बूढे बीमार हाथों से , अपने 32 साला बच्चे के गालो को छूते हुए, पीले पड़ते होंठों और बेजान, बुझती आंखों में जीवन भर का प्यार, चिंता समेट, अंतिम बार अपने बच्चे को पुचकारते, उसकी ओर अंतिम चुम्बन उछालते हुए। यह अंतिम विदा था एक बीमार, थके जीवन का, एक युवा जीवन से विदा लेते हुए। फिर वैसी चिंता भरी कातर निगाहों से, किसी ने उस युवा जीवन को देखा नहीं। फिर वैसी तड़प से  किसी ने उसे चूमा नहीं। स्पर्शों और चुम्बनों से रहित उस दुनिया में, अब वह युवा बूढ़ा हो चला है, इतना बूढ़ा कि अपने ही सपनों को जला, उसपर जीवन की रोटी सेंक रहा है। वह जिम्मेदार थी,उसने उसी रूप में अपने बच्चों को प्यार किया, वह लापरवाह था,वह हमेशा उन रूपों को गंवाता रहा, उसका जीवन अंत गंवा दिए गए कथाओं का दर्शन है, जिसे कोई नहीं पढ़ता। वह उन गवां दिए गए,अनसुने कथाओं की आंच से जीवन की भट्टी को जला रहा है। क्योंकि, “सिर्फ मरने से ही नहीं, जीने से भी खत्म होता है जीवन”।।* (*उपरोक्त पंक्ति गीत चतुर्वेदी की कविता “ख...

एकांत...

 यद्यपि बेवजह की भीड़ में रहना कभी भाया नहीं।या तो आत्मीयजन हों पास या अकेले रहना ही भाता रहा मन को।किंतु तब भी यह निश्चित कर पाना कठिन है कि यह एकांत स्वेच्छा से चयनित है या अवसादजनित!यह अकेलेपन के मार्ग पर चलने का निर्णय स्व की चाहना है या परिस्थितिजन्य? कभी-कभी यह एकांत इतना भाया है कि इसकी सहारे मैं स्वयं को खोजने के प्रयास में लग जाती हूँ।तब इस स्व की खोज में दीपक बनते हैं कभी पुस्तकें,कभी अतीत में की गई यात्राओं की सुखद स्मृतियां,कभी खेलों के प्रति दीवानगी से उपजी बचपन की कुछ छोटी-छोटीघटनाएं,कभी अहं से ग्रस्त अपनी उपलब्धियां,कभी इष्ट-मित्रों की सह्रदयता के किस्से तो जीवन के कठिनतम क्षणों में किसी अनजान द्वारा की गई सहायता के कुछ किस्से। स्मरण हो आता है कि मैं जिस शहर में पली-बढ़ी,उसके नाम में ही है रस--बनारस।मानो जैसे शहर न हो,जीवनरस हो।यद्यपि लोग बहुधा यहा मुक्ति की कामना लिए आते हैं।किंतु मुक्ति उसे ही उपलब्ध है जिसे जीवनरस मिल चुका हो।कभी यह स्मृतियां मुझे ले जाती हैं सुख-संतोष-जीवंतता के पंखो पर बैठा बनारस की गलियों से गुजरते हुए महामना की बगिया में।जहां प्...

हिंद स्वराज

  आज जब एकदिन के लिए ट्रेन परिचालन बंद करने का समाचार सुना तो सबसे पहले जो याद आया, वह था गांधी द्वारा लिखित पुस्तक”हिंद स्वराज”।22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू के दिन क्या महज़ 80 पृष्ठ की यह पुस्तक हम पढ़ेंगे!और उससे भी महत्वपूर्ण क्या हम अपनी अंधी और व्यर्थ की महत्वाकांक्षा पर, मशीनों पर अपनी निर्भरता पर,सुविधाभोगी वस्तुतः विलासितापूर्ण जीवनचर्या पर नियंत्रण करेंगे!जिह्वा के स्वाद लोलुपता की वृत्ति पर नियंत्रण कर सकते हैं!केवल विरोध के लिए कुछ भी खाने की वृत्ति पर कुछ भी खाने से बच सकते हैं!स्थानीय भोजन संस्कृति द्वारा आमिष भोजन के समर्थन को बंद कर सकते हैं!यह भोजन पर नियंत्रण या निरामिष भोजन की वृत्ति को अपनाने की बात इसलिए कदापि नहीं है कि सनातन धर्म में शाकाहार की बात है, हिंदूं धर्म में शाकाहार की प्रशंसा की गई है!जब सनातन धर्म का समर्थन करना होगा, तब वो भी स्पष्ट रूप से करेंगे।क्योंकि सनातन धर्म हो या श्रमण संस्कृति भारत की,अपने अपने विधान के साथ हर जगह आमिष भोजन करने का उल्लेख है, जिसके पीछे कारण यह भौगोलिक रूप से स्थान विशेष की परिस्थितियों पर भोजन के नियम तय थें या होते थे प...

“क्योंकि स्पर्श अपने आप में एक पूरी भाषा होती है”

मार्च,अप्रैल के माह में अचानक गर्म थपेड़ों के  बीच में ,कभी सुबह कभी शाम में चलने वाली हल्की सी ठंडी हवा को महसूस किया है!उसके स्पर्श को!कुछ कहती है जैसे।क्योंकि स्पर्श मात्र स्पर्श नहीं होता;वह अपने आप में एक पूरी भाषा होती है।उसका छूना आमदिनों के छूने जैसा नहीं होता।तन को छूती,मन तक पहुंचती वह हवा सब अपनों के स्पर्शों से भरा एक पूरा जख़ीरा लिए उतरता है आत्मा तक।भुलाए गये हर किस्सों से सब परतें हट जाती हैं मन से,याद आ जाता है देह को देह में छुपी किसी और देह की याद्दाश्त!सब कड़वे अनुभवों से छांटकर,बचाकर ले आती है ये हवा बस कुछ तसल्ली सी देती स्पर्श, कुछ सुकून से देते स्पर्श,कुछ ढांढस बंधाते स्पर्श।ये पुरसुकून सी हवा दरअसल ले आई होती है अपनों के ये सब स्पर्श और ये भी संदेश कि कितना भी कठिन हो”ये समय है, बीत जाएगा”और उनकी ओर से भी जिन्होंने विदा में दिये थे कुछ शब्द इस माह में चलने वाली लू के जैसे,जो झुलसाते से रहते हैं देह को,मन को वर्ष भर!!शायद इन मार्च,अप्रैलों में चुपके से चलने वाली ये शीतल हवा रूठे हुए उस मीत की तरफ से चलकर आए वो शब्द हैं जो वे बोल न पाएं आखिरी बार विदा होते वक्त म...