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मेरे भीतर एक काफ्का रहता है…

 

मेरी माँ ने तो कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे घबराहट साये की तरह मेरे साथ हो जाए।बल्कि जब घबराए तो सब निशान मिटा दिए घबराहट के। 

एक बार याद है जब मैं 20-21 साल की थी,माँ खाना बना रहीं थीं और मैं चाय बनने की जल्दी में चूल्हे के पास बैठी थी,उसने मुझसे नमक का डिब्बा बंद कर रखने को कहा,न जाने क्यों बार बार ढक्कन खुल कर गिर जाता,माँ ने डाँटा।मैंने चिढ़ कर कहा हो जाता है कभी-कभी, इतना भी क्यूँ गुस्सा होना!शायद मैं नींद में थी दिन के 9 बजे!

फिर एक दिन दूध गिरा दिया मैंने पूरा।मैं तब बहुत डरी घबराई थी कि बहुत ही डांट सुनने को मिलेगी पर वह चुपचाप उठी जबकि दोपहर में वह एक घंटे आराम करती थी,उसके आराम में खलल पडा,किन्तु बिना एक शब्द बोले उसने जमीन पर दूध के एक कतरे का निशान न रहा,इस तरह साफ किया।मुझे लगा अब बिगड़ेंगी,पर फिर वह चुपचाप सो गई।अब मुझे दूसरी चिंता ने जकड लिया की शाम में चाय कैसे बनेगा और फिर सबको दूध के नुकसान का पता भी चल जाएगा, पर चाय ठीक बनने से पहले न जाने कब उसने दूध घर में लाकर रख दिया था,और कोई बात भी नहीं हुई दूध के नुकसान की।शाम में पिता की कटोरी में भी दूध था रोटी से खाने के लिए  । 

मैं एक गहरे सोच में थी और उस दिन नमक के ढक्कन के गिरने पर माँ की डांट याद आई; सम्भवतः बताना चाहती थी कि गलती होने के बाद हमेशा संभालना चाहिए कि गलती किया हुआ मन सम्भाल सके खुद को और डांटना पहले चाहिए कि गलती हो ही न।

        तब ऐसा क्यूँ है कि हरदम जी में एक बैचेनी,एक अनजाना भय बना रहता है तब भी जबकि कई भयाक्रांत पलों से कभी माँ,कभी पिता,कभी भाई- बहने,कभी कोई मित्र बचा ही लेता रहा!

   प्राग की गलियों में टहलने वाले काफ्का की बैचेनी, डर,बनारस की गलियों में आकर मुझसे कब और क्यूँ आकर मिल गई!!यही है जीवन!जिसमें दुःख आपको कहीं से भी आकर आपके अस्तित्व को पूरी तरह दबोच लेता है,भयाक्रांत करके रखता है,इससे मुक्ति जीते जी नहीं।मानो!जीवन किसी साहूकार से विवशता में लिया गया कर्ज है जिसमें ब्याज ही चुकाते-चुकाते कितनी बार मरना जीना हो जाता है लेकिन तब भी मूल बचा ही रह जाता है। 

  ‘ मेरे भीतर एक काफ्का रहता है ‘ से कुछ अंश

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