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कोने में पड़ी कंपकंपाती चिट्ठियां'

 


पत्र लिखना उसके प्रिय कार्यो में से एक था।भूल यह हुई कि लिखते समय अपना ह्रदय खोलकर रख देती कि पढ़ने वाला उसकी आंच को बर्दाश्त कर सके!उसकी कोमलता को सम्भाल सके!और शब्द दर शब्द उन्हें ऐसे पलटे कि पलटे जाने का शोर पढने वाले के सीने में किसी चक्रवात सा उठे किन्तु इस तरह सहेज भी सके कि दूसरा उस शोर को सुन न सके।

लिखते समय वह बराबर इस बात का ध्यान रखती थी कि पढने वाले को जब कोई शब्द या वाक्य इतना नम लगे कि उसके नेत्र भी सजल हो सकें तो अगला कोई काॅमा, किसी वाक्य का मोड ऐसा हो कि आगे के वाक्य, शब्द की सजलता के साथ पढने वाले की नेत्रों की नमी भी सोख ले और अगला कोई वाक्य, कोई शब्द खिल उठे बसंत की तरह। और यह बसंत उसके ओंठो पर बिखर कर अपने पूरे यौवन को प्राप्त कर सके।
उन अनगिन पत्रों के कोई वाक्य बुद्ध की मुस्कान जैसी थी तो कोई वाक्य सांख्य के विवेकज्ञान के जैसे!कोई शब्द, कोई वाक्य अपने एकांत के साथ थी किन्तु उसका यह एकांत इतना सम्पूर्ण था जैसे अद्वैत का ब्रह्म। कोई वाक्य यथार्थ को पूरे निर्ममता के साथ स्वीकार करना बताने वाला भी रहा तो कोई वाक्य ऐसा भी था जिसने कहा कि कभी-कभी कोई चोट मात्र एक चोट होती है जिससे उबरने में वह पूरा जीवन भी लग सकता है, किन्तु तब भी यह पता नही कि अगला जन्म हो तो वह उस वेदना से रहित होगा या नहीं!और अगला जनम पिछले जनम के कर्मों का भोग ही नही होता,आत्मा की देह पर पडे उस चोट की स्मृति के धुंधलके से भी घिरा होता है।आत्मा,मन,देह उस जीवन मे पिछले जनम की चोट से उपजी पीडा का ब्याज चुकाते रहता है,फिर भी मूल ज्यों का त्यों लगता है कि पड़ा है।उसने किसी चिट्ठी में कहा था 'मुझको ऐसा ही लगता है जैसे ये जीवन न जाने किस जनम में उठी पीड़ा में अब भी तप रहा है।'
किन्तु जब यह बात स्मरण होता है कि ये सब जिसे लिखा,उसने उन पन्नो को तो संभवतः रखा हो किसी गुमनाम अंधेरे में किन्तु उसपर अब कोई वाक्य, कोई शब्द नहीं बचा।वाक्यों को तोड़कर शब्दो और उनके सहायकों सहित कमरे से बाहर रखे कूड़ेदान में फेंक दिया है या घर की सीढियों से धकेल दिया है।उन चिट्ठियों के अर्थों को दीमक की तरह चट कर गया है,उन चिट्ठियों के रेशे-रेशे में समाए भावों को किसी भूखे शिकारी भेड़िए जैसे भकोस लिया गया है और शेष रह गई हैं बस हड्डियों के जैसे कुछ पन्ने।
या फिर उसने उन वाक्यों, शब्दों,काॅमा,फुलस्टाॅप को बटोरकर एक सीढी बनाई और कहा 'ये मेरी मेहनत से बनी सीढी है'।इतना सुनते ही हर एक चिट्ठी रोज मरने लगी जीते हुए।गोया वह बड़े जतन से पत्र लेता ही था कि एक दिन उसे इनसे सीढी बनानी है।
न जाने किस चिट्ठी की स्मृति में इनदिनों वह उदास है उन सभी चिट्ठियों के लिए जो जाया कर दिए गए किसी अपात्र पर।इनदिनों वह उन चिट्ठियों के लिए इतनी व्याकुल है कि सावन-भादों की नमी उसकी सांसो में समोकर उसकी सांसो को निढाल किए है।
सहसा ज्ञात होता है कि किसी को लिखी गई चिट्ठियां कभी कभी वह माध्यम बन जाती है जिससे इस जनम में वह नया चोट खा बैठे!और इस तरह यह अगले जन्म की पीड़ाओं का रस्ता बनाती है।और यह अनंत चक्र चलता रहता है जब तक यह चक्र रूकता नहीं!जब तक चिट्ठियां लिखना बंद नहीं होता!
अपने नये घाव से बेचैनी की मक्खियाँ उड़ाते वह सोच रही है कि काश!चिट्ठियों को हाथ-पैर होते,समझ होतीं तो वह उनके पास लौट आती चुपके से। और उन चिट्ठियों से वह आत्मा पर पहरा बैठाती कि फिर कोई चिट्ठी न लिख बैठे।कागज के अनगिन टुकडों को प्राणों को सौंप देती कि सांसे ठीक से चल सके।
या फिर इस व्यापारी दुनिया में उन सब चिट्ठियों को संकलित कर कोई पुस्तक ही प्रकाशित कर लेती।चार पैसों के लिए नहीं,अपितु इस हेतू की पुस्तक पढ़ने वाला जान सके कि ह्रदय को निचोड़कर लिखे गए वाक्यों-शब्दों में देखा जा सकता है छुपे ब्रह्म को और जान पाता कोई आखर की शक्ति को कि कैसे इससे संवेदनशील ह्रदयों को बचाया जा सकता है अविद्या के चक्र में फंसने से।।
...................................................जारी।
'मेरे भीतर एक काफ्का रहता है' से कुछ अंश।

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