एक दसबजिया,छोटा-सा फूल जिसकी प्रासंगिकता नगण्य है।शास्त्र उसका वर्णन नहीं करते।किसी देवता का प्रिय पुष्प होने का सौभाग्य उसे नहीं मिला।कोई महाकाव्य,कोई महान कथा जिसकी विषयवस्तु प्रेम हो, उसमें इसे स्थान नहीं मिला। सौंदर्य का कोई बिंब का प्रतिबिंब यह न बन सका।प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं को देने के लिए इसे कभी नहीं चुना,न तो प्रेमिकाओं ने इसे अपने केशों में टांका। इन प्रपंचों से कहीं बहुत दूर,सौंदर्य के विशाल समंदर से दूर ,उपेक्षित सा चुपचाप खड़ा रहा दसबजिया।और तो दार्शनिकों ने भी उसमें कोई दृष्टांत नहीं तलाशें। किंतु मैं कभी न बिसरा पाई इसे। संभवतः ऐसा बचपन की स्मृतियों के कारण हो जो अब अतीत हो चुका है और जहां तक अब केवल मन की गति है किंतु मन वहां बारंबार जाता है। खैर, किंतु दसबजिया स्मृतियों के कारण ही गहरे मानस में पैठा रह गया,ऐसी बात भी नहीं।एक तो गुलाब को गुलाब होने का बड़ा दंभ है।कमल को वर्तमान सत्तादल का प्रतीक होने का दंभ है।सबके अपने-अपने कारण है दंभी होने के जबकि दसबजिया को किसी बात का दंभ नहीं है।उसे अपना रुआब नहीं झाड़ना।उसपर विशेष होने का भी कोई दबाब नहीं है।यूं वह अपनी अप्...
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