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अंतिम विदा…

अंतिम विदा…

अंतिम विदा…
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यम के भी कांपे होंगे हाथ,
जब उसने देखा होगा,
पांच सालों से बीमार और दो दिन से अचेत पड़े,बूढे बीमार हाथों से ,
अपने 32 साला बच्चे के गालो को छूते हुए,
पीले पड़ते होंठों और बेजान, बुझती आंखों में जीवन भर का प्यार, चिंता समेट,
अंतिम बार अपने बच्चे को पुचकारते,
उसकी ओर अंतिम चुम्बन उछालते हुए।
यह अंतिम विदा था एक बीमार, थके जीवन का,
एक युवा जीवन से विदा लेते हुए।
फिर वैसी चिंता भरी कातर निगाहों से,
किसी ने उस युवा जीवन को देखा नहीं।
फिर वैसी तड़प से  किसी ने उसे चूमा नहीं।
स्पर्शों और चुम्बनों से रहित उस दुनिया में,
अब वह युवा बूढ़ा हो चला है,
इतना बूढ़ा कि अपने ही सपनों को जला,
उसपर जीवन की रोटी सेंक रहा है।
वह जिम्मेदार थी,उसने उसी रूप में अपने बच्चों को प्यार किया,
वह लापरवाह था,वह हमेशा उन रूपों को गंवाता रहा,
उसका जीवन अंत गंवा दिए गए कथाओं का दर्शन है,
जिसे कोई नहीं पढ़ता।
वह उन गवां दिए गए,अनसुने कथाओं की आंच से जीवन की भट्टी को जला रहा है।
क्योंकि,
“सिर्फ मरने से ही नहीं,
जीने से भी खत्म होता है जीवन”।।*

(*उपरोक्त पंक्ति गीत चतुर्वेदी की कविता “खुशियों के गुप्तचर से ली गई है) 

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