Skip to main content

कर्मशील जीवन,वेदांत दर्शन और स्वामी विवेकानंद…

 

कोई सिद्धांत बिल्कुल ठीक,तार्किक,तथ्यात्मक होने पर भी यदि कार्यरूप में परिणत न हो तो बौद्धिक व्यायाम ही होता है वह।और जीवन पथ पर चलने के लिए फिर इस प्रकार के सिद्धांत का कोई और मूल्य भी नहीं रह जाता।अतः जीवन के कर्मरूपी दर्शन में सधने के लिए हर प्रकार के विचार दर्शन को धरातल पर उतरना ही होगा।केवल यही नहीं, आध्यात्म हो कि भौतिकवाद, आदर्श हो कि व्यवहारवाद,इनके बीच के भेद को भी मिटा सके।एक सिद्धांत वही सर्वथा अनुकूल है मानव जीवन के, जो इनके मध्य के अंतर को ठीक ठीक पाट सके।पर्वत, गुफाओं, जंगलों में से जन से भरे नगर में तो आना ही होगा सिद्धांत को, उसे विचार से कार्य रूप में भी परिणित होना पड़ेगा।कोई सिद्धांत या मत अथवा विचार उतने ही अंश में सर्वोत्कृष्ट है जो संसार के मनीषियों के सांसारिक कर्मों में परिलक्षित हो पाए।
इसका सर्वोत्तम उदाहरण स्वयं आचार्य शंकर,चाणक्य तथा इनके जैसे अनेक अन्य मनीषियों, चिंतकों, का जीवन रहा।और इसी बात का संसार को उपदेश देते हैं, संग्रामस्थल के मध्य गीता का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण।प्रत्येक श्लोक में मानो यही स्वर ,यही उपदेश है-कर्मण्यता का।यही वेदांत का पाठ उद्घोष है, यही संसार के सभी महान चिंतकों का उपदेश है, श्रेष्ठ विचार को कर्म रूप में भौतिक धरातल पर उतारना।
   परंतु इसके लिए प्राथमिक आवश्यकता है स्वयं का शांत रहना, अपने मन या चित्त का साम्यावस्था मे रहना, स्थिर रहना।जितनी अधिक चित्त में शांति होगी,कार्य करने में उतना ही बल प्राप्त होगा और कार्य उतनी ही मात्रा में सफल होगा।आवेग अथवा कोरी भावुकता मात्र मन को चंचल बना देना अथवा अपनी ही शक्ति का अपव्यय है।जो शक्ति या ऊर्जा कार्य में बदलना था,वह भावुकता में बदल कर नष्ट हो जाती है और न हम कोई कार्य कर पाते हैं न भावनाओं को संतुष्ट।
परंतु विचार, भावना, सिद्धांत को जिसपर भी हमारा विश्वास हो,उसे कर्म में बदलने के लिए सर्वाधिक आवश्यकता है मनुष्य का स्वयं पर विश्वास करना।स्त्री हो कि पुरूष, बालक हो या वृद्ध, किसी भी जाति, लिंग,वर्ण का हो,स्वयं पर विश्वास किये जाने की बहुत आवश्यकता है।वेदांत अपने समस्त विचारों,तर्कों द्वारा यही कहता है कि “जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है।”(स्वामी विवेकानंद)

वेदांत के इस व्यवाहरिक पक्ष को अपने कर्ममय जीवन में उतारने वाले तथा 19वीं शताब्दी में वेदांत दर्शन के इस पक्ष को पुनर्व्याख्यायित  करने वाले नव्यवेदांत दर्शन के प्रणेता, युवाओं के प्रेरणास्रोत, अजस्र ऊर्जा के केन्द्र,स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर इस शब्दांजली द्वारा उन्हें नमन।।

Comments

Popular posts from this blog

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

19/06/2025

मां जब बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि फिर पहले जैसी न हुईं,उन्हीं दिनों की बात है जब देह में एक अनजाने रोग ने दस्तक दी।दस्तक ही इतनी जोरदार थी कि लगा आगे क्या होगा।इन भय से भरे दिन में जब मां से मिलने गई किंतु बता न सकी कि मैं कितने दर्द में हूं,तभी कि बात है। बीमारी से पहले मां को न रोग बताने पड़ते थें न पीड़ाओं की गहराई,चाहे वह देह पर लगी हो या मन पर।न जाने कौन सी पढ़ाई उसने कहां से की थी कि कुछ कहना नहीं पड़ता था गो वह जानती थी कि मुझे शायद कहने नहीं आता या कहूंगी नहीं। तब दर्द से रातभर जगने के कारण अगली सुबह जब शरीर के कुछ कदम चलने में भी सहयोग देने से मना करने पर मां के बगल में लेटी।तब स्वयं पर जीवन में पहली बार दया आई।मन इस वेदना से मनो भारी हो गया कि अब दर्द को बिना कहे कोई समझने वाला नहीं है।अब बीमार पड़ने पर कोई दौड़-दौड़कर दवा लाने वाला नहीं है। वह पहली बार था जब बीमार पड़ने पर स्वयं पर रोना आया।अब भी बीमार पड़ती हूं,बीमारी में रोना आता है किंतु अब खुद पर उस दिन जैसी दया नहीं आती।अब कहने का सहूर भी आ गया है।यह न कहना भी कृतघ्नता होगी कि जीवन के सामाजिक दायरे ने ऐसा खुशनुमा विस्तार...

उदास दिन...

मैं अक्सर बेहिसाब उदासी से भर जाती हूं।इतनी उदास कि इस उदासी से दुनिया में एक नया महासागर बन‌ सकता है और दुनिया के नक्शे में पांच महासागर की जगह कुल छह समंदर हो जाएं।जब मैं कहती हूं किसी अपने से कि बहुत उदास हूं तो वह मुझे समझाता है कि फलां-फलां कारण से उदास हो और फलां-फलां काम करो,मन लगाओ तो उदासी दूर हो जाएगी। गोया उदास होना बहुत बुरी बात हो।कोई नहीं मिलता जो ये कहे कि ओह!उदास हो!अच्छी बात है,रहो उदास और इस दुनिया की चिंता मत करो।यह उदासी तुम्हारी यानि मेरा किरदार है इस दुनियावी रंगमंच पर। वर्ष भर के किन्ही‌ कमजोर दिनों में मैं अपनी उदासी को साधने में नाकामयाब होती हूं और तब उन दिनों में मैं अपने पसंदीदा गाना नहीं गा पाती‌ हूं।उन गीतों को भी नहीं जो प्रसन्नता के दिनों में बड़े सुर में निकलते हैं।उदासी‌ भरे गीतों के तो बोल तक नहीं फूटते कंठ से जबकि मुझे लगता है मेरी आवाज़ पर वे ही गीत अधिक फबते हैं।इन बेहद गहरे उदास दिनों में कुछ लिखा‌ भी नहीं जाता।शब्द कहीं खो जाते हैं।अर्थ अपनी अभिव्यक्ति में असमर्थ से हो जाते हैं।उथले से वाक्य बनते हैं और बेहद छिछले से वाक्यांश।और कलम!साध लेती है च...