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अमलतास को दूं अमरता का आशीष...

कोई सुगढ़,सुंदर चित्र गढ रही थी कि काला रंग बिखर गया और बिखरता ही जा रहा है,फैलता ही जा रहा है ब्रह्मांड की तरह!


अब सूझता नहीं रंग कौन सा भरूं!दिखता भी नहीं।मेरे आंखो पर लगे हैं जो देशकाल के चश्में,व्याकुलता में मन में आता है कि इसे चकनाचूर कर सब शीशों को पिघला कर बना दूं पानी,जो सबकी आंखों में सदैव चमकता रहे!

मेरे इस चित्र में था मेरा अपना एक सौरमंडल,
अभी सब ने अपनी-अपनी धुरी पर चलना सीखा ही था कि मेरे सूरज को निगल गया कोई!
मुझे जिस पृथ्वी ने धारण किया था,प्राणहीन हो गई अपने सूरज के बिना,और एक दिन पूरी पृथ्वी गल गई कागज की तरह!

हर किसी के हिस्से है एक सूरज और सूरज को उसकी धरती,मैं अपने सूरज की खोज में भटक कर जागे से स्वप्न, स्वप्न से सुषुप्ति का चक्कर काटती हूं,लेकिन न सूरज मिलता है,न तुरीय का कोई छोर हाथ लगता है!

रोष और क्षुब्धता में जी में आता है सब गुलमोहर के लालिमा को निचोड़ दूँ!
सारे अमलतास को लगा है मेरी ही क्षणभंगूरता का श्राप!

इस विकलता से भरे दौड़ और घबराहट में 'माया' के हाथों से भी छूट गया है उसका सारथी।ह्रदय में एक उफान है कि उस अग्नि को जिसने शक्ति को श्रीहीन किया,उस अग्नि की सारी ज्वलनशीलता सोखकर उसे डूबो दूं समंदर में,
और अपने पूर्वज़ ऋषि की भांति समंदर को पीकर‌ कर  दूं सूखा।
मेरे अंतस में एक बेढभ सा ब्रह्मांड बसा है जिसका कोई सिरा हाथ लगता नहीं,वह बस सुरसा की तरह मुंह बाये बढता जा रहा है,फैलाए ही जा रहा है मेरे मन के आकाश पर कालिमा का साम्राज्य!!






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