लोककलाएं अपने भूगोल में देसी होती हैं किंतु व्याप्ति में एक समूचे राष्ट्र और उसकी सांस्कृतिक पहचान को समेटे होती हैं।वे शास्त्रों के ज्ञान को भदेस में लोक तक संचारित करती है। यदि ऐसा न हो तो सुप्रीम कोर्ट में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा श्री राम को काल्पनिक बताने वाले अपनी कुचाल में सफल न हो जाता अगर राम की दामाद के रूप में लोक में चेतना न होती। यही लोककला है जो गाती है कि,'ऐ पहुना,ऐही मिथिला में रहना'। और मां जानकी के साथ अपने राजा को यह राष्ट्र बिहार क्षेत्र में पाहुन बनाकर पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृतियों में संजोकर रखता है। लोककला जिसकी काया देसी है किंतु आत्मा राष्ट्रीय। महादेव,श्रीराम और श्रीकृष्ण इस भारत राष्ट्र की आत्मा हैं।यह वह भित्ति है जिसपर भारत का चित्र बना है।उसकी सांस्कृतिक चेतना की बुनाई इन्हीं तीनों से हुई हैं। किंतु जिस शलाका पर यह चेतना बुनी है वह भारत की लोककलाएं हैं।अपने रूप में देसी किंतु आत्मा से राष्ट्रीय। भारत के किसी कोने में बैठकर जब किसी ने इक भारी-भरकम - गरजती आवाज़ में सुना होगा,'तो चलिए अब चलते हैं कुरूक्षेत्र की ओर जहां कौरव और पांडव की सेना आमने-सामने ...
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