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मेरी नींद...

इरशाद कामिल ने लिखा है,'कागा रे कागा रे मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खाइयो मांस, न तू नैणा मोरे खाईयों जिसमें पिया के मिलन की आस'!  कभी कभी मुझे लगता है जैसे इसी कागा चुरा ली हो मेरी नींद हितैषी बन!कि जब तक जिऊँ पियमिलन की आस आंखों में तैरती रहे और मरूँ तो आंखें खुली रहें कि मैं सोती रहूँ और प्राण संग उड़ न जाए मिलन की आस। मैं जो सोचती हूँ कि कभी उस कागा की तलाश में निकलूँ तो पता लगता है सबकुछ अपनी जगह पर है,रास्ते भी,मंजिलें भी।किंतु कदम की ताल अब बिगड़ गई है।यूँ भी माँ कहती थी बचपन में पक्षीयों से डरने पर जब वे आंगन में उतर आते कि कहीं मेरे हाथ की रोटी छीन न ले जाए कि पंक्षियों से भला क्या डरना!वे पलभर कहीं ठहरते हैं फिर कहीं और चल देते हैं।जिस पक्षी से मैं डर रहीं हूँ वो तो अब जाने उड़कर कहाँ चली गई होगी। किंतु फिर भी मुझे सोना है खूब गहरी नींद जो जाने कब से खो गई है और मैं मानो सदियों की थकी!मुझे ऐसी नींद चाहिए जैसी माँ के गर्भ में कि माँ ने जो खाया उससे पोषण मिला,भूख मिटी,अब माँ ही दुनिया से लड़ लेगी मेरे लिए और मैं तबतक खूब गहरी नींद में सोऊं।जो यह भी न हो सके तो एक ऐसी शाम...

अजनबीपन... 2

अजनीबन का एहसास एक आतंक है जो घर से निकलते ही मुझे घेर लेता है।मैं जब अपने कमरे में होती हूँ तब तक सब ठीक लगता है क्योंकि कमरे पर मेरी पुस्तकें हैं,मोबाइल है जिसपर मैं अपना पसंदीदा गाना सुन सकती हूँ,एक रसोई है जिसपर मनचाहा कुछ बना सकती हूँ।यहाँ मेरे अलावा कोई और नहीं जिससे मुझे भय हो,जो मुझे नहीं जानता,इसलिए अजनबी होने का किसी से भय भी नहीं है।  ऐसा लगता है मानो जीवन एक बियाबान जंगल है जहाँ हजारों आंखे आपको देख रहीं हों लेकिन आप उनमें से किसी को नहीं जानते।जान भी ले तो समझ की एक खाई होती है जो मेरे और सामने वाले के मध्य होती है इसलिए हम अजनबी ही रह जाते हैं।यदि कोई जानपहचान का मिल भी जाए तो मैं भय खाती हूँ कि कोई रोककर मेरा हाल चाल न पूछे क्योंकि तब मुझे झूठ कहना पड़ेगा,झूठ सुनना पड़ेगा।मैं जानती हूँ कि अपने ही द्वारा कहे गये शब्दों के साथ लोग कैसा छल करते हैं फिर भला उसके भाव,उसके अर्थ तक मैं ही कैसे पहुचुंगी जब वे स्वयं नहीं पहुंच पाते और इस तरह हजारों लोगों से घिरी मेरी दुनिया में मैं अजनबी ही रह जाती हूँ। ऐसा नहीं है कि यह मेरे दुख का कारण है,पीड़ाओं का कारण है।किंतु यह मेरे भय...

पीत-नील वर्ण

  मेरी पसंद में सदैव से मौजूं था पीत रंग!  रंगों में जो कृष्ण था! कोई रंग ऐसा भी नहीं था,जो नापसंद हो मुझे! दरअसल मैंने अन्य रंगों की उपस्थिति पर विचार नहीं किया कभी!  मेरे संदर्भ में रंग का तात्पर्य था उससे उपजा आत्मविश्वास! उससे पनपा प्रेम!  उससे बिखरी जग में करूणा! मैं पसंद करती थी उसे,  जिसे पसंद था पीला रंग! धीरे धीरे उसके सारे पसंद मेरे पसंद बनते गए! फिर उसके-मेरे पसंद में द्वैत नहीं रह गया! मेरे लिए सूर्य पीला हो गया, पीला चाय का रंग, मेरी नजरों में पृथ्वी- पेड़- पहाड़ सब पीले हो गए! मैंने सब रंगों से दुश्मनी कर ली, मेरे लिए सर्वत्र बस पीले रंग का एकछत्र राज्य था! किंतु एक दिन!काल का चक्र घूमा और एक धोखे का धूमकेतु आ लगा मेरी पीठ पर! पसंद में अब भी द्वैत था किंतु पसंद करने वाले द्वैती हो गए! जाते हुए कहा उसने -'अपना ध्यान रखना'! मुझे इस वाक्य में नीलापन नजर आया! लम्बे समय बाद मुझे होश आया!  अब मुझे दुनिया के तमाम चीजों में नीला रंग आया! वही नील जो चोट लगने पर उभर आता है, मेरे लिए सूर्य नीला हो गया, नीला चाय का रंग औ!  मेरी नजरों में पृथ्वी-पेड़-...

दिसम्बर...

  ( चित्र छत्तीसगढ़ बिलासपुर के गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय से;जहाँ पिछले दिनों कुछ समय बिताने का अवसर मिला; यूँ तो कार्य की व्यस्तता के चलते विश्वविद्यालय परिसर ठीक से घूमना तो संभव न हो सका लेकिन कुछ जगहें बस एक नज़र भर की प्रतीक्षा में होती हैं जो दिल चुरा लेती हैं, जैसे परिसर स्थित यह झील जिसके किनारे सूरज डूब रहा था और इसी के साथ डूब रहे थें बहुतों के दिल भी♥)  एक शे़र सुना था कहीं,'कितने दिलों को तोड़ती है फरवरी!यूँ ही नहीं किसी ने इसके दिन घटाए हैं'!शे़र जिसका भी हो,बात बिलकुल दुरूस्त है।ह्रदय जैसे नाजुक,कोमल,निश्छल अंग को तोड़ने वाले को सजा मिलनी ही चाहिए,चाहे मनुष्य हो या मौसम।  तब ध्यान में आता है दिसम्बर!दिसम्बर जब पूरे वर्ष भर का लेखा-जोखा करना होता है लेकिन दिसम्बर में कुछ ठहरता कहाँ है?दिनों को पंख लग जाते हैं,सूरज के मार्तण्ड रूप को नज़र!सांझे बेवजह उदासी के दुशाले ओढ़ तेजी से निकलती हैं जाने कहाँ के लिए!जाने कौन उसकी प्रतीक्षा में रहता है कि ठीक से अलविदा भी नहीं कह पाता दुपहरिया उसे!जबकि लौटना उसे खाली हाथ ही होता है!वह सुन भी नहीं पाती जाने...

एक शिविर से लौटने के उपरांत...

दुनिया भर के दुख को सहते हुए भी मनुष्य मरना नहीं चाहता।जीवन से उसका मोह बना रहता है।यही मोह उसे मृत्यु के समय देह का त्याग करते हुए उसके अथाह पीड़ा और पुनः भवचक्र में फंस जाने का कारण बनती है।यही मोह मां के गर्भ से बाहर आने पर होने वाले कष्ट का कारण बनती है।यही मोह अगले किसी जनम में,किसी योनि में उसकी व्याकुलता का बीज बोती है।उस सुख की तलाश में जो पिछले जीवन में मिला था,उसको ढूंढते हुए बैचेन फिरता है पर सुख किसी ठौर मिलता नही।  किंतु मनुष्य से बढ़कर छलिया भी भला कौन है!वह स्वयं को छलने में ही अत्यंत माहिर है।वह दूसरे किसी सुख,मोह,पीडाओं का आसरा ढूंढ लेता है और एकबार फिर स्वयं को छलते हुए नये जीवन की दुश्वारियों में खुद को घेर लेता है।वह ठहर जाता है अपनी व्याकुलता,अपनी बैचेनी के मूल तक जाने से और बुद्ध के शब्दों में यह भव चक्र चलता रहता है और मनुष्य का मन कभी उस चक्र से बाहर नहीं आ पाता।संभवत: विज्ञानवादी यही कहना-समझाना चाहते थें कि सबकुछ आत्मारोपित है।मानव मन अथवा चेतना की ऐसी कोई धारा,ऐसी कोई वृत्ति नहीं जो बाहर से आती हो!सबकुछ हमारे ही द्वारा रचा गया है।संभवतः इसीलिए यदि ईमानदार...

हेमंत - पहला भाग

  हेमंत ( ऋतुओं का चक्र जाने क्या भेदने के लिए घूमता है, चित्त को व्याकुल किए रहता है किंतु मन है कि अपने ही वृत्तियों के जंजाल में फंसा रहता है)  यूँ तो हेमंत पर कुबेरनाथ राय जी ने जो लिखा है,उसके बाद क्या शेष रह जाता है और कुछ लिखने को!फिर सोचती हूँ यह तो उनकी बात हुई,उनके मन की बात हुई।वह हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार हैं।मुझमें न वह ज्ञान,न भाषाशैली।किंतु वह भाव जो हेमंत को लेकर मुझमें है,जिसे प्रकट कर देना चाहिए अपनी टूटी-फूटी भाषा में ही।क्योंकि लिखना एक तरह से टाॅनिक का काम करता है।वह भी अवसाद के माह हेमंत में!करूणा के माह हेमंत में।हेमंत के बहाने हो सकता है वह सूक्ष्म स्थिति चित्त की पकड़ में आ जाए जो समय के मकड़जाल से,मन के चक्रव्यूह से संभवतः चेतना को निकाल उसे मुक्त कर सके।प्रतीत्यसमुत्पाद के,भव के चक्र से चेतना को बाहर निकाल सके।                कुबेरनाथ राय अपने एक निबंध का शीर्षक देते हैं 'भाई फागुन,हिम्मत मत हारना'।मैं सोचती हूँ यह तो हेमंत को कहना चाहिए कि 'भाई हेमंत,हिम्मत मत हारना'।व...

घर से लौटने की पीड़ा...

            चित्र घर से लौटते वक्त रेलगाड़ी से ली गई...  घर! भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता की  कुछ लाइन्स हैं,- मैं मजे में हूँ,सही है, घर नहीं हूँ,बस यही है।  लेकिन ये बस बड़ा बस है,इस बस से सब विरस है।  यकीनन,घर से दूर सब दुनियाभर के आराम हो,शान हों लेकिन एक समय के बाद घर पर बस यूँ ही पड़े रहना कभी खाली,इसमें बहुत कुछ भरा होता है।इतना कि यह सांसों में जीवन भर देता है।  दुर्गापूजा और दिवाली-छठ मिलाकर उत्तर प्रदेश और बिहार में एक माह के अंदर में लगभग सप्ताह भर की छुट्टी मिल जाती है।मैं भी इन छुट्टियों में घर गई, बहन के घर गई।आज के समय या कहें कि किसी भी समय में माँ-बाप के बाद भी भाई-भौजाई-बहनें यदि पूछ लें तो मैं समझती हूँ यह भी जीवन का सौभाग्य है।न जाने किसके आशीर्वाद से यह सौभाग्य अब तक जीवन में व्याप्त है।बस एक कचोट रह गई मन में कि इस बार गाँव जाना न हो पाया।जबकि गाँव की याद रह रहकर गर्मी की छुट्टी से लौटने के बाद आ रही थी मानो कोई प्रतीक्षारत हो वहाँ।अब तो होली पर ही शायद जाना हो सके।  बहरहाल,  इस बार घर से लौटते स...

भारतीय बौद्धिकता की दरिद्रता...

भारतीय बौद्धिकता अथवा भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दरिद्रता तो देखिए!लगभग 27 वर्षों से अंग्रेजी और हिंदी में हर माह प्रकाशित होने वाली पत्रिका राजनेताओं,खिलाड़ियों,फिल्मी भांड-भांड़िनियों से नीचे गिरते हैं तो ऐसे संस्थानों और उनके रहनुमाओं को अपने मुखपृष्ठ पर स्थान देते हैं जिन्होंने शिक्षा को व्यापार बनाने और उसे बाजार के हाथों सौंप देने में अतुलनीय योगदान दिया है।जिन्होंने शैक्षणिक संस्थानों की हालत बद से बदतर करने में अभूतपूर्व योगदान दिया है।  क्या किसी विश्वविद्यालय,महाविद्यालय अथवा विद्यालय में ऐसे शिक्षक बचे ही नहीं हैं जो किसी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर स्थान न प्राप्त कर सकें?  बहरहाल,  इनमें से खान महोदय की जो भाषा-शैली है पढ़ाने की,उसे हमारे यहाँ "लवंडों" की भाषा-शैली कहते हैं।यही ढंग एक शिक्षण संस्थान का शिक्षक अपना ले,तब यही समाज उल्टे उसे पढ़ाने का ढंग सिखाने लगेगा।विकास दिव्यकीर्ति जी को क्या कहा जाए! महानायक हैं इस जमाने के।इन चारों में से सबसे अधिक छद्म आवरण धारण करने वाले।बाकी दोनों तो इतने इरीटेटिंग और तर्कहीन-तथ्यहीन हैं कि उन्हें दो मिनट सुनना भी न हो पाए।कि...

जीवन का क्रिकेटीय आईना...

खेल,चाहे कोई भी हो,केवल इसलिए नही भाता कि वह खेल है और हमारा मनोरंजन करता है।खेल देखना या खेलना इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि यह जीवन का आईना है।जैसे हम इस समष्टि रूपी स्वप्न में भी सोते हुए स्वप्न देखते हैं या कहें कि स्वप्न में स्वप्न देखते हैं,वैसे ही जीवन को जीते हुए खेल में जीवन के अक्स को देखना तब बहुत राहत देता है जब आप अर्श से फर्श पर होते हैं और एक लम्बी नाकामी,असफलता,आलोचना के बाद भी तमाम अटकलों,आलोचनाओं को धता बताते हुए पुनः अर्श पर जा विराजते हैं। हमारे-आपके जीवन की कहानी भी तो कुछ ऐसी ही होती है!कभी हम बुरी तरह हार जाते हैं,कभी जरा से अंतर से चूक जाते हैं!जिंदगी खूब भगाती-दौड़ाती है और हाथ आती है तब भी असफलता,निराशा-हताशा!गैरों की आलोचना,अपनों की बेरूखी!हमारे जीवन के समीक्षकों के हमारे चूक जाने का ऐलान!और एक दिन हम इन सबको गलत सिद्ध करते हुए पुनः अपने आपको मजबूती से खड़ा पाते हैं।हमें बस कोहली-पांडया की साझेदारी की तरह धैर्य के साथ अपनी जीवन की पारी को संभालकर,अश्विन की तरह समझदारी दिखाते हुए उन सब आलोचनाओं-बेरूखियो रूपी वाइड बाॅल को छोड़कर,उस अंतिम एक रन के लिए बिना किसी घब...

सृष्टि के सम्मान का किस्सा,सभी का है हिस्सा…

  सृष्टि के सम्मान का किस्सा, सभी का है हिस्सा…  घर को कभी कभी इतने करीने से रख देती हूँ कि छूने से भय लगता है कि मेरे छूने से कमरे और उसके वस्तुओं की तन्मयता न टूट जाए कहीं! उनकी साधना भंग न हो जाए कहीं! आखिरकार जैन दर्शन तो स्वीकार करता भी है कि जड़ में भी चेतना है,भले सुप्त अवस्था में हो। बहुत संवार देने पर मेरा ही कमरा अजनबी लगने लगता है मुझसे। सुप्त चेतना से याद आया मनुष्यों की चेतना ही भला कौन सी जाग्रत है! तब सोचती हूँ कौन अधिक जड़ है या कहें कि कौन वास्तव में जड़ है? क्योंकि देखा जाए तो भारतीय दर्शन में एक पदार्थवादियों को,यथा- चार्वाक, न्याय-वैशेषिक तथा मीमांसकों को छोड़ दें तो बाकी जड़त्व पर बहुत आग्रहित नहीं हैं। तब यह प्रश्न मेरे सम्मुख सुरसा के जैसे मुंह बाए खड़ी हो जाती है कि जैनो, बौद्धों, अद्वैतियों की परिभाषा में कि आखिर जड़ है कौन? चेतनारहित दिखने वाली वस्तुएँ या मनुष्य! क्योंकि चेतना तो दोनों जगहें सुप्त हैं।     जड़ को यह कहकर कि उसमें सुप्त है चेतना, उन्हें वस्तु या विषय बना देना यह तो अन्याय है किसी के अस्तित्व के साथ! क्योंकि सोई हुई ...

मैं कैसी हूँ...

छवि: गोरखपुर शहर के गोरखनाथ मंदिर के परिसर में स्थित सरोवर की।  मेरा एक विशेष स्वभाव रहा है सदैव से कि उसी के पास बैठ पाते हैं या बातें करते हैं जिससे मन मिलता है।अन्यथा अकेले ही रहना पसंद करती हूँ।मुझे स्मरण है छात्रावास के दिनों में मैं एक जूनियर के कमरे पर काफी देर से और बड़े इत्मिनान से बैठी थी,तभी मेरी दोस्त आती है और कहती है 'तुम्हें मैंने सब जगह ढूंढा और तुम यहाँ बैठी हो!' फिर वह मेरी जूनियर से मुखातिब हो कहा कि 'तुममे जरूर कुछ बात है जो यह(मैं) यहाँ बैठी है इतने अनौपचारिक रूप से।' यही हाल रिश्तेदारों के सम्बन्ध में भी है।अभी भी घर जाती हूँ तो दरवाजे तक उठकर जाने की जहमत नहीं उठाती कि कौन आ-जा रहा है।मुझे बस उस थाली से मतलब रहता है जो सुबह-शाम भाभी देती हैं।निश्चित रूप से इस कठोर और कड़वे संसार में भाई की ब्याहता भोजन परोस कर दे दें वह भी मेरी रूचि का,निश्चित ही यह मेरे पुण्य कर्मों के प्रतिफल से अधिक उनके संस्कार की बदौलत हैं। बहरहाल,  मैं अपने कार्यस्थल भी चुपचाप जाती हूँ,अपना काम किया और घर लौट आती हूँ।सिवाय दो-तीन आत्मीयजनों के पास कभी-कभार बैठ जाने के।वह भी ...

सुख

    छवि: पाकिस्तानी ड्रामा सीरियल 'सुनो चंदा',भाग दो से।  'सुख' बस इतना ही है,भगोने से चाय को कप में डालने तक। उसके बाद सुख की तीव्रता वैसे ही कम होती जाती है जैसे जाड़े के मौसम में पलभर में चाय ठंडी हो जाती है।क्या नही? सोचकर देखें जरा!  हम कितने खुश होते हैं,एक उन्माद जैसी अवस्था में होते हैं जब गरमागरम चाय को कप में उड़ेल रहे होते हैं कि अब चाय के कप संग बैठकर इत्मीनान से उन सब बातों पर सोचेंगे जिन्हें जिंदगी की आपाधापी में हमने सोचने तक से टाला होता है।कितने मुतमईन होते हैं कि एक कप चाय पीने भर तक यह जीवन केवल और केवल अपना होगा।जहाँ हम बंटे नहीं होंगे तमाम दुनियावी रिश्तों में और उत्तरदायित्वों में।हम बैठेंगे चाय पर उसके साथ जिसके साथ बैठना चाहते हैं, भले वह व्यक्ति पास हो न हो!  किंतु जैसे ही चाय कप में भर जाता है, हम भी निकल आते हैं इस सुकुन भरे सोच से और हमें घेर लेती है ये दुनिया। फिर तो घूंट दर घूंट उतरती जाती है न केवल हलक में चाय बल्कि उसके साथ फुरसत के पल भी खाली होते जाते हैं समय के कप से।  यहाँ मुझे गोपालदास नीरज के गीत 'कारवां गुजर गया',...

माँ का जन्मदिन...

  मिट्टी का चूल्हा,आसमान का मुंह ताकती रसोई,रसोई को छत के रूप में दो नीम के पेड़ों का आसरा।चूल्हे पर पकता दाल,भूख से व्याकुल चूल्हे के पास बैठी मैं और तमाम चिंताओं को परे रख जल्दी से दाल पक जाए,(क्योंकि चावल और सब्जी तो जल्दी बन जाते लेकिन दाल में समय लगता था) इस व्यवस्था में लगी हुई 'माँ।  खुला कच्चा आंगन,आंगन के उसपार ओसारे में बैठे पिता।ओसारे से रसोई तक इधर-उधर फुदकती मैं,कभी पिता को चाय देने,कभी पिता का कोई संदेश माँ को पहुंचाने के लिए।मैं थोड़ी देर रसोई में उसके पास बैठ जाती तो माँ कहती 'ज्जा ओसरवे में बइठा बाऊजी के लग्गे,थोड़के देरी में बन जाला खाना'।किंतु मुझे उसके पास बैठना अधिक अच्छा लगता था क्योंकि रसोई के छत के रूप में उन दो नीम के पेड़ों की छांव में बैठना मुझे सबसे अच्छा लगता। कारण,जगजीत सिंह की गजल, ' हम तो हैं परदेश में', में एक लाइन है-' आंगन वाली नीम पे जाकर अटका होगा चांद',गांव वाले घर के आंगन में लगे उन दो पेड़ों पर मैंने चांद को सच में अटकते हुए देखा है जाने कितनी अनगिन रातों में और इसलिए दिन के उजियारे में नीम के साथ चांद की प्रतीक्षा करत...

पुल से गुजरते समय...

समक्ष माँ गंगा स्थिरता का भ्रम रचती हुई प्रवाहित हो रहीं हैं।सामने घाट से राजघाट तक जगमग करते घाटों की सर्पीली श्रृंखला है।पर ये सब देखते हुए मैने इन्हें नहीं देखा,बल्कि देखा एक किनारे आसमान छूती हुई एक फ्लैट गर्व से तनी हुई थी जिसकी खिड़कियों से रौशनी छन-छन कर गिर रही थी।जिसे देखते हुए तुम याद आए और तुम्हें याद करते हुए  वही अनुत्तरित प्रश्न स्वयं से पूछा कि जैसे इतनी दूर से इन खिड़कियों को देखते हुए उनमें मैं तुम्हें ढूंढ रहीं हूँ,क्या तुम भी अपने घर की खिड़की से झांकते,बाहर चलते हुए लोगों में मुझे ढूंढते होगे! हेडफोन में गाना बज रहा था–'मैंने तुझे देखा.... इसमें एक लाइन है 'मैंने तुझे देखा इश्क के मलालों  में',मैं अब तुम्हें वहीं देखती हूँ।और तुम भी मुझे देख रहे होगे अपने किसी कर्म की सजा में।  इस दुख में पुल की रेलिंग पर हाथ धर ह्रदय को टेक देना चाहा तो पुल की धड़कनें सुनाई दीं।वही पुल जिसपर खड़ी हूँ।न जाने पुल बनाने वालों में से किसकी ह्रदय की धड़कने पुल में समा गईं कि छूट गईं,क्या मालूम!उन धड़कनों को अनसुना कर आगे बढ़ना था क्योंकि यही नियम है इस बेढ़ब-बेगढ़ संसार का...

बुद्ध पूर्णिमा...

मैं बुद्ध के बताये दुखमय संसार की एक दुख मात्र हूँ…  दर्शन जगत् में बुद्ध का होना दर्शन जगत् की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।एक ऐसी उपलब्धि जिसपर दर्शन-जगत् जीवनपर्यंत अभिमान कर सकता है।क्योंकि उनके दार्शनिक उपदेशों में अथवा वचनों में मनोविज्ञान गहरे गुंथा है।अपने चिंतन में बुद्ध मात्र मनुष्य और उसके भोगे जा रहे दुखों को रखते हैं। जैसा चिंतन हम और वे 19-20 वीं शताब्दियों की चिंतन प्रणाली अस्तित्ववादी धारा में देखते हैं।बुद्ध अपनी छवि की चिंता किये बिना उन प्रश्नों पर चुप रहते हैं जिनके उत्तर नितान्त निजी अनुभव पर निर्भर हैं,जबकि हम मनुज जब कुछ नहीं जानते तब भी कितना बोलते हैं! कितना अभिमान करते हैं कुछ जानने का!  बुद्ध,जिन्होंने मन और उसकी वृत्तियों का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किया है जिसे सामान्य अवस्था में हम मनुष्य पहचानने में चूक जाते हैं जबकि वे हमारे ही मन की वृत्तियाँ होती हैं। हम बुद्ध को किसी देश-काल में नकार नहीं सकते।जैसे-जैसे हम वैचारिक और आनुभाविक यात्रा पर आगे बढ़ते हैं।जैसे-जैसे हम चिंतन के पथ पर आगे बढ़ते हैं,हमारा दुख तो गहन होता जाता है और हमें पता चलता है कि मुक्ति का ...

विश्व पुस्तक दिवस...

वर्जिनिया वुल्फ की लिखित एक पुस्तक है--जिसका हिन्दी अनुवाद "अपना एक कमरा"नाम से हुआ है। मैं जब बीते दिनों की ओर पलट कर देखती हूँ तो सदैव से घर में मेरा एक कोना रहा है,जिसपर मेरा एकाधिकार था और किसी को भी बिना मेरे पूछे उस कोने में प्रवेश की सख्त मनाही थी।वह कोना भरा था मेरी पुस्तकों से।उस कोने से प्रेम इस कदर था कि जरा सा कोने में स्थित आलमारी(दिवाल में बनी हुई) पर बिछे समाचार पत्र भी अगर मुड़े होते थे तो मुझे पता चल जाता था और मैं एकदम गुस्से में तमतमाते हुए पूछती थी कि किसने छुआ इस आलमारी को? तब माँ एकदम गंभीर होकर और इस चिंता में कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई उससे,कहती थी कि 'मैने केवल यह फलां सामान रखा और कुछ नहीं छुआ'।चूंकि वह फलां सामान भी मेरे लिए ही होता था इसलिए तब मैं संतोष की सांस भरती कि यह कोना एकदम सुरक्षित है।  पुस्तकों और उससे प्रेम के अनेकों किस्से हैं जीवन से जुड़े।उन किस्सों को लेकर एक पुस्तक की रचना तो हो ही सकती है।नहीं!यह इसलिए नही कि मैं ऐसा अपनी प्रशंसा में कह रही हूँ,बल्कि ऐसा इसलिए कि उन किस्सों को केन्द्र में रखकर जीवन के,रिश्तों के,मानवी...

दुर्गाष्टमी एवं रामनवमी...

  दुर्गाष्टमी एवं रामनवमी पर बीते दिन की स्मृतियों में प्रवेश!मानो स्व से स्व की वह यात्रा,जिसपर हम एक साथ जाना भी चाहते हैं और नहीं भी जाना चाहते। कारण कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं,अपने-अपने दुखों,अपने-अपने सुखों के साथ अकेले रह जाते हैं।सुख यह की माँ-पिता की अधूरी इच्छाएं स्वयं के जीवन में यथार्थ बन उतरीं।उन अधूरी इच्छाओं ने जीवन में कुछ करने के लिए शक्ति और प्रेरणा पूरी दी।दुख यह कि उन इच्छाओं के पूरे होने के बाद भी हम अपने जीवन में अधूरे रह जाते हैं।  बहरहाल…  दुर्गाष्टमी है आज!अभी सांझ को जब गली-मोहल्ले में आज रात्रि को होने वाली पूजा के निमित्त हो रही तैयारियों की मां के बजने वाले गीतों के माध्यम से सुना तो स्मरण हो आया कि माँ अष्टमी की पूजा के लिए कई दिनों पहले से ही तैयारियों में जुट जाती थी।उस कमरे की जिसमें पूजा होना होता था,उसकी साफ-सफाई अष्टमी की सुबह से ही आरंभ हो जाती थी।मुझपर विशेष दृष्टि मां की रहती थी कि मैं कहीं कुछ गड़बड़ न करूँ।  कमरा जो साफ-सफाई से या सच में मानो माँ आज रात्रि आने वाली हों,इस सोच से कमरा एक अनोखे सुगंध से सुगंधित और तेज से ...

कैसी हो?,कैसी हैं?...

  कैसे हो?कैसी हैं?... दुनिया के कठिनतम प्रश्नों में से एक यह प्रश्न प्रतीत होता है मुझे।गणित के सवालों से भी कठिन,जिससे पीछा छुटने का मैं स्वप्न देखती रहती थी।किन्तु यह प्रश्न तो औपचारिकता/अनौपचारिकता में लगभग हर दिन ही कोई न कोई पूछ लेता है।इसके घेरे से बजाय छूटने के कभी कभी किसी एक दिन में दो -चार बार इस प्रश्न को हल करने पड़ते हैं।  सच कहूं तो क्षणभर के लिए मैं सोच में पड़ जाती हूँ कि क्या उत्तर दूं?किन्तु उत्तर तो कुछ न कुछ देना ही पड़ता है क्योंकि पूछने वाला अक्सर ही जल्दी में रहता है,उसके पास इतना समय भी नहीं कि मेरे उत्तर देने के अंतराल भर के समय में रूक सके और नहीं उत्तर मिला तो अगले को लगेगा मैं अत्यंत रूखे स्वभाव की हूँ या कि संभवतः पागल/मूडी हूँ या कान से कुछ सुनाई कम देता हो!  यूँ तो अगला क्या कहता या सोचता है मेरे विषय में,यह बहुधा मेरी चिंता का विषय नहीं होता।मुझे वास्तव में यह प्रश्न बड़ा बेहूदा लगता है।कठिन तो है ही!बहरहाल,  कठिन इसलिए कि वो जो मेरी सलामती चाहते हैं,मेरे प्रसन्न-स्वस्थ रहने की प्रार्थना-कामना करते हैं,उनसे कैसे कहूँ कि पता नहीं,कैसी ...