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दिसम्बर...

 

( चित्र छत्तीसगढ़ बिलासपुर के गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय से;जहाँ पिछले दिनों कुछ समय बिताने का अवसर मिला; यूँ तो कार्य की व्यस्तता के चलते विश्वविद्यालय परिसर ठीक से घूमना तो संभव न हो सका लेकिन कुछ जगहें बस एक नज़र भर की प्रतीक्षा में होती हैं जो दिल चुरा लेती हैं, जैसे परिसर स्थित यह झील जिसके किनारे सूरज डूब रहा था और इसी के साथ डूब रहे थें बहुतों के दिल भी♥) 

एक शे़र सुना था कहीं,'कितने दिलों को तोड़ती है फरवरी!यूँ ही नहीं किसी ने इसके दिन घटाए हैं'!शे़र जिसका भी हो,बात बिलकुल दुरूस्त है।ह्रदय जैसे नाजुक,कोमल,निश्छल अंग को तोड़ने वाले को सजा मिलनी ही चाहिए,चाहे मनुष्य हो या मौसम। 

तब ध्यान में आता है दिसम्बर!दिसम्बर जब पूरे वर्ष भर का लेखा-जोखा करना होता है लेकिन दिसम्बर में कुछ ठहरता कहाँ है?दिनों को पंख लग जाते हैं,सूरज के मार्तण्ड रूप को नज़र!सांझे बेवजह उदासी के दुशाले ओढ़ तेजी से निकलती हैं जाने कहाँ के लिए!जाने कौन उसकी प्रतीक्षा में रहता है कि ठीक से अलविदा भी नहीं कह पाता दुपहरिया उसे!जबकि लौटना उसे खाली हाथ ही होता है!वह सुन भी नहीं पाती जाने किसकी पुकार ने उसे व्याकुल किया होता है! 

यूँ तो दिसम्बर के पास तीस दिनों के अतिरिक्त एक और दिन मिला है किंतु मैं सोचती हूँ यह उसके ह्रदय को और उचाट ही करता होगा!यह अन्याय ही होता है उसके साथ जबकि वह तो गुजर जाने की कितनी जल्दी में रहता है।वैसे भी सबकुछ तो बीत गया है,अब बीते हुए को बीतते देखना भर है,जाने वाला जा चुका है,अब बस हाथ छुड़ाना बाकी है। 

फरवरी ने दिल तोड़ें,फरवरी को सजा मिली उसके दिन कम हुए।किंतु फरवरी में जिसके दिल टूटे, ह्रदय पर पड़े उस चोट का दर्द मानो उभरता है दिसम्बर में!वह गुलमोहर का प्यार अमलतास,वह पीतवर्ण बसंत का; सब झड़े थे जो पतझड़ में;एक नील उभर आया था ह्रदय पर,पीठ पर,समंदर पर,आसमान पर,ब्रह्मांड पर! उस नील पड़े चोट पर दिसम्बर अब जाकर सफेद चादर डालने आया है,जबकि संबधों की उष्मा तो कब का समाप्त हो चुकी थी! 

पर्दा कब का गिर चुका था,खेल कब का समाप्त हो चुका था।फिर दिसम्बर तुमने आने में इतनी देरी क्योंकर की?दिसम्बर तुम भी क्यों न 28 या 29 के हुए? जबकि तुम्हारे तो दिनों के पर तो कतरे ही जा चुके थे! सांझ में कोरस में दूर उन सियारों की आवाज जिन्होंने तुम्हारे पर कतरे,मन को बोझिल किये ही हुए थीं! फिर तुम क्यों एक दिन और रूक गये? 

दिसम्बर शायद प्रेम की आखिरी रस्म 'विदा' को ठीक से कहे जाने के लिए,विदा को ठीक से सुने जाने के लिए कसमसाकर एक दिन और ठहर गया होगा;किंतु अभागे केवल वे ही नहीं है जिनकी कोई प्रतीक्षा नहीं करता:अभागे वे भी हैं जिनको प्रेम के बदले एक ठीक से विदाई नहीं मिली!और समय है कि बेमुरव्वत हो दिसम्बर की सब पीडाओं का हिसाब किये बिना उसे अपनी देह से यूँ उतार फेंकता है जैसे उतारकर फेंक दिया जाता हैं दीवाल पर टंगा पिछले बरस का कैलेंडर! 

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