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पुल से गुजरते समय...

समक्ष माँ गंगा स्थिरता का भ्रम रचती हुई प्रवाहित हो रहीं हैं।सामने घाट से राजघाट तक जगमग करते घाटों की सर्पीली श्रृंखला है।पर ये सब देखते हुए मैने इन्हें नहीं देखा,बल्कि देखा एक किनारे आसमान छूती हुई एक फ्लैट गर्व से तनी हुई थी जिसकी खिड़कियों से रौशनी छन-छन कर गिर रही थी।जिसे देखते हुए तुम याद आए और तुम्हें याद करते हुए  वही अनुत्तरित प्रश्न स्वयं से पूछा कि जैसे इतनी दूर से इन खिड़कियों को देखते हुए उनमें मैं तुम्हें ढूंढ रहीं हूँ,क्या तुम भी अपने घर की खिड़की से झांकते,बाहर चलते हुए लोगों में मुझे ढूंढते होगे! हेडफोन में गाना बज रहा था–'मैंने तुझे देखा.... इसमें एक लाइन है 'मैंने तुझे देखा इश्क के मलालों  में',मैं अब तुम्हें वहीं देखती हूँ।और तुम भी मुझे देख रहे होगे अपने किसी कर्म की सजा में।  इस दुख में पुल की रेलिंग पर हाथ धर ह्रदय को टेक देना चाहा तो पुल की धड़कनें सुनाई दीं।वही पुल जिसपर खड़ी हूँ।न जाने पुल बनाने वालों में से किसकी ह्रदय की धड़कने पुल में समा गईं कि छूट गईं,क्या मालूम!उन धड़कनों को अनसुना कर आगे बढ़ना था क्योंकि यही नियम है इस बेढ़ब-बेगढ़ संसार का...

बुद्ध पूर्णिमा...

मैं बुद्ध के बताये दुखमय संसार की एक दुख मात्र हूँ…  दर्शन जगत् में बुद्ध का होना दर्शन जगत् की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।एक ऐसी उपलब्धि जिसपर दर्शन-जगत् जीवनपर्यंत अभिमान कर सकता है।क्योंकि उनके दार्शनिक उपदेशों में अथवा वचनों में मनोविज्ञान गहरे गुंथा है।अपने चिंतन में बुद्ध मात्र मनुष्य और उसके भोगे जा रहे दुखों को रखते हैं। जैसा चिंतन हम और वे 19-20 वीं शताब्दियों की चिंतन प्रणाली अस्तित्ववादी धारा में देखते हैं।बुद्ध अपनी छवि की चिंता किये बिना उन प्रश्नों पर चुप रहते हैं जिनके उत्तर नितान्त निजी अनुभव पर निर्भर हैं,जबकि हम मनुज जब कुछ नहीं जानते तब भी कितना बोलते हैं! कितना अभिमान करते हैं कुछ जानने का!  बुद्ध,जिन्होंने मन और उसकी वृत्तियों का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किया है जिसे सामान्य अवस्था में हम मनुष्य पहचानने में चूक जाते हैं जबकि वे हमारे ही मन की वृत्तियाँ होती हैं। हम बुद्ध को किसी देश-काल में नकार नहीं सकते।जैसे-जैसे हम वैचारिक और आनुभाविक यात्रा पर आगे बढ़ते हैं।जैसे-जैसे हम चिंतन के पथ पर आगे बढ़ते हैं,हमारा दुख तो गहन होता जाता है और हमें पता चलता है कि मुक्ति का ...

विश्व पुस्तक दिवस...

वर्जिनिया वुल्फ की लिखित एक पुस्तक है--जिसका हिन्दी अनुवाद "अपना एक कमरा"नाम से हुआ है। मैं जब बीते दिनों की ओर पलट कर देखती हूँ तो सदैव से घर में मेरा एक कोना रहा है,जिसपर मेरा एकाधिकार था और किसी को भी बिना मेरे पूछे उस कोने में प्रवेश की सख्त मनाही थी।वह कोना भरा था मेरी पुस्तकों से।उस कोने से प्रेम इस कदर था कि जरा सा कोने में स्थित आलमारी(दिवाल में बनी हुई) पर बिछे समाचार पत्र भी अगर मुड़े होते थे तो मुझे पता चल जाता था और मैं एकदम गुस्से में तमतमाते हुए पूछती थी कि किसने छुआ इस आलमारी को? तब माँ एकदम गंभीर होकर और इस चिंता में कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई उससे,कहती थी कि 'मैने केवल यह फलां सामान रखा और कुछ नहीं छुआ'।चूंकि वह फलां सामान भी मेरे लिए ही होता था इसलिए तब मैं संतोष की सांस भरती कि यह कोना एकदम सुरक्षित है।  पुस्तकों और उससे प्रेम के अनेकों किस्से हैं जीवन से जुड़े।उन किस्सों को लेकर एक पुस्तक की रचना तो हो ही सकती है।नहीं!यह इसलिए नही कि मैं ऐसा अपनी प्रशंसा में कह रही हूँ,बल्कि ऐसा इसलिए कि उन किस्सों को केन्द्र में रखकर जीवन के,रिश्तों के,मानवी...

दुर्गाष्टमी एवं रामनवमी...

  दुर्गाष्टमी एवं रामनवमी पर बीते दिन की स्मृतियों में प्रवेश!मानो स्व से स्व की वह यात्रा,जिसपर हम एक साथ जाना भी चाहते हैं और नहीं भी जाना चाहते। कारण कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं,अपने-अपने दुखों,अपने-अपने सुखों के साथ अकेले रह जाते हैं।सुख यह की माँ-पिता की अधूरी इच्छाएं स्वयं के जीवन में यथार्थ बन उतरीं।उन अधूरी इच्छाओं ने जीवन में कुछ करने के लिए शक्ति और प्रेरणा पूरी दी।दुख यह कि उन इच्छाओं के पूरे होने के बाद भी हम अपने जीवन में अधूरे रह जाते हैं।  बहरहाल…  दुर्गाष्टमी है आज!अभी सांझ को जब गली-मोहल्ले में आज रात्रि को होने वाली पूजा के निमित्त हो रही तैयारियों की मां के बजने वाले गीतों के माध्यम से सुना तो स्मरण हो आया कि माँ अष्टमी की पूजा के लिए कई दिनों पहले से ही तैयारियों में जुट जाती थी।उस कमरे की जिसमें पूजा होना होता था,उसकी साफ-सफाई अष्टमी की सुबह से ही आरंभ हो जाती थी।मुझपर विशेष दृष्टि मां की रहती थी कि मैं कहीं कुछ गड़बड़ न करूँ।  कमरा जो साफ-सफाई से या सच में मानो माँ आज रात्रि आने वाली हों,इस सोच से कमरा एक अनोखे सुगंध से सुगंधित और तेज से ...

कैसी हो?,कैसी हैं?...

  कैसे हो?कैसी हैं?... दुनिया के कठिनतम प्रश्नों में से एक यह प्रश्न प्रतीत होता है मुझे।गणित के सवालों से भी कठिन,जिससे पीछा छुटने का मैं स्वप्न देखती रहती थी।किन्तु यह प्रश्न तो औपचारिकता/अनौपचारिकता में लगभग हर दिन ही कोई न कोई पूछ लेता है।इसके घेरे से बजाय छूटने के कभी कभी किसी एक दिन में दो -चार बार इस प्रश्न को हल करने पड़ते हैं।  सच कहूं तो क्षणभर के लिए मैं सोच में पड़ जाती हूँ कि क्या उत्तर दूं?किन्तु उत्तर तो कुछ न कुछ देना ही पड़ता है क्योंकि पूछने वाला अक्सर ही जल्दी में रहता है,उसके पास इतना समय भी नहीं कि मेरे उत्तर देने के अंतराल भर के समय में रूक सके और नहीं उत्तर मिला तो अगले को लगेगा मैं अत्यंत रूखे स्वभाव की हूँ या कि संभवतः पागल/मूडी हूँ या कान से कुछ सुनाई कम देता हो!  यूँ तो अगला क्या कहता या सोचता है मेरे विषय में,यह बहुधा मेरी चिंता का विषय नहीं होता।मुझे वास्तव में यह प्रश्न बड़ा बेहूदा लगता है।कठिन तो है ही!बहरहाल,  कठिन इसलिए कि वो जो मेरी सलामती चाहते हैं,मेरे प्रसन्न-स्वस्थ रहने की प्रार्थना-कामना करते हैं,उनसे कैसे कहूँ कि पता नहीं,कैसी ...

बिहार दिवस

 #बिहार_दिवस सुबह से विचार बन रहा था आज के दिन कुछ लिखने का।बल्कि कहें तो रात्रि से ही,जब प्रिय आशुतोष का स्टेटस देखा।किन्तु मेरे साथ बड़ी समस्या है कि लिखने-बोलने-पढ़ने और अपने अंतर्मन में भेद न करना।जिसके साथ कभी-कभी यह विसंगति उत्पन्न हो जाती है कि मेरा पूरा प्रयास यथार्थ लिखना होता है किन्तु अन्यों को वह निराशावादी दृष्टिकोण प्रतीत होता है।यद्यपि यह विवृत प्रतीति माया का प्रिय खेल है,अतः इसकी क्या चिंता।किन्तु आज पुनः-पुनः लिखने का सोचकर भी रूक जा रही थी अपने एक प्रिय शिष्य को सोचकर।संभवतः मैं आज कुछ यथार्थवादी लिखने में अपने उस शिष्य से भय खाकर मुस्कुरा कर लिखना उपेक्षित कर रही थी।किन्तु जैसा कि विदित है कि मेरी बुद्धि जागृत होती है रात्रि के दूसरे पहर में।तब चेतना में यह विचार कौंधा कि यथार्थ के पथरीले मार्ग पर पांवों के मध्य आने वाले कांटे को चुन-चुनकर मार्ग को सुगम करना,उनपर आत्मविश्वास के फूलों को रोपना,एक शिक्षक का यह भी तो कर्तव्य है; कि जब कभी कोई भयभीत हो तो वह रूककर कुछ देर आराम कर सके,भटका हो जो तो विश्वास प्राप्त कर सके।और फिर लिखने की कुछ इच्छा मेरी भी थी।...

सालों बाद...

          बस तस्वीरों ने बचा रखा है जीने का कुछ सामान  सालों बाद खूब-खूब रोने का दिल कर रहा है फिर तुम्हें याद कर के।वही तड़प,वही कलपना-रोना याद आ रहा है और दिल में हूक सी उठ रही है कि तुमको फिर से पाने की अपनी कोशिशें मैने बंद क्यों कर दीं!दुख को पीते-पीते सालों बाद आज न जाने क्यों फिर से इच्छा जग रही है कि तुम्हें संदेशे भेजकर,फोन पर फोन कर के,तुम्हारे घर की चौखट पर खड़े होकर तुमसे मिन्नतें करूँ और बताऊँ कि सबकुछ ठीक नहीं हो गया है।मैं आदी नहीं हो पाई हूँ जीने की तुम्हारे बिना।मुझे नहीं पता दिन कैसे खिसकता है।रात कैसे गुजरती है।इसका हिसाब नही कि मैंने तुम्हारे बिना क्या खोया है।कुछ पाया भी या नहीं इतने दिन तुमसे बिछड़ के।ये भी बता दूँ कि कोशिशें भी लाख कीं कि कोई तो मिले जो तुम्हारी जगह भर दे।पर तबियत किसी से मिलती ही नहीं।एक लंबा अरसा हो गया है एक स्पर्श नहीं मिला जिसमें तुम्हारे जैसा जादू हो कि सब दर्द झट से उड़ जाए!मेरे सब दुखों के आंसू सूख चुके हैं किन्तु न जाने क्यों तुम्हारी प्रतीक्षा में अब तक बेदम से मेरे अंदर पड़े हैं।और मुझे तो एक लंबा अरसा हो ग...

एक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम से लौटने के उपरांत...

फरवरी के एक व्यस्त किन्तु मीठे दिन की छवि पुनश्चर्या पाठ्यक्रम से...  एक अतिव्यस्त पाठ्यक्रम के सफलतापूर्वक समापन के उपरांत जब घड़ी देखी तो 5:30 हो रहा था,उदासी बड़े मोहब्बत से मेज के पास खड़ी थी अपने बांहों के घेरे में लेने के लिए।मुझे भी लगा कि एहसास तो कर लूँ शिद्दत से कि पिछले 15 दिनों से जिनका साथ था,उनसे अब कल से भेंट नहीं होगी। तो लैपटॉप खुले ही छोड़ दिया और स्वागत किया उदासी का कि हम पन्द्रह दिनों बाद फुरसत से मिले थें। यह उदासी तब और बढ़ गई जब याद आया कि पिछले पन्द्रह दिनों से मेरे घर में चीनी की खपत कुछ कम हो गई थी किसी की मीठी बोली ने इतनी मिठास घोली थी मेरे कमरे में।किसी ने मातृत्व का ऐसा घेरा बनाया था कि इस अहसास ने मन को मनभर भारी कर दिया है कि कल से अब इस घेरे से मैं स्वतंत्र रहूंगी,जबकि चाहत ऐसी नहीं है।दिल में रह-रहकर यह बात आ रही थी कि एक दौड़ लगाऊँ और पहुँच जाऊँ बहनों के पास,भाभी के पास।  जब हम किसी भी प्रकार के आयोजन में भाग लेते हैं तो उसकी सफलता के मानक क्या होने चाहिए?एक प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेना! कुछ प्रशंसा सुन लेना!थोड़ी अपनी टूटी- फूटी,तुतलाती सी भा...

आत्मसंलाप...

  छायाचित्र देवभूमि के मुक्तेश्वर से;जो सम्भवतः मुक्त करे आत्मसंलाप से। पिता को समर्पित अर्घ नहीं पहुँच रहे हैं उन तक ! उसे अधर में ही रोक लिया है उनकी वेदनाओं के आर्तनाद ने… माँ के कपकपाते हाथों ने तो नहीं पर मेरी ही नियत ने अवरुद्ध कर दिया है मेरे शुभ कर्मों के प्रभावों को,जिसको मैं जब- तब दंभ में चूर हो,प्रयोग में लाती थी अपने हर कर्म के बचाव में… जवानी के दिनों में मेरी समस्त चेतना को कैद कर लिया था कभी न पूरी होने वाली वासनाओं और बजबजाते इच्छाओं के रंगमहल ने… और अब मार की सेनाएं पृथ्वी पर वापस भेज रही हैं,स्वर्ग के देवताओं को सम्बोधित मेरी समस्त प्रार्थनाएँ… अकेलेपन से भयभीत मेरी प्रार्थनाएं अब नहीं पहुंचेंगी पितरों के लोक तक,जानती हूँ लिखे जाने वाले शब्द व्योम में घूमते रहेंगे अनंत तक, और अर्थ समा जाएंगे “कृष्ण विवर” में… प्रेम में पगे भाव बीन बीन कर खा रहे हैं पीठ पर छुरा घोंपने वालों के पात्र से गिरी झूठन … ब्रूटसों की भूख की हूक से कम्पित हैं देवालय , सीजर की चीख से भयभीत हैं देवदूत,खण्डित हो गई हैं मूर्तियां अश्विनीकुमारों की… कर्ण हैं आश्चर्य में,क्या मैंने इसी धरा पर जन...

बिरजू महाराज...

स्त्री एवं पुरूष,कितने अलग,कितने भिन्न...किंतु जिस व्यक्तित्व में आकर यह अंतर मिट जाता है,वह हैं कथक सम्राट बिरजू महाराज। अपने बाबा के अनेक रूपों में से हमने एक नाम सुना है,अर्धनारीश्वर का।पंडित जी मानो उसी रूप को प्रकट करने हेतु धरा पर आए थें।  यदि किसी स्त्री को अपने देह की चपलता-लयात्मकता पर अभिमान हो,किसी पुरुष को अपने देह सौष्ठव पर अभिमान हो तो पंडित जी को देखने मात्र से उसका यह अभिमान मिट जाता है।उनके पद-चाप और पैर में बँधे घुँघुरूओं की आवाज एक अलग ही लोक का सृजन करती हुईं सी प्रतीत होती हैं।घुंघरूओं के झनकार से भला क्या बादल गरजते हैं!कि बिजली कड़कती है!कि कन्हैया के लिए जशोदा मैय्या पुड़ी-खीर बनाती है और कड़ाही में पुड़ी छनने की आवाजें आती हैं घुंघरूओं के झनकने से!जीवन का यह महाआनंद है कि मैं इसका उत्तर दूं,हाँ। हम साधारण मनुष्यों के भाग्य में ऐसे दिन भी आए थे जब घुंघरूओं के बजने मात्र से यह सब होता था जबकि आसमान साफ और स्वच्छ था उसदिन।और कन्हैया तो द्वापरयुग में थे जबकि हम कलियुग में ऐसा सुन रहे थे और संगीत के माध्यम से अपने कन्हैया को बड़े चाव से पुड़ी-खीर खाते देखते हैं।...

नवंबर... 💙

नवंबर इतना नाजुक,जैसे रूई का फाहा।इतना उदास,जैसे बचपन में बड़ी बहनों के ससुराल जाने के पहले की छाई उदासी।नवंबर इतना अनमना जैसे घर से दूर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने से पहले की जाने वाली तैयारी का अनमनापन। नवंबर,इतना नाजुक कि छू भर ले कोई तो गल जाए।पूछ ले कोई कि कैसे हो तो बिखर जाए।कसकर बांहों में भर ले तो टूट ही जाए। नवंबर कि जब जाने वाले को रोकने के तमाम प्रयास करते हुए भी मन में खटका रहता है कि अब वो नहीं रूकेगा।नवंबर चोट लगने पर दर्द के उभरने से ठीक पहले की शून्यता जैसे।                      नवंबर विदा का चोट हो मानो जिसका दर्द उभरता है दिसम्बर में।नवंबर का रंग स्याह नील जैसा जो दिसम्बर की सफेदी में बदल जाता है कि जो कुछ भी अब तक जिया,उसे ढंक देने के लिए।  नवंबर मेरे ह्रदय जितना खाली कि इस खालीपन में ईश्वर घर करने लगता है ...

द्वैत जीवन का अभिशाप...

  ⚫ मेरे मस्तिष्क में इतिहास की विसंगतियां चोट करती रहतीं हैं किन्तु दिल में आता है वर्जीनिया वुल्फ के जैसे एक छलांग लगाने की...  ⚫ बाहर 'शंकर' की तरह धर्मध्वजा उठाए हुए हूँ तो घर में काफ्का की तरह एक कीड़े में बदल जाती हूँ…  ⚫ घर से बाहर साहसी महिला हूँ लेकिन घर में ठीक उलट घबराई-डरी हुई...  ⚫ कार्यस्थल पर गधों की तरह खटती हूँ जिसका कोई हासिल नहीं लेकिन घर पर इतनी आलसी कि कोई अवार्ड हो आलसियों का तो प्रथम तीन में कोई स्थान पा जाऊँ...  ⚫ अपने- पराए सबके लिए अत्यंत क्रोधी/खड़ूस लेकिन मेरे कमरे में एक समंदर समानांतर बहता रहता है ⚫  राष्ट्रवादियों की आंखों में खटकती हूँ और वामपंथियों की नजर में घोर दक्षिणपंथी...  ⚫  नास्तिकों के बीच अत्यंत धार्मिक और धार्मिकों के बीच तार्किक अनीश्वरवादी...  ⚫  मित्रमंडली में बेफिक्र, अपने काम से काम रखने वाली लेकिन रात्रि के तिमिर में जीवन की अव्यवस्था पर विचार करती दार्शनिक...  ⚫  दिन में बोझल आंखो को ढोती हुई और रात्रि में जागती आंखो से जीवन की यातना भोगते हुए... ⚫ चाहत यही कि अपने बच्चों के साथ...

आशुतोष के लिए...

  एक नदी थी पहाड़ों की, उसे पार किया तो देखा अनेकों परछाईयाँ पीछे पीछे आ रहीं हैं, न जाने मेरी धीमी चाल से या मेरे पैरों में धंसे कीलों को सीढी़ समझकर एक-एक परछाईयों ने मेरी आत्मा में घुसपैठ की,अर्थों के गद्दारों का साथ लेकर। बेचारे शब्द! ओह! जिनके चिथड़े रह-रहकर हवा में उड़ जाते परछाईयों की यह बात सुनकर,जो वे मुझसे कहते कि हम तुम्हारी आत्मा में धंसी कीलों को निकाल देंगे... कील को और गहरे धंसा वे एक-एक कर मुझसे होकर गुजर जाती थीं, मैं देखती नहीं थी उनमे से किसी की हैसियत, उनके कपड़े, उनके चेहरे, उनकी आंखें, जहाँ शील का पानी अपनी आखिरी सांसे गिनता था। किन्तु उनके शब्द के राज सुलझाते-सुलझाते नाखूनों का एक पूरा जंगल मेरी देह पर उग आता जबकि पुराने मेरे घाव नहीं भरते थे...  किन्तु अनजान अजगर मुझको पूरी तरह निगल जाए, इससे पहले उस आदिम अभिनिवेश के कारण मैने अपनी आत्मा के एक उजले टुकड़े पर विदा का रन्दा चलाया कि नदी पार के फूहड़ता और अव्यवस्थित रसोईघर में एक कोना साफ-सुथरा मिल सके।जैसे किराये के उस घर में एक चौकी और आलमारी पर मेरी पुस्तकें मुस्कुराती रहतीं थीं हर हाल में... और मैं वहा...

शरद पूर्णिमा…

  शरदपूर्णिमा…. हमारे उल्लास का दिन…… हमारी दोस्ती के जश्न में डूबे अनेक दिनों में से एक नायाब दिन………. जब अनजाने ही कांधे पर ओढ़ ली गई उत्तरदायित्वों ने अपने आत्मीय नगर को छोड़ने पर मजबूर किया, तब कभी आज के दिन हम दूर थे पर आत्मिक रूप से उतने ही समीप, जितना दो दोस्तों को अपनी पूरी सच्चाई और निष्ठा के साथ होना चाहिए था, पर ठीक उसके पिछले बरस देश की राजधानी से हमने चांद को निहारते हुऐ पूरे हर्षोल्लास से इस दिन को जिया था, क्योंकि हमदोनों को चांद से बहुत प्यार था, प्रकृति से बहुत प्यार था।और तुम बहुत खुश थी कि कैसे एक मंझे हुए कलाकार की भांति मैं झूठ बोलकर तुमसे मिलने आई थी।अब तुम्हारे बाद कोई नहीं जान पायेगा कि एक लेडी इरफान खान और मनोज वाजपेयी मेरे अंदर भी था पर अब मेरे अंदर होने वाले अनेक बेमौतों में मेरे अंदर का कलाकार भी मर गया… तुमने बताया था कैसे अपने प्यार के शुरूआती दिनों में तुम अपने साथी संग छत पर एक साथ चांद निहारते थे और भौतिक दूरी को भी धता बताते उतने ही समीप होते थे जितने आत्मिक रूप से दो प्रेमियों को होना चाहिए।ओह!चांद तुम कितने सामर्थ्यवान हो!!! अब जबकि मैने अपना प्रिय ...

सूरज...

   सूरज जब थोड़े पास से गुजरा था, अपनी आग से डरा रहा था, मैने भी बिना देर किये खोलकर दिखा दिए सैकड़ों सूरज, जो रखे थे मेरे पर्स में।   'देखो, मेरे पर्स में पड़े हैं कितने सूरज!क्षोभ और अपमान का सूरज,पीडा़ और विषाद का सूरज,पीठ पर खाए चोट सूरज बन आ गए पर्स में, ह्रदय पर लगा घात धर सूरज का रुप रखें हैं पर्स में! बिछुड़ने वाले को ठीक से विदा न कर पाने का मलाल का सूरज-असमय हाथ छुड़ा लेने की वेदना का सूरज,मृत्यु और रोग के भय का सूरज! ऐसे जाने कितने सूरज पड़े हैं पर्स में इस जनम से या जाने कितने जनमों से।  और एक आखिरी, आग उगलती कलम का सूरज!जिसका कोई खरीदार, कोई प्रकाशक, कोई पढ़वइया नहीं।  अपने अंतिम दिनों में जब बुझने लगेगी तुम्हारी आग,ले जाना होगा तो ले जाना एकाध सूरज, पड़े हैं जो मेरे पर्स में।'

कछुआ...

  जन्म जन्मान्तर के कुचक्र में यदि समस्त प्राणियों का जीवन फंसा होगा तो कछुआ पिछले जनम में कोई मनुष्य रहा होगा जिसने अपने पीठ पर बडे़ घाव लिए होंगे! संभवतः ईश्वर घाटे में चल रहे अपने प्रेम और वफा के गोदाम का कर्ता-धर्ता कछुए के जिम्मे सौंप,चैन से सोने चले गए होंगे अपने धाम!  अ पने कोमल देह पर कठोर पीठ को लादे कछुआ कदाचित् यही बताना चाहता होगा कि कोमल ह्रदय वाले को अपनी पीठ कठोर ही बनानी पड़ेगी...  ...तभी दिल की तबियत ठीक रहेगी और पीठ भी छिलेगी नहीं।पीठ पर लगा कोई घाव आत्मा को दुखाएगा तो किन्तु वहाँ न भरने वाला नासूर नहीं बना पाएगा। दरअसल पीठ पर घोंपे गये प्रेम और मित्रता रूपी चाकू की नोंक ह्रदय से होते हुए आत्मा को गहरे घायल कर देती है…            यदि जन्म जन्मान्तर का खेल है अस्तित्व,तो मुक्ति भी होगी और तब प्रेम और मित्रता की चोट से मुक्त आत्मा मुक्त भी हो जाएगी।क्योंकि प्रेम और वफा से घायल आत्मा की पता नहीं मुक्ति होती भी है या नहीं!  'सारे घाव पीठ सहेगा;सारे दुख ह्रदय उठाएगा और इस तरह आ...

ईश्वर...

  🟥.ईश्वर कोई चिड़ुकवा बुजुर्ग है जो अपने ही घर के बच्चों को हंसते-खेलते देखकर चिढ़न में उन्हें पीटता है और नाम देता है हमारे कर्मों को। 🟥. ईश्वर अपने घर की सबसे बडी सन्तान है जिसे जितना भी अधिकार और सम्मान दे दो, उसके अहंकार की तुष्टिकरण नही होती और इसका बदला वह अपने छोटे भाई बहनों से लेता है।कितना भी प्रेम कर लो,करेगा धूर्तता ही। 🟥. ईश्वर कोई बेहद खराब प्रशासक है जिसकी व्यवस्था चौपट है।वह अपना काम समय पर नहीं करता जिसके कारण हमारे करमों की फल-व्यवस्था में झोल ही झोल हो गया है। 🟥. ईश्वर किसी भ्रष्ट देश का आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा बडा़ बाबू है,जब तक उसे चढावा नहीं,तब तक सब कार्य पेंडिंग।उसके बाद भी काम होने की गारंटी नहीं। 🟥. ईश्वर कोई लाड़-प्यार में बिगडा़ बच्चा है,वह वही करेगा,जो उसे नहीं करना चाहिए। 🟥. ईश्वर घूस देकर सर्वोच्च पद पाया व्यक्ति है जिसकी उगाही वह हम मनुष्यों को दंड देकर करता है। 🟥. ईश्वर ऐसा शिष्य है कि उसकी हां में हां मिलाओ तो पांव पूजेगा,डांटो तो उसे गुरु के विचारों से ही समस्या होने लगती है जिन विचारों पर वह लहालोट था कभी। 🟥.ईश्वर झगडालू औरतों के ...

ईश्वर का दुर्व्यवहार या परममुर्खता…

  संसार में एक ही दुःख है-मित्रता । संसार में एक ही सुख है-मित्र न होना। ओशो ने कहा है “मित्रता प्रेम से भी ऊपर है “। इसलिए प्रेम का डंसा बच भी जाए,पर मित्रता से डंसा हुआ पानी भी नहीं मांग पाता,मर भी नहीं पाता। अपनी प्यास,अपना दुःख लिए वह भटकता रहता है प्रेत की तरह।उसको कोई नहीं सुनता क्यूंकि दुनिया मित्रता के नशे में है।बस पता नहीं है कौन किसको पहले डसेगा! अमैत्रेय ही है इस दुनिया का स्वरूप,अन्यथा क्यूँ आते बुद्ध मैत्रेय बनकर पुनः मित्रता सिखाने! शास्त्र कहता है “ओम मित्रेभ्य नमः” मैं कहती हूँ “ओम अमित्रेभ्य नमः” मेरा बस चले तो प्रत्येक मंत्र के बाद तीन के स्थान पर चार बार शांति कहूँ, चौथा मित्रता रूपी ताप की शांति के लिए। क्लोरोफार्म के आविष्कारक सिम्पसन के बारे में कहा जाता है कि वह आजीवन एक सच्चे मित्र की खोज में रहे और अन्ततोगत्वा एकाकी मरे। फिर भी निश्चयतः वे शांति से मरे होंगे। हर उस मित्र को जिसे हम देते हैं जितनी ज्यादा निजता, आत्मीयता, संवेदनात्मक संस्पर्श, उसे लौटाता है वह उस निजता को चौराहे पर नीलामी लगाकर, आत्मा का गला रेतकर, संवेदनात्मक संस्पर्श को वासना के कीचड़ में ...

माते...(15/08/2021)

माते... कुछ दुर्घटनाएं जीवन में ऐसी घटती हैं जिनपर समस्त विश्व के शब्दों को खर्च कर दिया जाए,फिर भी शब्द उन भावों को  छू भी नही सकते जो ह्रदय पर आरी की तरह वक्त हर क्षण चलाता है।जैसे तुम्हारा देह त्यागना।क्या सितम है कि विदा का वह क्षण मुझ पर बीता फिर भी मैं न रीत गई! समस्त आकाश को उसके सब उत्तरदायित्वों को छोड़कर अगर यह काम दे दिया जाए कि वह विदा के क्षण तुम्हारे होंठो पर आकर जो टिक गए थे,उन सब शब्दों को सुन सके,तो अनंत ब्रह्मांड के अनंत आकाश भी उसे न सुन सकेंगे। खैर छोड़ो!कहने-सुनने में क्या रखा है!!कहने वाला वही कहता,जो उसे कहना रहता है और सुनने वाला वही सुने जो उसे सुनना चाहिए तो दुनिया की खूबसूरती में बढ़ोत्तरी ही होती।किन्तु यह संसार तो मानो फंसा हुआ है यंत्रणाओं के एक बंद बोतल में।अब ढक्कन इस बोतल की खोले कौन?कोई ईश्वर कहीं नही है।वो अलग बात है मैं हर पल उसे नकारते हुए उसे ही ढूंढ रहीं हूँ। बहरहाल,  मैं फिर वेदना का सुर पकडूं,उससे अच्छा है हम-तुम अपना हाल सुनाते हैं। यद्यपि जानती हूं तुम कैसे अपना हाल कहोगी!मेरा कैसे सुनोगी!मेरे लिखे अनेक चिट्ठियों की तरह यह भी अनपह...