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द्वैत जीवन का अभिशाप...

 


⚫ मेरे मस्तिष्क में इतिहास की विसंगतियां चोट करती रहतीं हैं किन्तु दिल में आता है वर्जीनिया वुल्फ के जैसे एक छलांग लगाने की... 

⚫ बाहर 'शंकर' की तरह धर्मध्वजा उठाए हुए हूँ तो घर में काफ्का की तरह एक कीड़े में बदल जाती हूँ… 

⚫ घर से बाहर साहसी महिला हूँ लेकिन घर में ठीक उलट घबराई-डरी हुई... 

⚫ कार्यस्थल पर गधों की तरह खटती हूँ जिसका कोई हासिल नहीं लेकिन घर पर इतनी आलसी कि कोई अवार्ड हो आलसियों का तो प्रथम तीन में कोई स्थान पा जाऊँ... 

⚫ अपने- पराए सबके लिए अत्यंत क्रोधी/खड़ूस लेकिन मेरे कमरे में एक समंदर समानांतर बहता रहता है

⚫  राष्ट्रवादियों की आंखों में खटकती हूँ और वामपंथियों की नजर में घोर दक्षिणपंथी... 

⚫  नास्तिकों के बीच अत्यंत धार्मिक और धार्मिकों के बीच तार्किक अनीश्वरवादी... 

⚫  मित्रमंडली में बेफिक्र, अपने काम से काम रखने वाली लेकिन रात्रि के तिमिर में जीवन की अव्यवस्था पर विचार करती दार्शनिक... 

⚫  दिन में बोझल आंखो को ढोती हुई और रात्रि में जागती आंखो से जीवन की यातना भोगते हुए...

⚫ चाहत यही कि अपने बच्चों के साथ रहूँ लेकिन उन्हें गृहत्यागी बनने का उपदेश देती हूँ...

⚫ एक ही समय में मनाती हुई कि कभी बिछुड़े को देख सकूँ और साथ ही यह भी कि अब उससे कभी सामना न हो...



Comments

Unknown said…
🥺🙏wow!!
हे!भगवान...

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ए धरती माई!ए अकास देवता...

अबकी जब जाऊंगी गांव ... सबसे पहले जाऊंगी कुल देवी के दुआरे...लेटकर करूंगी पलग्गी,रोऊंगी दिल खोलकर वहीं लेटे -लेटे, अपने आंसुओं से जब बुझा लूंगी हिय की प्यास और कुल के देवी से कह दूंगी सारे दुख तब जाऊंगी बाबूजी के घर... घर जाने के रस्ते में पड़ती है वह नदी जिसके किनारे बैठकर बचपन में देखती थी सूरज को डूबते,बत्तखों को तैरते... मैं कहूंगी नदी से,किनारों से,मैं तैर न पाई और डूब गई माया में जबकि तुम्हारे किनारे बैठ देखा था बत्तखों के झूंड को तैरते हुए...ओ तटिनी !....रो पड़ूंगी अंजुरी में पानी भरते हुए कि मैं तो लौट आई थी,बचपन यहीं कहीं छूट गया है तुम्हारे किनारे..अब छूट गया तो संभाल कर रखना,अगले जनम लौटा देना ,यही बचपन,यही किनारा,यही गांव,वही अम्मा-बाबूजी... घर में जब प्रवेश करूंगी भाभी के सांझ बारने तक भटकती रहूंगी एक कमरे से दूसरे कमरे,ओसारे से रसोई तक लगाऊंगी दौड़...झांक झांककर लौट आया करूंगी अम्मा के हाथ का बना मिट्टी का चूल्हा... देखूंगी स्टील का बना कोठिला और याद करूंगी अम्मा के हाथों बने मिट्टी के कोठिला को...मिट्टी का कोठिला ढह गया...मिट्टी की देह भी ढह जाएगी...यही सोच -सोच थक कर धं...

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