Skip to main content

एक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम से लौटने के उपरांत...


फरवरी के एक व्यस्त किन्तु मीठे दिन की छवि पुनश्चर्या पाठ्यक्रम से... 


एक अतिव्यस्त पाठ्यक्रम के सफलतापूर्वक समापन के उपरांत जब घड़ी देखी तो 5:30 हो रहा था,उदासी बड़े मोहब्बत से मेज के पास खड़ी थी अपने बांहों के घेरे में लेने के लिए।मुझे भी लगा कि एहसास तो कर लूँ शिद्दत से कि पिछले 15 दिनों से जिनका साथ था,उनसे अब कल से भेंट नहीं होगी।तो लैपटॉप खुले ही छोड़ दिया और स्वागत किया उदासी का कि हम पन्द्रह दिनों बाद फुरसत से मिले थें।

यह उदासी तब और बढ़ गई जब याद आया कि पिछले पन्द्रह दिनों से मेरे घर में चीनी की खपत कुछ कम हो गई थी किसी की मीठी बोली ने इतनी मिठास घोली थी मेरे कमरे में।किसी ने मातृत्व का ऐसा घेरा बनाया था कि इस अहसास ने मन को मनभर भारी कर दिया है कि कल से अब इस घेरे से मैं स्वतंत्र रहूंगी,जबकि चाहत ऐसी नहीं है।दिल में रह-रहकर यह बात आ रही थी कि एक दौड़ लगाऊँ और पहुँच जाऊँ बहनों के पास,भाभी के पास। 

जब हम किसी भी प्रकार के आयोजन में भाग लेते हैं तो उसकी सफलता के मानक क्या होने चाहिए?एक प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेना! कुछ प्रशंसा सुन लेना!थोड़ी अपनी टूटी- फूटी,तुतलाती सी भाषा और भाव में स्व को व्यक्त कर लेना? 

किन्तु मेरे पास कुछ अलग मानक हैं कि स्व से भी भेंट हुई क्या इस यात्रा में?यदि स्व से भेंट होती रहती है तो अतिउत्तम।लेकिन क्या और गहरे उतरे स्व में?यदि निराशा के बादल छाए थे तो क्या वे कुछ छंटे!या आशावादी नींद में सोए थे अतिआत्मविश्वास की चादर ओढ़,तो क्या नींद खुली!क्या कुछ नये मित्र बने!कुछ नये ज्ञान के स्रोत मिले!कुछ नयी राह मिली चलने के लिए! 

           इसका उत्तर मैं अपने लिए हां में देकर शब्दों के जाल में स्वयं को नहीं पड़ने दूंगी।कर्म और तदनुरूप आचरण सबसे बेहतर उत्तर है कि हम जो किसी यात्रा को आरंभ करने के पहले थें,वही तो नहीं बने रह गयें यात्रा की समाप्ति पर! 

खैर,उदासी में रहने का अपना आनंद है लेकिन यह उदासी भोजन पकाकर नहीं देती इसलिए संध्या भोजन की व्यवस्था के लिए उठी और दरवाजे को खोलकर बाहर देखा तो घड़ी की सुई 6 बजा रही थी किन्तु अबतक बाहर फैले उजाले ने बड़ा तोष दिया मन को कि गर्मियों के दिन लौट रहें हैं... 

 

Comments

Popular posts from this blog

आत्म-समीक्षा के दिन...

 भारतीय दर्शन में या यूं कहें कि विश्व दर्शन में कुछ अवधारणाएं ऐसी हैं जिनपर दो पक्ष है किंतु अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। यदि ज्ञान का विस्तार करें तो विज्ञान भी इसमें सम्मिलित है। किंतु क्योंकि मैं दर्शन की विद्यार्थी हूं तो दर्शन पर अपनी बात केन्द्रित करती हूं।इन तमाम अवधारणाओं में है - आकाश,समय ,दिशा,कारण-कार्य,कर्मनियम, पुनर्जन्म इत्यादि। विसंगति यह है कि रोजमर्रा के अपने जीवन में मैं नितप्रति इन अवधारणाओं की संकरी गली से गुज़रती हूं। किंतु एक तो ज्ञान का प्रकाश कुछ मद्धम है मुझमें तो रोज़ ही डूबना-उतराना होता है। मैं जब इन प्रश्नों से निजात पाने की सोचकर वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करती हूं तो पाती हूं कि इस मल्टीमीडिया सेट जैसे समय में मैं तो बटन टिपने वाली मोबाइल जैसे हूं। दूसरे, शब्दों में कहें तो समयानुकूल नितांत अयोग्य हूं। मैं जो वर्तमान में हूं, यदि वह‌ नहीं होऊं तो मुझे और कुछ भी नहीं आता है।तब मैं पुनः घबरा कर अपने कमरे में पड़े किसी दार्शनिक अवधारणा को उठाती हूं और उसपर चिंतन करने का अभिनय करती हूं। किंतु यह अभिनय मुझे मुंह चिढ़ाता है कि ऐसा अभिनय...

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

बरेली

 वर्ष 2011 - 12 की बात है;तब संघर्ष के दिन अपने पूरे यौवन पर थें।उन्हीं दिनों में बहन के घर से (बहेड़ी) जो उन दिनों डेरा था मेरा, से कार्यस्थल (बरेली) तक (जिसकी दूरी करीब पैंतीस किमी थी) रोज़ आना-जाना होता था।यात्रा का साधन कभी बस और अधिकतर रेलगाड़ी होती थी बहेड़ी से बरेली तक की रेलगाड़ी की यात्रा में करीब छोटे-छोटे सात-आठ स्टेशन पड़ते थें।किंतु मुझे उनमें बस एक ही नाम स्मृति में रहा,इज्ज़तनगर। स्मरण रहे जाने के दो कारण थें -एक तो नाम में ही जिसके इज्ज़त हो,उसे न याद रखना एक तरह से विश्वासघात ही होता अपने अतीत से और दूसरे इस स्टेशन या कहें छोटे से स्थान का स्थानीय लोगों द्वारा उच्चारण।वे इसे ऐजेडनगर कहकर बुलाते।अब भी बुलाते हैं,नहीं पता।मैं घर आकर अक्सर इस बात की खीझ बहन के सामने उतारती कि अच्छे भले नाम को लोग क्यों बिगाड़ते हैं!खैर, उन दिनों इस स्टेशन की हालत मुझ जैसी ही थी!समय का तंगहाल दौर!कमतरी के दोपहर,विषाद में डूबीं रातें,पीड़ाओं में आकंठ डूबा देह और मन।दोनों के बेतहाशा तपने के दिन थें। मौसम कौन सा रहे,इससे अंतर नहीं था। उन्हीं दिनों,घर से कार्यस्थल जाते समय ट्रेन में जब कभ...