मैं सुक़रात बनना चाहती हूं!सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने रहना चाहती हूं। हो जाना चाहती हूं प्लेटो और देखना चाहती हूं दार्शनिक को बनते राजा। बनना चाहती हूं अरस्तू कि ज्ञान का कोई पक्ष अछूता न रह जाए। मैं बनना चाहती हूं डेकार्ट कि स्व को,आत्मा को खोजना है बिना ईश्वर के और ईश्वर को सिद्ध करना है प्रज्ञा से। और फिर स्पिनोजा कि तरह सबकुछ ईश्वरमय घोषित कर सकूं। चाहती तो यहीं हूं कि मरते वक्त कह सकूं लाइबनित्ज की तरह कि 'ये दुनिया सभी संभावित दुनिया में सबसे अच्छी है'। यद्यपि मैं अभी शोपेनहावर से सहमत हूं कि 'ये दुनिया सभी संभावित दुनिया में सबसे बुरी है'।। मैं चाहती हूं लाॅक बनना और सबकुछ अपने अनुभव से जानना चाहती हूं, चाहती हूं बर्कले कि तरह पत्थर को प्रत्ययरूप सिद्ध करना कि आदमी तो प्रस्तर हो चुका है। किंतु ...
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