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मैं मणिकर्णिका की राख प्रिये…

 

तुम अटल,अविनाशी शिव का काशी,
मैं बेतिया के सड़कों की धूल प्रिये।
तुम “काल भैरव”काशी का कोतवाल,
मैं पवन,गोंदियाके चक्कर काटती यात्री एक बेहाल प्रिये।
तुम क्रिस्टल बाऊल,मिंग गार्डन का लजीज शाम,
मै तेरे इंतजार मे खाली पेट सोई रात प्रिये।
तुम महामना की बगिया का शान,
मैं विफल शिक्षा नीतियों में फसीं शिक्षक बेजान प्रिये।
तुम मां गंगा का सुमधुर कलकल करता संगीत,
मैं बिसरा दी गई भूले-बिसरे गीत प्रिये।
तुम जीवन काशी गलियों की, मैं मणिकर्णिका की राख प्रिये……….

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