लोककलाएं अपने भूगोल में देसी होती हैं किंतु व्याप्ति में एक समूचे राष्ट्र और उसकी सांस्कृतिक पहचान को समेटे होती हैं।वे शास्त्रों के ज्ञान को भदेस में लोक तक संचारित करती है। यदि ऐसा न हो तो सुप्रीम कोर्ट में पढ़े-लिखे लोगों द्वारा श्री राम को काल्पनिक बताने वाले अपनी कुचाल में सफल न हो जाता अगर राम की दामाद के रूप में लोक में चेतना न होती। यही लोककला है जो गाती है कि,'ऐ पहुना,ऐही मिथिला में रहना'। और मां जानकी के साथ अपने राजा को यह राष्ट्र बिहार क्षेत्र में पाहुन बनाकर पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृतियों में संजोकर रखता है।
लोककला जिसकी काया देसी है किंतु आत्मा राष्ट्रीय। महादेव,श्रीराम और श्रीकृष्ण इस भारत राष्ट्र की आत्मा हैं।यह वह भित्ति है जिसपर भारत का चित्र बना है।उसकी सांस्कृतिक चेतना की बुनाई इन्हीं तीनों से हुई हैं। किंतु जिस शलाका पर यह चेतना बुनी है वह भारत की लोककलाएं हैं।अपने रूप में देसी किंतु आत्मा से राष्ट्रीय।
भारत के किसी कोने में बैठकर जब किसी ने इक भारी-भरकम - गरजती आवाज़ में सुना होगा,'तो चलिए अब चलते हैं कुरूक्षेत्र की ओर जहां कौरव और पांडव की सेना आमने-सामने खड़ी है',तब सम्मुख जन-मानस एकसाथ कुरूक्षेत्र में उतर जाता रहा होगा।काल को अपनी कला से ठेंगा दिखाने वाली भारत के खूबसूरत छत्तीसगढ़ राज्य के पंडवानी नृत्य की अधिकारिणी तीजन बाई,जिनका बीते दिनों देहावसान हो गया किंतु जिनकी आत्मा इसी भारतभूमि की मिट्टी में ही ओतप्रोत होगी।भारतीय लोककला की वह विदुषी जिनके सम्मुख मेरे जैसे पढ़ी-लिखी भी पानी भरती है। ज्ञान का अमिट आकाश जिनके पास था जबकि वे निरक्षर थीं।जिनकी कला ने महाभारत जैसे महाकाव्य को बिना किसी तामझाम के पीढ़ी दर पीढ़ी प्रस्तुत किया अपने इकतारे से,अपनी गरजती आवाज़ से। हाथों में पकड़े उस इकतारे से उन्होंने लोककला के माध्यम से जीवनमूल्यों को पीढ़ियों में पिरोने का कार्य किया। ऐसा एक इकतारा जिसमें पंडवानी कला का समंदर बंधा हुआ था।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक और प्रसिद्ध लोक गायन एवं नाट्य शैली है जिसमें महाभारत की कथाओं को संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसकी दो शैलियां हैं - वेदमती और कापालिक। वेदमती शैली स्त्रियों के लिए हैं जिसमें वे बैठकर पंडवानी गाती हैं। कापालिक शैली पुरुषों के लिए है जिसमें वे खड़े होकर दमदार आवाज में गायन और अभिनय करते हैं। मात्र 13 साल की उम्र में जब तीजन ने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली में गायन और अभिनय शुरू किया होगा तो जो संघर्ष उन दिनों उन्होंने किया होगा ,उसने उनकी प्रतिभा को एक नया आयाम दिया।वह विरल प्रतिभा, संघर्ष ने जिसे विकसित किया।उन्होंने अपनी कला किसी विश्वविद्यालय में नहीं सीखी,वह स्वयं के तप और साधना का फल थी। विश्वविद्यालय तो केवल नौकर बना रहें हैं।वह भी रीढ़विहीन नौकर ।
खैर,इस दारूणकथा के लिए यहां स्थान नहीं है।
मैं हतभागी जिसने उन्हें देखा तो किंतु उनकी प्रस्तुति को कभी न देख पाई।अब कभी नहीं देख पाऊंगी।उस पुण्यात्मा को विनम्र श्रद्धांजलि है।🙏
उनसे भी और परमपिता परमेश्वर से भी यही प्रार्थना है कि अगली बार तीजन बाई धरा पर आएं तो इसी भारतभूमि पर उतरें अपनी उसी इकतारे के साथ जिसकी लोककला ने भारतीय सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ियों तक झंकृत रखा। जिसने व्यास जैसे विद्वान के संकलित-रचित महाभारत को लोकस्वर दिया।
मां फिर मेरे देश आना अपने इसी देसी अंदाज में।
और अंत में,भारत के पास गौरव के लिए यदि उसका इतिहास,उसकी संस्कृति,उसका वैभव ,उसका दार्शनिक ज्ञान है तो उसकी लोककलाएं भी हैं जिन्होंने विविधता भरे भारत को सदियों से एकसूत्र में बांधे रखा है। ध्यान रखना होगा सरकारों को,हमको-आपको कि आधुनिकता के ऐश्वर्य में हम परंपराओं की ऐसी थाती को,लोककलाओं की ऐसी विभूति को खो न दें।
इस दुख को यहां लिखने से मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूं कि इस देश से सबसे पहले उसकी भाषा छिनी गई, कुटुम्ब छीना गया,अब दर्शन छीना जा रहा है और अंतिम वार हमारी लोककलाओं पर ही होगा।

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