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स्व की यात्रा

 

1. बचपन कैसा रहा?
बिल्कुल वैसा जैसा एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार के बच्चों का होता है।सिवाय अन्य बच्चों से इतना ही अंतर था कि मेरे ही साथियों द्वारा मेरा इस बात पर मजाक उड़ाया जाता था कि मैं कुछ अलग हूं औरों से। हालांकि कभी मुंह पर नहीं कहा। नहीं तो बचपन भयंकर मारपीट के किस्सों से भरा होता। वैसे थोड़े शरारतों, थोडी पढ़ाई, भाई-बहनों से भरा घर,उनकी डांट-मार और प्यार के साथ ही आत्मकरूणा से भरा रहा बचपन। आज़ सहानूभूति भर-भरकर मिले, ऐसे अनेकों किस्से हैं किंतु इस स्थिति के बहुत विश्लेषण में जाने से बहुत विवरण बढ़ेंगे और बहुत भावुकता भी। ये चीज़ें व्यक्ति को लचर बना देती हैं। ऐसी घटनाएं मिटा देने की चीज़ है। उसे भूलिए मत, लेकिन ध्यान खींचने के लिए बेवजह याद भी मत कीजिए।
2.ज़माने से क्या मिला?
स्नेह,दया,प्रेम,मान,दोस्ती,साथ,सहयोग,सहायता,सह्रदयता,सुख और मंजिल! यह भी...
घृणा, उपेक्षा,अपमान ,असहयोग, दोस्ती में छल,निष्ठुरता,
अभाव,अन्याय,दुख और भटकाव...
3. लेखन जीवन में उतरा या जीवन से लिखने की प्रेरणा?
लेखन की कला जन्मजात तो नहीं थी इसलिए कह सकते हैं कि जीवन के कटु अनुभव ही स्याही बने या लिखने की प्रेरणा।
4.जीवन की दरारें किससे भरेंगी? स्मृति से, कल्पना से या मौन से?
यह रोचक प्रश्न है। बहरहाल, तीनों से भरूंगी।
5. संघर्ष ने दुनिया को करुणा से देखने की दृष्टि दी या अधिक कठोर बना दिया?
दोनों ही बातें रहीं।जिन अनुभवों ने दुनिया को देखने की दृष्टि करूणामय बनाई उन्हीं अनुभवों ने स्वभाव को बहुत कठोर बना दिया है।
6. लहजे में व्यंग्य कहाँ से आता है—कुंठा से, क्रोध से, दुःख से, ऊब से या किसी गहरी समझ से?
कुंठा और क्रोध छोड़कर बाकी सबसे।कुंठा किसी बात की है नहीं और क्रोध को क्रोध रूप में ही व्यक्त करती हूं।बाकी दुख,ऊब और समझ ने लहज़े को बहुत व्यंग्यात्मक बना दिया है।
7.अंतिम चुनाव क्या होगा? व्यक्ति या समूह, अस्तित्व या अस्मिता, कल्पना या यथार्थ, कला या विचार?
व्यक्ति, अस्मिता, यथार्थ और विचार।
8. गद्य से—सत्य की ओर जाने का मार्ग बदल जाता है क्या?
यह व्यक्ति की अपनी नियत तय करती है कि सत्य का मार्ग क्या बदलेगा या सत्य ही!
9. अपने समय का क्या और किसे पढ़ना पसंद है?
अपने समय के सबकुछ को और सभी को टटोलती हूं विचार और भाषा के स्तर पर। हालांकि पढ़ती पुराने साहित्यकारों को ही हूं।

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