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पिताजी,राजा और मैं

 

तस्वीर में दिख रहे प्राणी का नाम ‘राजा’ है और दिख‌ रहा हाथ स्वयं मेरा।इनकी एक संगिनी थी,नाम ‘रानी’।निवास मेरा गांव और गांव में मेरे घर के सामने का घर इनका डेरा।दोनों जीव का मेरे पिताजी से एक अलग ही लगाव था,जबकि इनके पालक इनकी सुविधा में कोई कमी न रखतें!हम नहीं पकड़ पाते किसी से जुड़ जाने की उस डोर को जो न मालूम कब से एक-दूसरे को बांधे रहती है।समय की अनंत धारा में बहुत कुछ है जिसे हम नहीं जानते;संभवतः यही कारण है कि मेरी दार्शनिक दृष्टि में समय मुझे भ्रम से अधिक कुछ नहीं लगता;अंतर इतना है कि यह भ्रम इतना व्यापक है कि धरती के सभी प्राणी इसके शिकार बन जाते हैं।बहरहाल बात तस्वीर में दिख रहे प्राणी की चल रही है।

पिताजी से इनके लगाव का आलम यह था कि अन्य घरवालों के चिढ़ने-गुस्साने से इनको कोई फर्क नहीं पड़ता।जबतक पिताजी न कहें,ये अपने स्थान से हिल नहीं सकते थें।पिताजी के जानवरों से प्रेम के अनेकों किस्सों में एक यह मैंने बचपन से सुन रखा था बाबा से कि जो भी गाय घर में रखी जाती,वह तब तक नहीं खाती जब तक स्वयं पिताजी उनके ख़ाने की व्यवस्था न करतें।

राजा अब अकेला जीवन जीता है,उसके साथ अब उसकी संगिनी नहीं है और मेरे साथ मेरे पिता।संभवतः यही दुख है जो हम-दोनों को जोड़ता है जबकि न मुझसे इनका बहुत मिलाप है,न इनको मुझसे बहुत लगाव है।मैं कभी वर्ष में एकाध बार गांव जाती हूं तो ये बड़े अनमने ढंग से ही सही मेरे पास आते हैं और मानो पूछते हैं– पिता के बिना कैसा लगता है? मैं भी पूछती हूं जीवनसाथी बिना कैसे जी रहे हो? हम-दोनों एक साथ बैठेंगे, कुछ बातें होती हैं जिनमें शब्दों से गढ़ी भाषा बाधा नहीं बनती।मैं कुछ खिलाने का प्रयास करती हूं किंतु न जाने क्यों महाशय कुछ ग्रहण नहीं करतें।जबकि पिता जी के रहते जब तक वे कुछ खाने को दे न दें तब तक राजा और उनकी रानी दरवाजे से हट नहीं सकते थें।पिताजी के अकेले के दिनों में दोनों उनके साथ रहें,पिता रात्रि में जब घर के बाहर के बैठक में सोतें तब राजा और उनकी‌ संगिनी भी पिता की चौकी के आसपास ही रहते।दिनभर अपने डेरे और शाम को मेरे गांव के घर का दरवाजा इनका डेरा।जब कभी पिताजी के रहते मैं गांव जाती तो दोनों बड़े उत्साह से भौंकते,मानो बतला रहे हों कि हमें बड़ा अच्छा लगता है आपके पिता के साथ।और मैं यह भी जानती हूं कि पिताजी बिना इन्हें कुछ खिलाए कभी कुछ न खाते रहे होंगे।कालदेव की लीला!पिताजी और रानी दोनों ने एक ही महीने में इस दुनिया से अलविदा कहा।

मैं अब भी कभी गांव जाती हूं किंतु जीने का,कुछ कहने का‌‌ वह उत्साह अब न राजा में है और पिता तो संतान के जीवन का सूरज होते हैं,अजस्र ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत,अब दुनिया से लड़ने का,संघर्ष करने का वह‌ जूनून और जज्बा मुझमें भी नहीं रहा।किंतु फिर भी हम-दोनों मिलते हैं और अनकही भाषा में अपना-अपना दुख कहते हैं।

वर्ष भर होने को हुए गांव गये!मुझे नहीं पता अब‌‌ इस प्राणी का जीवन भी शेष रहा या नहीं;पिता से जुड़ाव की इस कड़ी के गुम हो जाने के भय से मैं घरवालों से पूछती भी नहीं।अब जो कुछ भी है,उसे तो देखना ही‌ है।देखते हैं,यह जीवन कितना कुछ लेती है जरा सी कुछ सांसें देकर!

Comments

Anonymous said…
सरल, सहज शब्द में मानवीयता की सूक्ष्म अभिव्यक्ति। प्रभावशाली।

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