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आत्म-समीक्षा के दिन...

 भारतीय दर्शन में या यूं कहें कि विश्व दर्शन में कुछ अवधारणाएं ऐसी हैं जिनपर दो पक्ष है किंतु अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। यदि ज्ञान का विस्तार करें तो विज्ञान भी इसमें सम्मिलित है। किंतु क्योंकि मैं दर्शन की विद्यार्थी हूं तो दर्शन पर अपनी बात केन्द्रित करती हूं।इन तमाम अवधारणाओं में है - आकाश,समय ,दिशा,कारण-कार्य,कर्मनियम, पुनर्जन्म इत्यादि। विसंगति यह है कि रोजमर्रा के अपने जीवन में मैं नितप्रति इन अवधारणाओं की संकरी गली से गुज़रती हूं। किंतु एक तो ज्ञान का प्रकाश कुछ मद्धम है मुझमें तो रोज़ ही डूबना-उतराना होता है।

मैं जब इन प्रश्नों से निजात पाने की सोचकर वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करती हूं तो पाती हूं कि इस मल्टीमीडिया सेट जैसे समय में मैं तो बटन टिपने वाली मोबाइल जैसे हूं। दूसरे, शब्दों में कहें तो समयानुकूल नितांत अयोग्य हूं। मैं जो वर्तमान में हूं, यदि वह‌ नहीं होऊं तो मुझे और कुछ भी नहीं आता है।तब मैं पुनः घबरा कर अपने कमरे में पड़े किसी दार्शनिक अवधारणा को उठाती हूं और उसपर चिंतन करने का अभिनय करती हूं। किंतु यह अभिनय मुझे मुंह चिढ़ाता है कि ऐसा अभिनय यदि बाह्य जीवन में होता तो कुछ बेहतर होता। क्योंकि अपने दार्शनिक पूर्वज शंकराचार्य और उनके शिष्यों के धूल बराबर भी बुद्धि नहीं है तो चिंतन क्या करूं जबकि यार-दोस्तों को हंसी में जरूर कहती हूं कि मैं उनके समय की दार्शनिक हूं।

बहरहाल, निर्मम आत्म-समीक्षा के दौरान मुझे पता चलता है कि चूंकि प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ विद्वता होती है। कोई बहुत अच्छा लेखक होता है, कोई श्रेष्ठ पाठक । कोई बहुत अच्छा गायक तो कोई नृत्य का कलाकार। किसी की दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो गयी,वह अकादमिक जगत में ऊंचा नाम कर रहा है। कोई बहुत अच्छा गृहस्थ है, संस्कार युक्त और श्रेष्ठतर मूल्यों से अपने अभिभावकत्व धर्म का पालन कर रहा है तो कोई समर्पित भाव से माता-पिता की सेवाकर जीवन धन्य कर रहा है।

एक ओर मैं हूं! मुझमें भी अनेकों गुण हैं; जैसे अदृश्य रहने की;लोग अक्सर मुझे देख नहीं पाते जब देखा जाना चाहिए। मुझमें गुण है कि कोई भी सरलता से मेरे सामने अपनी धूर्तता प्रकट कर देता है।इस दुख में मैं मातृहीन-पितृहीन अकेले अपने कमरे पर बैठकर इस बात का झाला बजाती हूं कि मैंने भी उस ब्रह्म की तरह अनेक होने की‌ इच्छा नहीं की!

गहन नैराश्य में डूबा आहत मन आसमां में ढूंढता है चांद जिसकी शीतलता में राहत मिले, किंतु विज्ञान कहता है वह तो बंजर-पथरीली है तो उससे कुछ दूरी ही भली है!किंतु यह भी एक गुण है जब जमीं की ओर देखना था, मैं आसमान की ओर ताक रही थी...

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