Skip to main content

मैं कैसी हूँ...


छवि: गोरखपुर शहर के गोरखनाथ मंदिर के परिसर में स्थित सरोवर की। 

मेरा एक विशेष स्वभाव रहा है सदैव से कि उसी के पास बैठ पाते हैं या बातें करते हैं जिससे मन मिलता है।अन्यथा अकेले ही रहना पसंद करती हूँ।मुझे स्मरण है छात्रावास के दिनों में मैं एक जूनियर के कमरे पर काफी देर से और बड़े इत्मिनान से बैठी थी,तभी मेरी दोस्त आती है और कहती है 'तुम्हें मैंने सब जगह ढूंढा और तुम यहाँ बैठी हो!' फिर वह मेरी जूनियर से मुखातिब हो कहा कि 'तुममे जरूर कुछ बात है जो यह(मैं) यहाँ बैठी है इतने अनौपचारिक रूप से।'

यही हाल रिश्तेदारों के सम्बन्ध में भी है।अभी भी घर जाती हूँ तो दरवाजे तक उठकर जाने की जहमत नहीं उठाती कि कौन आ-जा रहा है।मुझे बस उस थाली से मतलब रहता है जो सुबह-शाम भाभी देती हैं।निश्चित रूप से इस कठोर और कड़वे संसार में भाई की ब्याहता भोजन परोस कर दे दें वह भी मेरी रूचि का,निश्चित ही यह मेरे पुण्य कर्मों के प्रतिफल से अधिक उनके संस्कार की बदौलत हैं। बहरहाल, 

मैं अपने कार्यस्थल भी चुपचाप जाती हूँ,अपना काम किया और घर लौट आती हूँ।सिवाय दो-तीन आत्मीयजनों के पास कभी-कभार बैठ जाने के।वह भी हम कभी-कभी ही चाय के बहाने बैठ पाते हैं। अन्यथा इतनी दुश्वारियां हैं जीने की एक कप चाय पर बैठने के लिए भी समय चुराना पड़ता है। यद्यपि कोई सम्मान और स्नेह से पूछ ले तो जरूर बैठ जाती हूँ,इंकार नहीं कर पाती क्योंकि पलट कर न देखने वाले काल में यदि कोई आपको कुछ देर अपने साथ बैठने को कह दे,तो उसे मना करना मानवीय गरिमा का अपमान है मेरी दृष्टि में।

स्वार्थ पूर्ति किसी मनुष्य से साधने का कार्य कभी किया नहीं, इसलिए बेमन से किसी के पास बैठने की कभी न जरूरत पड़ी,न इच्छा हुई। 


दोस्त बहुत बनाए नहीं।एक-दो बार बनाया था तो उन्होंने आत्मा तक पर ऐसी आरी चलाई कि दर्द अब भी रह-रहकर उठता है।उसके बाद यह भी शौक समाप्त हो गया।लेकिन जो मिला,उसमें एहसानफरामोशी भी नहीं।प्रेम भी बहुत मिला संगी-साथियों से, सीनियर्स से,जूनियर्स से,हमेशा से और शोध के दिनों तक मिलता रहा। 

अब भी मिलता है सहकर्मियों से;किंतु फिर भी एक टीस सी उठती है कि अब वैसा प्रेम लुटाने वाले नहीं मिलते।कई बार प्रतिस्पर्धी समझते हैं मुझे लोग।तब मुझे हंसी आती है इस सोच पर क्योंकि मैं स्वयं की सफलता के साथ सभी के सफलता की कामना करती हूँ। और ऐसा मेरा विश्वास है कि हमसब सफल हो सकते हैं बिना कोई धक्कामुक्की किये।खैर, 

यद्यपि इसका कारण हो सकता है कि सभी एक अंधी दौड़ में हैं जिसका न मालूम क्या हासिल है?कुछ हासिल होता भी है या नहीं,यह भी अबूझ है।फिर भी इस तेजी से भागती दौड़ती दुनिया में आज भी जो स्नेह मिल रहा है उससे भी एहसानफरामोशी नहीं।आसपड़ोस वाले सदैव पूछते रहते हैं,खाने पीने का ध्यान रखते हैं। तीज-त्यौहार पर प्रसाद और त्यौहार अनुसार बने पकवान दे जाते हैं।यह भी उनकी ही भलमनसहत है,अन्यथा तो दिनचर्या ऐसी है कि किसी से मुलाकात ही संभव नहीं होती बहुधा। 


घर पर बर्तन साफ करने वाली हों वह भी भली महिला हैं कि और कहीं भले छुट्टी ले लें लेकिन मेरे यहाँ हर हाल में आती हैं।सब्जी वाले दादा हों जो पैसा हो चाहे न हो मेरे पास, यदि रस्ते में मिल गई तो सब्जी देकर ही मानते हैं।डेयरी वाली भली महिला हों जो दूध समय पर घर न पहुंचाए जाने पर अपने पति से मेरे लिए लड़ जाती हैं।आजकल तो सुबह टहल कर लौटते समय एक कप चाय पिला देती हैं और इस तरह मैं सुबह की चाय बनाने से मुक्ति पा जाती हूँ।इस जी के जंजाल वाली दुनिया में मुक्ति यदि एक कप चाय भर मिल जाए तो बड़ी कृपा सृष्टिकर्ता की यदि वह है तो;न हो कोई रहनुमा तो और भी अच्छा; ऐसे बेढब जीवन में कुछ पल तो ढंग के हैं। खैर, 

इतनी सारी बातों में मैं यदि तुक मिलाने का प्रयास करती हूँ अपने स्वभाव से और आसपास के लोगों के व्यवहार से तो निश्चय ही उन चरित्रों का अस्तित्व एक गरिमामयी आभा से व्याप्त है। दुनिया की सुंदरता ऐसे ही लोगों से बुनी जा रही है हररोज,बच रही है हररोज।

तब मैं बड़े संकोच में पड़ जाती हूँ और स्वयं के व्यवहार को बड़ा बेतूका पाती हूँ।फिर भी इतना कह सकती हूँ और यह यकीन उन्हें दिला सकती हूँ कि इतनी मोहब्बत के बदले मैं यह यकीन ही दे सकती हूँ कि दुनिया इनमें से किसी के विरूद्ध हो जाए किंतु मैं एक बार जिसके साथ खड़ी हो गई, अंतिम सांस तक उसके साथ ही खड़ी रहूंगी। 

कि यदि मानवीय अस्तित्व की खुबसूरती में बढ़ोत्तरी न कर पा रहीं होऊंगी तो उसको बदसूरत तो बिलकुल भी नहीं कर रहीं हूँ।इस बात के लिए मैं विशेष रूप से सजग रहने का प्रयास हर क्षण करती हूँ, बाकी नियति जाने उसे क्या लिखना-लिखवाना है;उसपे मेरा जोर नहीं। 

आज न जाने क्यों अपने बारे में लिखने की इच्छा हुई, सो लिख दिया।किंतु लगता है कितना कुछ छूट गया अपने बारे में कहने से। सबसे आवश्यक और हिम्मत वाला काम तो स्वभाव के स्याह पक्ष को लिखना होगा।ऐसा लगता है एक आत्मकथा के बिना बात बहुत कुछ अनकही ही रहेगी।

फिलहाल इस लिखे को कोई पढ़ ले,यह भी उसकी भलमनसहत क्योंकि कितना कुछ तो है पढ़ने को!कोई मुझे क्यों पढ़े भला फिर!फिर भी पढ़ता है तो उसके प्रति कृतज्ञता ही ज्ञापित कर सकती हूँ। 

क्योंकि इतनी पुस्तकें हैं दुनिया में कि मेरा लिखा तमाम लिखे में सबसे बेकार लिखा लगता है मुझे… 

Comments

Unknown said…
बहुत ख़ूब.... अच्छा लिखा है आपने मैम...
Anuradha said…
धन्यवाद सर

Popular posts from this blog

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

19/06/2025

मां जब बीमार पड़ी और ऐसी पड़ी कि फिर पहले जैसी न हुईं,उन्हीं दिनों की बात है जब देह में एक अनजाने रोग ने दस्तक दी।दस्तक ही इतनी जोरदार थी कि लगा आगे क्या होगा।इन भय से भरे दिन में जब मां से मिलने गई किंतु बता न सकी कि मैं कितने दर्द में हूं,तभी कि बात है। बीमारी से पहले मां को न रोग बताने पड़ते थें न पीड़ाओं की गहराई,चाहे वह देह पर लगी हो या मन पर।न जाने कौन सी पढ़ाई उसने कहां से की थी कि कुछ कहना नहीं पड़ता था गो वह जानती थी कि मुझे शायद कहने नहीं आता या कहूंगी नहीं। तब दर्द से रातभर जगने के कारण अगली सुबह जब शरीर के कुछ कदम चलने में भी सहयोग देने से मना करने पर मां के बगल में लेटी।तब स्वयं पर जीवन में पहली बार दया आई।मन इस वेदना से मनो भारी हो गया कि अब दर्द को बिना कहे कोई समझने वाला नहीं है।अब बीमार पड़ने पर कोई दौड़-दौड़कर दवा लाने वाला नहीं है। वह पहली बार था जब बीमार पड़ने पर स्वयं पर रोना आया।अब भी बीमार पड़ती हूं,बीमारी में रोना आता है किंतु अब खुद पर उस दिन जैसी दया नहीं आती।अब कहने का सहूर भी आ गया है।यह न कहना भी कृतघ्नता होगी कि जीवन के सामाजिक दायरे ने ऐसा खुशनुमा विस्तार...

उदास दिन...

मैं अक्सर बेहिसाब उदासी से भर जाती हूं।इतनी उदास कि इस उदासी से दुनिया में एक नया महासागर बन‌ सकता है और दुनिया के नक्शे में पांच महासागर की जगह कुल छह समंदर हो जाएं।जब मैं कहती हूं किसी अपने से कि बहुत उदास हूं तो वह मुझे समझाता है कि फलां-फलां कारण से उदास हो और फलां-फलां काम करो,मन लगाओ तो उदासी दूर हो जाएगी। गोया उदास होना बहुत बुरी बात हो।कोई नहीं मिलता जो ये कहे कि ओह!उदास हो!अच्छी बात है,रहो उदास और इस दुनिया की चिंता मत करो।यह उदासी तुम्हारी यानि मेरा किरदार है इस दुनियावी रंगमंच पर। वर्ष भर के किन्ही‌ कमजोर दिनों में मैं अपनी उदासी को साधने में नाकामयाब होती हूं और तब उन दिनों में मैं अपने पसंदीदा गाना नहीं गा पाती‌ हूं।उन गीतों को भी नहीं जो प्रसन्नता के दिनों में बड़े सुर में निकलते हैं।उदासी‌ भरे गीतों के तो बोल तक नहीं फूटते कंठ से जबकि मुझे लगता है मेरी आवाज़ पर वे ही गीत अधिक फबते हैं।इन बेहद गहरे उदास दिनों में कुछ लिखा‌ भी नहीं जाता।शब्द कहीं खो जाते हैं।अर्थ अपनी अभिव्यक्ति में असमर्थ से हो जाते हैं।उथले से वाक्य बनते हैं और बेहद छिछले से वाक्यांश।और कलम!साध लेती है च...