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क्षणिकाएं…

 

1.
इतनी बीमार कि सांसो से उठता है धुंआ, 
इतनी उदास की शरद झड़ा,आया पतझड़।
करोड़ों करोड़ ब्रह्मांड है हमारे बीच, 
हममे- तुममे इतनी दूरियां।

2.
 न पूछो कोई मुझसे हाल मेरा।
जाने कोई क्या पूछे, 
जाने किस बात पर रो पडुं।
डर लगता है मेरे रोने से आए न सैलाब, 
चुपचाप डूबने दो मुझे,
कि आसपास की लहरों को भी न पता चले,
और बह न जाए तुम्हारे सब हसीन मंजर।

3.
मेरे दुःख इतने उपजाऊ, 
बरस भर छाई रहती है जिसपर बहार।
मेरे सब सुख भरे दिन मानो गौरैया, 
जो यदाकदा दिख जाती हैं,
मरी हुई भीड़ भरी सड़कों पर।

4.
मेरे हृदय को लग गए हैं अवसरवादी दीमक,                  वहां फूटती नहीं अब भरोसे की कोई नई कोंपल,
अर्थों ने इतना छला,कि शब्द नहीं होते उच्चरित, 
उदासी ही एक भाषा बची है अब मेरे पास।

5.
मुझे लौटना है पुनः माँ के गर्भ में, 
वहाँ का अंधेरा इतने प्रकाश से भरा, 
कि करोड़ों सूर्य मिलकर न दे सकें,
इतना उजाला!
वहाँ का सन्नाटा,
मानो स्वर्ग की मधुर झंकार!
बस उतना ही जीवन चाहिए मुझे,
कुल जमा नौ महीने नौ छटांक।।

Comments

Raisahabpatel said…
जिन आंखों में आंसु जल्दी आते हैं , वो आंखें दरवाजा हैं.....

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