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क्या दुःख शाश्वत है!!

 क्या दुःख शाश्वत है?

जो खत्म हो जाए वो दुःख ही कैसा?

यदि खत्म हो जाए, इसका मतलब दुःख सच्चा नहीं था,उथला था!

दुःख है तभी तो विवेकज्ञान के लिए अष्टांग योग की पद्धति दी महर्षि पतंजलि ने,

दुःख खत्म हो जाता तो गौतम से बुद्ध तक की यात्रा नहीं होती,

दुःख से करुणा की यात्रा न होती!

दुःख है तभी तो दर्शन की भूमिका बनी।

दुःख है तो साहित्य है,सृजन है।

तब भी दुख रंच मात्र भी कम न हुआ,

मानो समस्त दर्शन-मनन-चिंतन दुःख के अस्तित्व का,उसके शाश्वत होने का उद्घोष कर रहे हों!

दुःख तो सृजन के लिए ईंधन है,मुक्तिपथ है।

दुःख जब शब्द का रूप धरते हैं तो मार्मिकता में लिपटे अपने अर्थों से न जाने कितने पढ़ने वालों के दुःख की कीलें निकालते हैं,कितनों को अपना दुख पहचानने में, टटोलने में सहायक होते हैं!

लेकिन दुःख समाप्त नहीं होता,अपना रूप बदलता है सात्विक रूप से करुणा में,सृजन में, रचनाशीलता में।सुख दो दुःखों के अन्तराल की अवस्था है।सुख,दुःख का ही परिवर्तित रूप है,अन्यथा समस्त भारतीय दर्शन क्यूँ भला आत्मा की वास्तविक अवस्था में सुख से भी मुक्ति की बात कहता। 

       तब परमतत्त्व को जो सच्चिदानंद कहा गया,उसमें आनंद मात्र सुख-दुःख से परे किसी अवस्था को प्राप्त कर लेना है या यह वास्तव में कोई भावात्मक अवस्था है!क्या परमतत्त्व को मात्र सत्-चित् कहना ही पर्याप्त नहीं!आनंद क्योंकर उसमे जोड़े!

यदि कहें कि सुख की चाह,उसकी ओर दौड़ ही सिद्ध करती है कि हम वास्तविक रूप में आनंद स्वरूप हैं, इसलिए हम सुख की चाह करते हैं। किंतु यह मात्र अपनी वास्तविक ( दुखात्मक अवस्था) स्थिति से पलायन नहीं! दुखों से न लड़ पाने की/या समाप्त न कर पाने की अपनी अक्षमता को छिपाना नहीं!

कहीं सत्य यही तो नहीं कि"दुःख ही शाश्वत है"..

दुःख के समाप्त होने पर अब तक जो चिंतन-मनन हुआ,जो कहा-सुना गया,वह केवल कहीं आत्मप्रवंचना मात्र तो नहीं!!



Comments

Unknown said…
दुख पंचवर्षीय योजनाओं के अधीन हम सभी के दैनिक जीवन में कुंडली मार के बैठ जाता है और दिमक की तरह हमे खोखला करता है । हालांकि इन्ही दुखों के कारण हम सभी को ऐसी मजबूती प्राप्त होती है जिससे हम सभी किसी भी परिस्थिति में कैसे भी दुख को झेल सकते है 😁
Anuradha said…
वाह!,बहुत अच्छा।।

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