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दसबजिया...

एक दसबजिया,छोटा-सा फूल जिसकी प्रासंगिकता नगण्य है।शास्त्र उसका वर्णन नहीं करते।किसी देवता का प्रिय पुष्प होने का सौभाग्य उसे नहीं मिला।कोई महाकाव्य,कोई महान कथा जिसकी विषयवस्तु प्रेम हो, उसमें इसे स्थान नहीं मिला। सौंदर्य का कोई बिंब का प्रतिबिंब यह न बन सका।प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं को देने के लिए इसे कभी नहीं चुना,न तो प्रेमिकाओं ने इसे अपने केशों में टांका।

इन प्रपंचों से कहीं बहुत दूर,सौंदर्य के विशाल समंदर से दूर ,उपेक्षित सा चुपचाप खड़ा रहा दसबजिया।और तो दार्शनिकों ने भी उसमें कोई दृष्टांत नहीं तलाशें।

किंतु मैं कभी न बिसरा पाई इसे। संभवतः ऐसा बचपन की स्मृतियों के कारण हो जो अब अतीत हो चुका है और जहां तक अब केवल मन की गति है किंतु मन वहां बारंबार जाता है।

खैर,

किंतु दसबजिया स्मृतियों के कारण ही गहरे मानस में पैठा रह गया,ऐसी बात भी नहीं।एक तो गुलाब को गुलाब होने का बड़ा दंभ है।कमल को वर्तमान सत्तादल का प्रतीक होने का दंभ है।सबके अपने-अपने कारण है दंभी होने के जबकि दसबजिया को किसी बात का दंभ नहीं है।उसे अपना रुआब नहीं झाड़ना।उसपर विशेष होने का भी कोई दबाब नहीं है।यूं वह अपनी अप्रासंगिकता का सुख भोग रहा है।तिसपर एक तो यह बड़बोलेपन से भी दूरी रखता है।दसबजिया दर्शन का सार है जहां समवेत स्वर में भारतीय दर्शन कहता है कि जीवन दुखमय है।

सौंदर्य के तमाम प्रतिमानों पर खरे उतरे पुष्प हमें तीव्र सुख देते हैं किंतु क्षणिक सुख।सुख की उपस्थिति से उपजा सुख अपनी अनुपस्थिति में कहीं अधिक कष्टकारक होता है।सुख की अनुपस्थिति, दुख की उपस्थिति से अधिक कष्टकारक भी होती है। इसलिए सुख नहीं चुनना है,दुख भी नहीं।इन दोनों के परे की अवस्था पानी है।वह सरलता से आएगी।दसबजिया हमें सरल रहना सिखाता है।सरलता से यह हमें मुक्ति की ओर ले जाता है।

वह बिना शोर मचाए चुपचाप अपना काम करता है।दिनभर खिले रहो और संध्याओं के साथ चुपचाप ढल जाओ बिना अपने होने और न होने का शोर मचाए।बिना अपने कामों का बखान किये।किसी ने नोटिस कर लिया तो ठीक,नहीं किया तो भी ठीक।बिल्कुल गीता के स्थितप्रज्ञ के जैसे।

हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने फूल पर निबंध लिखें हैं।मैंने नहीं पढ़ा है।पढ़ भी लूं तो भी उनके जैसे नहीं लिख पाती।यद्यपि लिखने की बड़ी इच्छा है।मैं लिखूंगी तो फूलों की उस पुस्तक का पहला अध्याय दसबजिया पर ही होगा।किंतु इच्छाएं हैं,इच्छाओं का क्या! दसबजिया हमें इच्छाओं से मुक्त होना भी सिखाता है।गीता कि वही बात यह दुहराता है कि कर्म केवल इसलिए करो कि यह तुम्हारा कर्तव्य है, किसी फल की इच्छा से मत करो।

 दसबजिया किसी भले हितैषी के जैसे मुझे ढांढस देता है कि उपेक्षित होना, अप्रासंगिक होना,सरल होना,अदंभी होना,असुंदर होना बुरा नहीं होता हमेशा।

आनंद यही है शायद जिसकी व्याख्या में उपनिषद् के ऋषियों ने अपनी तमाम प्रज्ञा का उपयोग किया किंतु हम हैं किसी दंभी गुलाब की आभा में बौराए,सत्ता में मदमस्त किसी कमल के फैलाए कीचड़ में डूबे! किंतु किसी दसबजिया के फूल जैसे अप्रासंगिक बन दुनियावी प्रपंच के साहिल पर खड़े होकर दुनिया को उसके ही बनाए भंवर में डूबते-उतराते नित देखना ऐसा ही है जैसे,

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।

(मिर्जा गालिब)

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