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चिराॅंद


गंगा,गंडक एवं घाघरा नदी से घिरा छपरा अपने तमाम पुरातात्त्विक एवं धार्मिक स्थलों के साथ भारत में मानव बसाहट के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक है जहाॅं का पुरातत्व स्थल चिरांद इसकी ऐतिहासिकता का गवाह है। छपरा से 11 किलोमीटर दूर स्थित यह पुरातत्व स्थल ईसा पूर्व 2000, यानी आज से 4000 साल पुराना माना जाता है।

वह सिद्धार्थ जिन्होंने मनुष्य रूप में सर्वोच्च नैतिकता के स्तर को प्राप्त किया और बुद्ध कहलाएं;जिन्होंने सर्वोच्च दार्शनिक अवधारणा निर्वाण (मुक्ति) को यथार्थ बनाया,ऐसी मान्यता है कि उनके प्रिय शिष्य आनंद ने इसी स्थल पर जलसमाधि ली थी।इसी कारण इस स्थल का नाम चिरांद है कि वह जो यहां समाधिस्थ हुयें,चिर (कभी न समाप्त होने वाले) + आनंद में समाधिस्थ हैं। संभवतः आमजन की बोली में यह चिर आनंद चिरांद हो गया।

बहरहाल,

नवपाषाणकाल का प्रथम उत्खनन भारत में यहीं प्राप्त हुआ। पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण में ताम्रपाषाणिक युग, नवपाषाण और लौह युग के अवशेष बरामद किए गए है। यहाँ 2500 ईसापूर्व से 40 ईस्वी तक के बनाये गए घरों के अवशेष भी बरामद किए गए है।खुदाई के दौरान कृषि में उपयोग किये जाने वाले सामग्री सहित गेंहू की बाली,हड्डियां भी पाए गए थें।यहां पाए गए अवशेष छपरा‌ संग्रहालय में रखें गये हैं।

ऐसे महत्वपूर्ण स्थल की दुर्दशा,सरकार की उपेक्षा और आसपास के लोगों की उदासीनता का शिकार चिरांद उसी नदी से कटकर रह-रहकर सिमट रहा है जिसके किनारे नवपाषाणकालीन सभ्यता पनपी‌ थी समृद्ध रूप से।

कटता केवल मनुष्यों का थोड़े है।

खैर...

चिरांद में खुदाई के दौरान भारत का दूसरा सबसे ज्यादा अवशेष बरामद हुआ है। सबसे अधिक कहां मिले हैं, मुझे नहीं ज्ञात। खुदाई के समय के सभी अवशेषों के आधार पर नवपाषाण कालीन के एक समृद्ध सभ्यता होने की बात कही जाती है।

जो भी हो समृद्ध अथवा थोड़ा कम समृद्ध किंतु सामने बहती गंगा की सहायक घाघरा के किनारे जब खड़ी होकर इस स्थल की तस्वीरें उतार रही थी मोबाइल में तो यूं प्रतीत हुआ कि आसपास इतिहास सांस ले रहा है किंतु वे डूब रही हैं- लगभग 4000 साल पुराना इतिहास और सभ्यता,जहां इंसान ने पहली बार शिकार छोड़कर खेती करना सीखा,घर बनाए और समाज की नींव रखी।

सरकार अतीत में ले जाने वाले ऐसे उन्नत द्वार के संरक्षण के लिए क्या प्रयास कर रही है, नहीं मालूम। किंतु उसे प्रयास करना चाहिए कि हम जैसे इतिहास के मोह से जकड़े लोग यहां आकर इतिहास को छू तो सकें।यह भी कि वर्तमान जब कभी थकाए और निराशा‌ हावी हो तब अतीत के प्रकाशमान छाॅंव में सुस्ताया जा सके।

उस शाम जब घाघरा के किनारे ढलती सांझ में खड़ी होकर इस स्थल को देख रही थी तब लगा यह स्थल कह रहा हो...

'शाम के झुरमुट में खोते हुए उजाले के जैसे भारत की उजली सभ्यता के चिह्नों में से एक मैं चिरांद का इतिहास भी एक दिन तुमसे गुम न‌ हो जाऊॅं! मैं जो अभी एकाकी,परित्यक्त और सूना हूं, मुझे समेट लो कि मेरी एक-एक ईंट पर जो आख्यान लिखे हैं,वे मानव-मन की कोमलता ही बचायेंगे और काल के कपाल पर भारत की उज्ज्वल सभ्यता का सूर्य सदैव चमकता रहेगा!'

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