गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।कुछ शहरों के हाल तनिक भिन्न हो सकते हैं किंतु एक सामान्य रूप से बात यही है कि गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।हालांकि ठीक-ठीक इस मौसम को नाम देने का प्रयास करें तो कह सकते हैं कि यह मौसम के संधिकाल का समय है।यह प्रवेश द्वार है गर्मियों का।अब यहां से दिनमान और लंबे होते जायेंगे,दुपहरिया अब तपेंगी,शामें बच्चों की भिन्न तरह की क्रीड़ाओं से और रात्रि चहल-पहल से भरे होंगे।
वह सूरज़ जिसके भाव बढ़े थें,अब उसके भाव एकदम से उतर जायेंगे।अब उसपर मीम बनेंगे,अपशब्दों के बाण चलेंगे उसपर कि अभी कुछ दिनों पहले की बात है जब उसके न दिखने पर उसके दिख जाने की कामना करने वाला लोक,अब चाहेगा कि वह थोड़ा कम तपे।
अगर हम सूर्य को देव मानते हैं तो यह देव ही बताने के लिए सबसे उपयुक्त है कि सब दिन समान नहीं होतें,समय सबका एकसा नहीं होता,देव हो,दानव हो कि मनुज!अब सब कोसेंगे गर्मियों को और जाड़े के दिनों को याद करेंगे।किंतु मैं बिल्कुल नहीं करूंगी।मुझको तो गर्मियों के लंबे दिन,तपते-झुलसते दिन ही भाते हैं।
गर्मियों के लंबे तपते दिनों में एक अजीब सा खालीपन है मानो समस्त सृष्टि खालीपन से आकंठ भर गया हो।जैसे गर्मियों के दिनों की दुपहरिया खालीपन से भरी होती है,जब सड़कें बिल्कुल खाली होती हैं और आप सड़क पर ऐसे चल सकते हो मजे से कि मानो सड़क हमारे पिताजी हमारे लिए बनवा कर गये हों।
उसके तपते-झुलसते लंबे दिनों का खालीपन किसी अवसाद,किसी दुख या वेदना अथवा पीड़ा से जन्मा खालीपन नहीं होता है।यह ठीक वैसा है जैसे कोई गहरी चोट जो कई बरस पीछे की सर्दियों में लगी थी।पिछली सर्दियों में जो बिल्कुल ठीक हो गई थी,किंतु चोट के दर्द का अहसास अब भी हो।
वह अनुभूति ह्यूम के दार्शनिक भाषा में चोट के संस्कार से बना विज्ञान है जिसकी अस्पष्ट और क्षीण प्रतीति होती है अब।इस खालीपन के विज्ञान का स्वसंवेदन,जो मन केवल गर्मियों के दिनों में ग्रहण करने हेतु पात्र बन पाता है।गर्मियों का खालीपन! हम नहीं जानते किस संस्कार की क्षीण अनुभूति होती है किंतु होती तो है अनुभूति।
खैर,ऐसा नहीं है कि यह खालीपन आपको केवल खाली करेगा।गर्मियों के दिनों के कितने तो सुख हैं!अब बाज़ार तरह-तरह के आमों से सजेगा,लीचियां उनसे प्रतिस्पर्धा करेंगी, खरबूजे और तरबूज़ भी रहेंगे इस दौड़ में।रस भरे फलों के दिनों का मौसम है गर्मी।
कुछ दिनों में गुलमोहर अपने रक्तिम लालिमा वाले पुष्प गुच्छों के साथ हमारा स्वागत करेंगे।ज्यों कह रहा हो कि बात प्रेम में मर मिटने की थी तो मैंने गुलमोहर होना चुना।उसके रक्त वर्ण और कुछ नहीं,प्रेम की आभा है।प्रेम का सौंदर्य है।कहीं अमलतास क्षणभंगूरता में आनंद से जीने की सीख देते मिलेंगे।अमलतास!क्षणभंगूरता का सौंदर्य है।
अभी इन सब के आगमन में तनिक देरी है तब तक इन सेमल के फूलों को निहार रही हूं।किसी स्त्री के नीले दुपट्टे पर टंके हुए जैसे यह लाल सेमल या कहिए कि आकाश से गिरता नीला झरना और उसके संग यह सेमल!
प्रकृति को निहारने में एक अलग ही सुख है।
गर्मियों के दिनों में तो और भी।

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