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छूटना...

 बहुत से लोग,बहुत सी चीजें हैं जिन्हें मैं चाहती थी कि वे सदैव मेरे साथ रहें।किंतु अब उम्र के उस पड़ाव पर हूं,जब यह भलीभाँति भान है कि 'प्रिय से वियोग' ही इस जीवन की नियति है।

                 यद्यपि उम्र का वह मोड़ है जहां अब मैं किसी को बांधती नहीं,बांधने का प्रयास भी नहीं करती।न ही बांधने की कोई अतिरिक्त चाह ही है।आखिरकार कितना कुछ छूट भी तो चुका है!जाने क्या- क्या छूटना बाकी है!शहर छूटा,शहर की वह तमाम गलियां छूटीं जिसके मन करने पर जब तब फेरे लगते रहते थें।शहर के उन आत्मीयों के घर आना-जाना छूटा,वह आंगन छूटा जिसमें बैठे जाने कितने सुबहों को शाम किये थें।तमाम लोग,कई चौराहे,वह चाय की दुकान छूटी जहाँ से बिना चाय पिये घर जाना दोस्तों में पाप था। 

                  तो यह निश्चित है जीवन की गति और परिवर्तनशीलता के चक्र में कुछ न कुछ छूटना तो निश्चित है।अब वह आप का प्रिय है या अप्रिय, इससे जीवन को रंच मात्र अंतर नहीं पड़ता।तथापि हर बार इस प्रक्रिया में कुछ है जो कंठ तक आकर रूक जाता है।संभवतः प्राण हो! अब उसे तो अपनी उम्र पूरी करनी है सो मन मारकर कंठ से पुनः देह में व्याप्त हो जाना होता है।ह्रदय में आंसुओं की एक बर्फ है जो परिवर्तन की इस प्रक्रिया में  जरा सा पिघलने को होती है कि परिपक्वता उसे पुनः जमा देती है और इसतरह ह्रदय देह का सबसे भारी अंग बन जाता है और मन जो अमूर्त है उसे भी भारी कर देता है। 

                यद्यपि छूट जाने की यह प्रक्रिया दोतरफा है।छूटा ही कुछ इसीलिए कि कहीं जुड़ाव था।किंतु कुछ उम्र का असर कहें अथवा छूटने के प्रक्रम का प्रभाव,जुड़ने से मोहभंग हो चुका है।जुड़ना शब्द भी छूटने से आभासित रहता है।और यही आरंभ बिंदु है उस उपक्रम का;जब हम जुड़ने की वासना से व्याप्त होते हैं तभी हम पटकथा लिख रहे होते हैं छूट जाने की एक और कहानी का।काश!जुड़ना ब्रह्म( Super conscious) की तरह निरपेक्ष होता तब भला कौन उठकर कहीं से कहीं और को जाता! 

               तिसपर माया हम निरीह प्राणियों को जुड़ने और छूटने की अपनी बुनी हर कहानी को स्मृति की रस्सी से बांध लेती है,न केवल इस जनम में हमारे अवचेतन-अचेतन को बल्कि जाने कितने भवचक्र के लिए!आखिरकार  छूटकर भी कुछ छूटता कहाँ है!स्मृतियों में संचित होना तो इस पूरे प्रोसेस की तार्किक परिणति है।तो हम भले सयाने बनकर इस पूरे प्रक्रम को सरल और सहज ढंग से स्वीकार्य करें,किंतु सबकुछ इतना सरल-सहज है नहीं!बड़े सावधानी और जागरूकता से इस स्वीकार्यता बोध को धारण करना होगा।एक पल को भी अंतर्मन की आंखें झपकीं कि माया महाठगिनी हमें पुनःअपने पाश में बांध लेगी।




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