संभवतः 6-7 वर्ष की उम्र से 15-16 वर्ष तक की अवस्था की बात होगी जब गांव मे पक्की सड़क न होने से लगभग 3-4 किलोमीटर पैदल चलना होता था,तब जाकर कोई साधन मिलता था शहर के लिए।कच्चे-पक्के सड़कों से,अपने गांव के अलावा एक और ही गांव से गुजरते हुए,आम के बगीचों को ललचाई निगाहों से देखते हुए,बचपन के अपने सबसे भरोसेमंद साथी (दादाजी)के साथ गांव से शहर लौटना जितना आनंद से भरा होता था,उससे कम ये कौतूहल की बात नहीं होती थी कि हर बार गांव से शहर,शहर से गांव
आते-जाते वक्त एक जगह ठिठककर एक ही सवाल बार बार पूछना कि इस पेड़ का नाम क्या है और अनेकों बार जवाब दिये जा चुकने के बाद भी क्रोध की एक महीन रेखा लाये बिना उसी संयत भाव से जवाब देना जैसे पिछली बार दिया था गोया उन्हें पता हो कि जवाब न देकर भी भला वे कौन सा भविष्य मे घटने वाली घटना को रोक सकते हैं!प्रश्न-ये किस चीज का पौधा है?उत्तर-बेहया का।यह सवाल जवाब बिल्कुल एक शब्द भी इधर-उधर हुऐ उसी लय ताल से हर बार रास्ते में होने वाली तमाम बातों के अलावा केन्द्र में रहता था।और उसके बाद बातचीत का समग्र बिंदु उसी पौधे पर आकर टिक जाता था जब तक कि घर न आ जाये।प्रश्न पूछने वाले और जवाब देने वाले के अलावा अगर कोई और भाई-बहन राह में हमराह होता तो वह भले खीझकर कहता था कि हर बार वही सवाल!मानो एक ही प्रश्न पूछने का गुनाह इस बात का सबूत था कि मैं एक मंद बुद्धि विद्यार्थी न होऊं और पढ़ें लिखे घर के सदस्यों मे मैं उनकी साख पर बट्टा न लगाऊं।खैर प्रश्नोत्तर के बाद वही संवाद कि इसे बार बार काटा जाता है लेकिन बिना खाद-पानी के यह बार बार उग आता है।सिरे से लगाओ कि जड़ से,यह उग ही आता है अपनी पूरी हरितिमा लिए।जड़ से उखाड़ दिये जाने पर भी उग आता है।और हर बार सुने होने पर भी मैं पुनः इस आश्चर्य मे पड़ जाती थी कि ऐसा कैसे संभव है!और उम्र के उस मोड़ पर पहुंचने पर जब खुद के द्वारा किये गए इस बचपने पर गुस्सा आता था कि मैं भी कितनी मुर्ख थी!उस व्यक्ति के पास जिसे जीवन का अथाह अनुभव था, जो ज्योतिष का प्रकांड विद्वान था, जिसकी विद्वता को महामहिम ज्ञानी जैल सिंह के हाथों प्रमाण पत्र मिला था,बजाय कुछ और पूछने के मैं भी क्या पूछती थी।पर उससे दुगुना क्रोध मुझे उनपर आता था कि क्यों नहीं कभी मुझे डांट कर ये प्रश्न बार बार पूछे जाने से मना किया।पर कहते हैं न कि किसी व्यक्ति के किये का मोल कई बार हम जीते जी उसके नहीं समझ पाते।उन्हें भलीभांति ज्ञात था कि वे भविष्य नहीं बदल सकते पर भविष्य का सामना करने के लिए तैयार तो कर सकते हैं।मां कहती थी कि उन्हें भविष्य का बखूबी ज्ञान था और इस बात को लेकर वह उनसे नाराज भी रही बाद मे जीवनभर कि एक बड़ी दुर्घटना को रोकने की कोशिश उन्होंने नहीं की।अब ज्ञान और तर्क से दुनियाभर को समझाया जा सकता है पर मां और प्रियतम के ह्रदय को नहीं कि व्यक्ति सर्वज्ञानी हो भी जाय तो वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता।प्रकृति अपने रहस्यों,क्रियाकलापों में एक सीमा के बाद किसी को प्रवेश और हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देती।
खैर..फिर लौटते हैं उस बेहया के पौधे की ओर।अरसे बाद जब गांव जाना हुआ उनके बिना,तब मैं बहुत उत्साहित थी,लौटकर उन्हें बताने को कि देखिए,आप कहते थें कि ये बेहया के पेड़ खुद ही उग आते हैं बार बार काटे जाने के बाद भी,अब वे वहां नहीं हैं,नहीं उगते अब वे वहां।पर यह मौका क्रूर काल के हाथों ने मुझे नहीं दिया।कहते हैं कि इंसान जिस चीज को लगातार देखता है, सोचता है गहरे भाव से, वह उस जैसा ही हो जाता है बहुधा।मैं जब भी उस पौधे को देखती, तब तक देखती रहती थी जब तक वह आंखो से ओझल न हो जाये ।काश!मैं बता सकती उन्हें कि दरअसल वो बेहया का पेड़ अपनी पूरी चेतना के साथ मुझमें तब्दील हो गया था कि उसके फूल मेरी हथेलियों पर, उसका हरापन मेरे दिल में और उसकी जड़ें मेरे पीठ पर उग आईं हैं कि धोखे और बेवफाई की कितनी भी आरियां चले उस पर, फिर फिर उग आते हैं बेहया के पेड़ मेरी पीठ पर।अब जब कि मैं नहीं रोक सकती उसे उगने से,न रोक सकती हूं उसे कटने से, तो यही सोचती हूँ कि एक हाथ में प्रेम और दूजे में विश्वास के फूल लिए मेरी पीठ भले कितना छिल जाय, उसमें धरती सा धैर्य आ जाय कि भले सबकुछ मानवीय संवेदना के स्तर पर तहस नहस हो जाय,सृजन की कहीं कोई संभावना न हो तब भी बेहया के ये दो फूल मेरे हाथों में सुरक्षित रहे।पर वहीं माथे पर एक घाव भी बन गया है उपेक्षा का,जो भरा पड़ा है पस और मवाद मे तब्दील हो चुके दुनियावी रिश्तों से,कि जिससे हर वक्त रिसता रहता है दर्द बजाय चमकने के माथे के उस हिस्से के ,मानो बेहया का पेड़ खुद को जीभर कर देखे जाने के बदले एक श्राप उपहार स्वरूप दिया हो कि माथे पर लिए उपेक्षित होने का दंश मैं भटकती रहूं न जाने कब तक कि पता नहीं,पीठ के लगे घाव भरते हैं या नहीं।
आत्मा पर बन गए जख्म सूखते हैं या नहीं!!
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