
अक्सर नित नये शोध सामने आते रहते हैं कि चाय सेहत के लिए नुकसानदायक है, चाय न पीएं या कम प्रयोग करें।मैं सोचती हूँ एक कप चाय और दिनभर में चार कप चाय कितना नुकसान पहुंचाएगी शरीर को, इसकी चिंता कितनी है सभी को।पर उसका क्या जिसके लिए चाय का एक कप पीने का मतलब है एक पहर के दुखों को पी जाना।मन की भी तो चिंता करनी है, उसे भी तो बचाना है।चाय का एक कप तो मरहम की तरह है, टूटे ह्रदय के लिए।मानो चाय फेविकोल का काम करती हो और ह्दय के सब टुकड़े जोड़ देती हो और आदमी फिर चल पड़ता है दैनिक चक्र को पूरा करने।अब चाय मर्ज है या दवा, यह पीने वाला अपनी तबियत से निश्चित कर ले।हम तो खालिस मिजाजे-चायखोर हैं, जैसे हमारी चाय एकदम खालिस हिंदुस्तानी किस्म की बनती है।भले कितने तरीकें के चाय बनाना ईजाद कर लिया हो दुनिया ने।तो अपनी तबियत, अपने मिजाज और अपने तरीकें से पीए हर कोई एक कप चाय।किसी के एक कप चाय के तरीके पर कोई रोकटोक ठीक नहीं।यूं भी हर बात पर नियम लादना ठीक नहीं।दुख से भरी दुनिया में एक कप चाय ही तो अपना होता है हाथ में आने के बाद,उसपर इतना चिंतन ठीक नहीं।वैसे भी जब चाय पीने का यह भी एक बहाना हो कि”सब ठीक हो जाएगा,चलो एक कप चाय पीकर आते हैं”।
कभी ज़ब इस बात की चिंता होती है कि चाय पीना बढ़ती उम्र में ठीक नहीं।और मुझ जैसे व्यक्ति को जिसे बुढ़ापे से बेइंतहा डर सताता हो,तब छोड़ ही देना चाहिए चाय।लेकिन फिर ख्याल आता है जब पुराने दोस्त मिलेंगे तो क्या कहूंगी कि चलो कहाँ चलें!या वह पूछ बैठे कि तुमने चाय छोड़ दी भला क्यों?तो क्या ज़वाब दूंगी?जबकि वक्त मोहलत नहीं देता अब पुराने दोस्तों से मिलने का तब तंगी-ए-वक्त में दुख के राग छेड़ने से बेहतर है एक चाय पी लेना।
मैं जानती हूँ चाय छोड दूंगी तो ‘बहने’ कहाँ सब मानेंगी चाय पिलाने से!उनके भी सवाल अलग,सो बेहतर है एक कप चाय पी लेना।जाऊंगी जब घर तो स्वागत में भला मेरे चाय पीए,भाभी कैसे यकीन करेंगी कि मैं ठीक हूँ!वैसे भी मन-बेमन,सर्दी-गर्मी में इनसबको चाय के लिए हां कहना छोटी बात नहीं है,यह एक कोड किए गए भाषा का उत्तम उदाहरण है जिसका वास्तविक अर्थ होता है,चाय पीने के लिए पूछना मानो वह पूछ रही होतीं हैं कि तुम मुझे प्यार करती हो?याद तो घर की खूब आती होगी?भले फोन पर कितना सहज रहूं।और मेरे हां का मतलब होता है-बहुत।प्यार और याद दोनों बेपनाह है घर से।वो बात बस इतनी है कि हम कहाँ कह पाते हैं घरवालों से कि हां हम बहुत प्यार करते हैं आपसब से।एक झिझक है हमारे दौर के पीढ़ियों में मोहब्बत के इजहार में।और मेरे जैसे अंतर्मुखी स्वभाव वाले के लिए तो यह और भी कठिन है।तो कहना-सुनना ऐसे ही होता है कुछ पसंदीदा व्यंजन बनाने-खिलाने से लेकर एक कप चाय तक।तो चाय सिर्फ चाय होती तो छोड़ देते।यह तो प्रेम करने और जताने का एक आत्मीय उपाय है।अपने आप में एक पूरा प्रेमपत्र है चाय का एक कप।
यह भी कि जब लौटूंगी अपने शहर तो बनारस की गलियों में बेसबब कैसे भटकूंगी!ठौर के लिए चाय के दुकानों का सहारा तो चाहिए।और फिर भला किस बहाने लंका पर बैठकर ढूढूंगी आते जाते लोगों में वो एक चेहरा, जिससे मैं पूछना चाहती हूं”मेरे साथ एक कप चाय पीओगे ?
मैं इसलिए भी नहीं छोड़ पाती चाय कि जब मेरे सब छात्र कक्षा से बाहर हों तो मैं एक कप चाय के बहाने और एक कप चाय के साथ उन्हें पढ़ा सकूं एक कप जीवन का पाठ ।क्योंकि कक्षाएँ केवल चारदीवारियों में हो,यह भाता नहीं मुझे।दिली-तमन्ना है कि चाय पीते पीते बता सकूं उन्हें कि लोक को और लोक की संस्कृति को बचाने के लिए आवश्यक नहीं कि क्रान्ति का रंग लाल ही हो।और यह भी कि नारे लगाना ही सुबुत नहीं है देशभक्ति का।जब-तब लगाए जाने वाले खोखले नारे मुझे चुभते हैं।और यदि मेरे बच्चे लगाए भारत माता के जय के नारे तो वह कोरे अहंकार और अज्ञान से ग्रसित होने के बजाए ज्ञान रस से परिपूर्ण हों।इसीलिए मैं जीवन के आखिरी क्षणों तक पीयूंगी चाय कि मैं मरते मरते पढ़ाती रहूं पाठ जीवन का,पाठ राष्ट्रीयता का,और एक कप चाय पीते पीते मैं गढ़ सकूं राष्ट्रीय चरित्र को ताकि वे गढ़ सकें एक नया पथ आलोक का,जिससे आलोकित हो सके फिर से जीवन भारतीयता का,भारतीय सभ्यता-संस्कृति का।
यद्यपि कितना दुखदाई है चाय खुद से बनाकर अकेले पीना।पर ये चाय ही है जो जैसे जैसे घूंट उतरता है हलक के नीचे,अंदर का खालीपन भरता जाता है खाली होते कप में।शायद इसीलिए जब चाय में डालने के लिए अदरक या मसाले कूटती हूँ तो खूब मन से और देर तलक कूटती रहती हूं, मानो अदरक न हो,गोया मेरे सब दुख दर्द हों वें।सब गुस्सा, खीझ,उतार देती हूं कूटते समय और इन सबको मिलाकर चाय में डाल देती हूं कि चीनी अगर भूल से अधिक पड़ भी गया हो तो स्वाद चाय का संतुलित हो जाए।और इस तरह एक कप चाय बनाते बनाते मैं खुद को पढ़ाना चाहती हूं पाठ जीवन का। कि ज्यादा मीठा होना ठीक नहीं।इसलिए चीनी जरा कम ही डालती हूँ।वैसे भी जीवन में मीठा बनकर ठगे जाने से बेहतर है कसैला बनकर अपने रस्ते रहना।इसीलिए चायपत्ती थोड़ा अधिक ही डाल देती हूं।यूं भी लसलसे मीठेपन से बेहतर है कसैला होना।जरूरी तो ये है कि जो भी हों उसमें मिलावट न हो।इसलिए दूध में बस उतना ही पानी होता है जो चाय को खौलाते वक्त जलकर बना सके खरे सोने सा,सोंधे स्वाद सा एक कप चाय।सोचती हूँ,छुट्टियों का दिन हो,सुबह हो कि जल्दी जल्दी बीतता शाम,उदास सी दोपहरी हो या रात घनेरी,कागज हो,एक कलम और एक कप चाय,या फिर एक किताब,जिंदगी जीने के लिए इससे अधिक की अब चाह नहीं।बस ये चाह रह गई है मन में कि जीवन के आखिरी क्षणों में यदि मृत्यु मोहलत दे और आखिरी इच्छा पूछे तो कहूँ कि “रूको,घाट किनारे से एक कप चाय पीकर आती हूँ, फिर चलती हूँ।”शायद इसीलिए जब से मृत्यु बोध ने ग्रस लिया है, मैं लौट जाना चाहती हूँ जल्द से जल्द अपने शहर।
मुझसे अमूमन जब कोई चाय के लिए पूछता है तो मैं मना नहीं कर पाती।सामने वाला सोचता होगा कि मैं सह्रदय हूँ।ये ठीक भी है, क्योंकि जब भी कोई चाय के लिए पूछता है तो लगता है कि एक कप चाय पीने के लिए मना करके मैं कैसे भला तोड़ूँ इसका दिल!दिल तो दिल है जरा सी बात पर टूट जाता है।तो मैं हामी भर देती हूं मानो मेरे पास और है क्या देने को एक कप चाय पर साथ के सिवाए।एक यही चीज है मेरे पास देने को साथ,विश्वास।वैसे भी चाय का एक कप गांव के एक बूढ़े,अनुभवी दरख्त सा होता है, जिसके छांव तले रूककर हमसब थोड़ी देर सुस्ता लेते हैं।।
तो अबकी जब चाय बनावें-पीएं तो खूब रूचि लेकर,खूब तफसील से,मोहब्बत से,कि जिंदगी एक कप चाय बराबर तो सुरूचिपूर्ण हो।।
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