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कोरोना काल…


कोरोना, भाग—1
जबकि पहले यह सोचती थी कि इतनी बड़ी दुनिया में मेरा कौन है!और तब उत्तर तुम्हारे साथ में ही मिलता था कि जिसके पास तुम हो,उसे फिर और किसी की जरूरत ही क्या है।।
पर अब इस के उत्तर में अनंत तक फैला गहन अंधेरा ही है।
जबकि हर किसी का,बिछुड़े-मिले,गैर-अपने, रूठे-बिछुड़े सबका फोन आया कि कैसी हूँ मैं, मैं तो अब भी तुम्हारे फोन के ही इंतजार में हूँ।खुद पर तो इतना विश्वास ही नहीं रहा कि तुमको फोन करने के लिए फोन लेकर भी तुम्हें मिला सकूं!
पर सुकून है इस बात का कि तुम मुझे बिल्कुल ठीक से भूल गये हो जैसे कि मेरा अस्तित्व दुनिया के उन लोगों के जैसा ही है कि जिनके होने का न पता,जिनके न होने से कुछ फर्क नहीं अन्तर्मन पर।।
प्रलय के पल-क्षण भी अब हमें नहीं मिला सकते!
यह ठीक भी है कि जब दोस्ती के नाम पर मैने सब तुम्हारी स्वतंत्रता का हरण कर लिया था शायद और कि तुम्हारे प्रति अपने कर्तव्यों को ठीक से जान ही न पाई थी मैं!!
नहीं, ये प्रलाप इसलिए नहीं कि तुम सहानुभूति का एक कण भी मेरे लिए रखो,यह तो बस इसलिए कि नामूमकिन हो जाता है रोकना कुछ कहने से,जब अवसाद की नदी उछाल देती है अपने पीड़ा और स्मृति की बूंदों को इस तरह कि वह रूप धर लेती है शब्द का और रख देती हूं मैं तुम्हारे सामने  प्रार्थना समझकर कि शायद संवाद के इन एकतरफा क्षणों पर थमकर,समय इन शब्दों को चुनकर,आने वाले अपने क्षणों संग लेता आए मेरे लिए शांति, मुक्ति और इस प्रश्न का उत्तर कि तुम कैसे हो,स्वस्थ और प्रसन्न तो हो न!!

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