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स्वरूप से अनभिज्ञ व्यथित ह्रदय

 

मनुष्य एक चेतन प्राणी है तथा वह सदैव अपने अंदर एक चेतनशक्ति की अनुभूति करता है।उसकी यही विशिष्टता उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है और व्यथित भी किये रहती है।अपनी विचारवान् प्रकृति के द्वारा वह ब्रह्मांड में विद्यमान विभिन्न प्रकार के कौतूहल एवं समस्याओं से खुद को अलग नहीं रख पाता है तथा इससे प्रभावित भी होता है।इन विभिन्न मानवीय समस्याओं में चाहे वह धार्मिक हो,राजनैतिक हो,मनोवैज्ञानिक हो,सांस्कृतिक हो,या अन्य प्रकार की, इन सभी समस्याओं में जो वास्तव में प्रमुख और चेतना के केन्द्र की समस्या है, वह है- स्वयं के अस्तित्व तथा स्वरूप की समस्या।
अतः मनुष्य के स्वरूप के उद्घाटन हेतु विश्व के समस्त दार्शनिकों, चिंतकों,साहित्यकारों द्वारा विचार और शक्ति का व्यय किया जाना सरलतया समझा जा सकता है और यह आवश्यक भी है दग्ध और विक्षिप्त ह्रदय की शांति हेतु।। इस तरह के चिंतन में मनुष्य के आत्मरूप पर विचारणा के संदर्भ में  प्रायः विचार की सभी विविधताये जो आत्म के संपूर्ण निषेध से प्राम्भ होकर आत्म को ही समस्त यथार्थ का मूलाधार और केंद्र बनाने पर समाप्त होती है,विशेषतया इस तरह की आत्मयात्रा भारतीय संदर्भ मे स्पष्टतया परिलक्षित होती है
इस यात्रा में मनुष्य जब कभी अपने ही रचे संसार को साक्षी भाव से देखता है तो प्रमुखतः जो प्रश्न उठता है कि”मैं कौन हूँ”और जो सर्वप्रथम उत्तर मिलता है कि मैं एक सचेतन प्राणी हूँ।तब उसे यह भी पता चलता है कि मानवीय आत्म अथवा चेतना से बाह्य कोई वस्तु है तो उसका होना उसी सीमा तक है, जिस सीमा तक वह मानवीय चेतना से सम्बद्ध है।तब नाशवान वस्तुओं से भरे संसार में वह स्वयं केवल एक वस्तु न बन कर रह जाय,इसलिये स्वयं की खोज में रत होना आवश्यक है।
इस खोज मे भारतीय दार्शनिकों ने अनुभव किया कि मनुष्य से आत्मा तक पहुंचने और फिर स्वयं को जान लेने की हमारी  प्रत्यक्षमूलक गवेषणा एक सफल पद्धति नहीं हो सकती।अतः स्व को जानने के प्रयास,पद्धति और यात्रा में भारतीय दार्शनिकों की विशेषता मुख्यतः “आत्मानं विद्धि” अर्थात “स्वयं को जानो” है।जिसे साक्षी भाव या दृष्टा होने के रूप में भी समझाया गया।।
अपने को जानने के यात्रा में इस दृष्टा के स्वरूप को लेकर भारतभूमि के दार्शनिकों, ऋषियों की जो प्रमुख और उच्चतम उद्घोषणा रही, वह उसे “सत्,चित्,आनंद” इन तीन भावात्मक पदों से बताने का प्रयास करते हैं।सीमित देह,इन्द्रिय, अंत:करण में बिद्ध जो विकल स्व या आत्म है, जो शुद्ध चेतना है, उसका स्वरूप यही “सच्चिदानंद”है।मनुष्य(आत्मा या चेतना) सत् है क्योंकि वह अपरिवर्तनीय है।वह चित् है अर्थात अचित् या जड़ नहीं है।वह आनंद रूप है, दुखरूप या दुखाभाव रूप मात्र नहीं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि आत्मविषयक तीन मुख्य धारणा है कि हम शरीर मात्र है, अतः नष्ट होने वाले हैं।हमारा ज्ञान सीमित है और हम मर्त्यरूप हैं जो नाना दुखों का कारण है अथवा हम संसार में चारों तरफ दुख से घिरे हैं।अतः मनुष्य के स्वरूप गवेषणा मे उपरोक्त भ्रांति का निराकरण “सत्,चित्,आनंद”( ये तीन  पद जो उच्चतम और पूर्ण हैं,) इन तीन पदों से होता है।
अब स्वरूप को जानने की ओर मन उन्मुख हो,इसकी प्राथमिक आवश्यकता है विकलता।(शास्त्रों में इसी विकल मन वाले पुरूष को मुक्ति का अधिकारी बताया गया है)चेतना के सभी स्तरों में,प्रत्येक प्राणी मे एक रिक्तता, एक अभाव का अनुभव है,परंतु जिसे दूर करने हेतु,कुछ पाने, जानने की एक व्याकुलता भी किसी-किसी संवेदन मन की चाहना है ,जिसे पाये  बिना,उस” कुछ “के बिना वह विकल है।।तब अनेक जन्मों के संपूर्ण पुण्यों के एकत्र होने के किसी अमृतसम क्षण में यह बोध उत्पन्न होता है कि यह विकलता या दुख,बेचैनी स्व को सीमित रूप में देखने के कारण है।वस्तुतः तो चेतनमनुष्य काल के किसी क्षण अकस्मात लुप्त होने वाला,अज्ञ,और दुख रूप नहीं है… वह जो है वह”सच्चिदानंद” ही है।
अब इस दीर्घतम् विवेचना में प्रश्न तो अनेकानेक पुनः उत्पन्न होगा,जब तक ज्ञान अनुभव या बोध में परिणत नहीं हो जाता।परंतु जो सर्वोत्तम प्रश्न और चिंतनीय बिंदु है, वह यह कि सीमित मनुष्य की यह सत्,चित्, आनंद तक के आत्मस्वरूप तक पहुंचने की “बोधयात्रा”  इतना सहज-सुलभ नहीं।इसके लिए कठोर निर्णय,साधना करना होगा।भवसागर से पार होने की यह साधना रूपी नाव क्या हो,और किस विधि उपलब्ध हो, यह जानना भी सर्वाधिक ज्वलंत और प्राथमिक आवश्यकता है एक विकल ह्रदय के शांति-मुक्ति हेतु…..
तब तक इस बेचैनी रूपी अग्नि में जलते रहने के लिए हम अभिशप्त हैं।।
परंतु मुक्त होने की प्राथमिक शर्त भी यही है कि आप व्याकुल हों,बेचैन हों!! यदि मनुष्य व्याकुल-बेचैन हैं तो बधाई का पात्र है कि वह इस अभिशप्तता की अग्नि में जल रहा है।यह भी पुण्य कर्मों के उदय का ही प्रतिफलन है।बस इस अग्नि को जलाये रखना है कि अगला पथ प्रकाशित हो सके,खुद को जलाये रखने के इस यज्ञ से।।न कि इस अभिशप्तता की अग्नि को बुझाने का जतन हो।यह चेतन मानवीय अस्तित्व को वस्तु मे परिणत करने का सबसे क्रूरतम जतन होगा!!!
“कुछ शेष सदैव रह जाता है, जब तक अंतिम लक्ष्य न सधै”
        “तब तक ह्रदय की बेचैनी के साथ संवाद पर विश्वास बनाए रखना पड़ेगा।”

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