Skip to main content

भारतीय दर्शन:अन्तर्मन की एक यात्रा

 मैं ऋग्वेद के नासदीय सूक्त की वह 'इच्छा' हो जाना चाहती हूँ ,

       जो हर जगह व्याप्त अंधेरे से सृजन की ओर ले चले।

मैं उपनिषदों की ज्ञान गंगा बनना चाहती हूं,
जिससे विचार की प्रत्येक धारा प्रवाहमान हो सके।
मैं जीवन का आनंद लेना चाहती हूं, मैं चार्वाक होना चाहती हूं।
पर फिर मैं बुद्ध और महावीर बनना चाहूंगी,
ताकि दुनिया में फिर से करूणा का संचार हो सके।
मैं कपिल का सांख्य होना चाहती हूं कि,
दुनिया जान सके कि प्रकृति के बिना...
पुरूष चेतन होते हुए भी निष्क्रिय ही रहता है।
बनने के लिए विजेता खुद को जीतना चाहती हूं,
अपनी साधना से अपनी कमजोरियों पर विजय चाहती हूं,
मैं पतंजलि का योग होना चाहती हूं।
मैं गौतम-कणाद का  न्याय-वैशेषिक बनना चाहूंगी, कि जीवमात्र ही नहीं जड़ के भी अस्तित्व को...
उसकी पूरी गरिमा के साथ स्वीकार कर सकूँ।
मैं जैमिनी की मीमांसा भी बनूंगी,
जहां स्वर्ग मिलेगा...
वह भी बिना ईश्वर के, स्वयं के प्रयासों से,
जहाँ अपनी ज्ञानशक्ति पर भरोसे की प्रथम किरन फूटती है।
पर ये सब बनने के लिए मुझे चाहिए भक्ति की शक्ति, जिसके लिए मैं रामानुज भी बनूंगी और निम्बार्क भी,
कि "राधाकृष्ण"के अलौकिक लीला को देख,जीवन धन्य कर सकूं।
मैं मध्व भी बनना सीखूंगी ताकि..
दूसरे के अस्तित्व को उपेक्षित नहीं करूँ।
पर अंततः मैं शंकर हो जाना चाहती हूँ।
सारे द्वैत, प्रपंच और उससे उपजे़ भय से मुक्त,
मैं अद्वैत हो जाना चाहती हूँ ताकि खुद के बारे में जान सकूँ कि "अहं ब्रह्मास्मि।
मैं दर्शनविहीन किसी चेतन-जगत में दर्शन का कोई पाठ हो जाना चाहती हूँ।।

Comments

Popular posts from this blog

ए धरती माई!ए अकास देवता...

अबकी जब जाऊंगी गांव ... सबसे पहले जाऊंगी कुल देवी के दुआरे...लेटकर करूंगी पलग्गी,रोऊंगी दिल खोलकर वहीं लेटे -लेटे, अपने आंसुओं से जब बुझा लूंगी हिय की प्यास और कुल के देवी से कह दूंगी सारे दुख तब जाऊंगी बाबूजी के घर... घर जाने के रस्ते में पड़ती है वह नदी जिसके किनारे बैठकर बचपन में देखती थी सूरज को डूबते,बत्तखों को तैरते... मैं कहूंगी नदी से,किनारों से,मैं तैर न पाई और डूब गई माया में जबकि तुम्हारे किनारे बैठ देखा था बत्तखों के झूंड को तैरते हुए...ओ तटिनी !....रो पड़ूंगी अंजुरी में पानी भरते हुए कि मैं तो लौट आई थी,बचपन यहीं कहीं छूट गया है तुम्हारे किनारे..अब छूट गया तो संभाल कर रखना,अगले जनम लौटा देना ,यही बचपन,यही किनारा,यही गांव,वही अम्मा-बाबूजी... घर में जब प्रवेश करूंगी भाभी के सांझ बारने तक भटकती रहूंगी एक कमरे से दूसरे कमरे,ओसारे से रसोई तक लगाऊंगी दौड़...झांक झांककर लौट आया करूंगी अम्मा के हाथ का बना मिट्टी का चूल्हा... देखूंगी स्टील का बना कोठिला और याद करूंगी अम्मा के हाथों बने मिट्टी के कोठिला को...मिट्टी का कोठिला ढह गया...मिट्टी की देह भी ढह जाएगी...यही सोच -सोच थक कर धं...

गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

उस लड़की के घर में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था।उसके पिताजी का कथन था कि ये दो दिन तो राष्ट्रीय पर्व का दिन है।पिताजी अन्य त्यौहारों पर भले उत्साहित रहें न रहें‌ अथवा मां के कहे अनुसार भोजन तथा अन्य त्यौहार अनुसार सामग्रियां लेकर आतें किंतु स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे बिना कहे भोजन सामग्री ले आतें और मां को बनाने को कहते।सुबह-सवेरे ही घर में टेलीविजन खुल जाता और दोनों दिनों के ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रम तथा गणतंत्र दिवस पर होने वाली विभिन्न झांकियों का पूरा परिवार मिलकर आनंद लेतें।जाहिर सी बात है कि वैसे माहौल में कौन भला होगा जो सोया रहे। पिताजी बराबर सब भाई-बहनों को सुबह जल्दी उठकर टेलीविजन पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए कहतें।किंतु वह‌ लड़की उस माहौल में भी सोई रहती।मां डराती कि उठ जाए अन्यथा पिताजी नाराज़ होंगे।किंतु वह लड़की इतना ही कहती कि वह एक दिन वहां उपस्थित होकर इन‌ दो दिनों के कार्यक्रमों को देखेगी और वह भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में उसे अवसर मिलेगा और तब तक वह टेलीविजन पर नहीं देखेगी।मां इस बात से खी...

आत्म-समीक्षा के दिन...

 भारतीय दर्शन में या यूं कहें कि विश्व दर्शन में कुछ अवधारणाएं ऐसी हैं जिनपर दो पक्ष है किंतु अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। यदि ज्ञान का विस्तार करें तो विज्ञान भी इसमें सम्मिलित है। किंतु क्योंकि मैं दर्शन की विद्यार्थी हूं तो दर्शन पर अपनी बात केन्द्रित करती हूं।इन तमाम अवधारणाओं में है - आकाश,समय ,दिशा,कारण-कार्य,कर्मनियम, पुनर्जन्म इत्यादि। विसंगति यह है कि रोजमर्रा के अपने जीवन में मैं नितप्रति इन अवधारणाओं की संकरी गली से गुज़रती हूं। किंतु एक तो ज्ञान का प्रकाश कुछ मद्धम है मुझमें तो रोज़ ही डूबना-उतराना होता है। मैं जब इन प्रश्नों से निजात पाने की सोचकर वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करती हूं तो पाती हूं कि इस मल्टीमीडिया सेट जैसे समय में मैं तो बटन टिपने वाली मोबाइल जैसे हूं। दूसरे, शब्दों में कहें तो समयानुकूल नितांत अयोग्य हूं। मैं जो वर्तमान में हूं, यदि वह‌ नहीं होऊं तो मुझे और कुछ भी नहीं आता है।तब मैं पुनः घबरा कर अपने कमरे में पड़े किसी दार्शनिक अवधारणा को उठाती हूं और उसपर चिंतन करने का अभिनय करती हूं। किंतु यह अभिनय मुझे मुंह चिढ़ाता है कि ऐसा अभिनय...