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कोरोना काल…

 

कोरोना काल…

कोरोना, भाग —2
जबकि यह हरापन प्रकृति की विशेष विशेषता है,घर-गृहस्थी-नौकरी के चक्कर में फंसा आदमी कहाँ देख पाता है यह प्राकृतिक रंगों का शेड!अहा!प्रकृति के पास हर रंग के कई रंग है।यह समय मानो अदृश्य विषाणु से न केवल मानवजाति अपने बस्तियों को सैनेटाइज कर रहा हो बल्कि प्रकृति भी खुद को सैनेटाइज कर रही है।आखिर हमने उसे दिया भी क्या सिवाय कानफोड़ू ध्वनि के, विषैले गैसों के,धूल-धक्कड़ के।प्रकृति का कोई रूप बच तो न रह गया संक्रमित होने से!हमारे अंधाधुंध विकास करने की वृत्ति के विषाणु से,प्रकृति के ऊपर मानव को विजित दिखाने के अहंकार रूपी विषाणु से!हर नवजात पत्ता जैसे किलकारियां मार रहा है और इस बदले बयार का आनंद ले रहा है!चहक-चहक कर खुशी जता रहे हों जैसे मुझसे अपनी।विशाल तना गंभीरता ओढ़े भी कुछ सुकून की मुद्रा में था मानो जीवन में कोई तो क्षण आया;जब खुली हवा में सांस ले सका हमें श्वासदायिनी वायु देने वाला वृक्ष।सूरज की किरणें जिस भी पत्ते पर पड़ रही थी,वह चमक रहा था चांदी जैसा!अहा!मैं इस हरेपन को,पेड़ के हर पत्ते के इस उल्लास को,चहकने-प्रफुल्लित होने को मानो आंखों में, ज़ेहन में बसा लेना चाहती हूं।पता नहीं मायामहाठगिनी और मेरा व समष्टि का अहंकार फिर कभी यह अवसर दे कि न दे!!

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गणतंत्र दिवस और उस लड़की के स्वप्न...

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बरेली

 वर्ष 2011 - 12 की बात है;तब संघर्ष के दिन अपने पूरे यौवन पर थें।उन्हीं दिनों में बहन के घर से (बहेड़ी) जो उन दिनों डेरा था मेरा, से कार्यस्थल (बरेली) तक (जिसकी दूरी करीब पैंतीस किमी थी) रोज़ आना-जाना होता था।यात्रा का साधन कभी बस और अधिकतर रेलगाड़ी होती थी बहेड़ी से बरेली तक की रेलगाड़ी की यात्रा में करीब छोटे-छोटे सात-आठ स्टेशन पड़ते थें।किंतु मुझे उनमें बस एक ही नाम स्मृति में रहा,इज्ज़तनगर। स्मरण रहे जाने के दो कारण थें -एक तो नाम में ही जिसके इज्ज़त हो,उसे न याद रखना एक तरह से विश्वासघात ही होता अपने अतीत से और दूसरे इस स्टेशन या कहें छोटे से स्थान का स्थानीय लोगों द्वारा उच्चारण।वे इसे ऐजेडनगर कहकर बुलाते।अब भी बुलाते हैं,नहीं पता।मैं घर आकर अक्सर इस बात की खीझ बहन के सामने उतारती कि अच्छे भले नाम को लोग क्यों बिगाड़ते हैं!खैर, उन दिनों इस स्टेशन की हालत मुझ जैसी ही थी!समय का तंगहाल दौर!कमतरी के दोपहर,विषाद में डूबीं रातें,पीड़ाओं में आकंठ डूबा देह और मन।दोनों के बेतहाशा तपने के दिन थें। मौसम कौन सा रहे,इससे अंतर नहीं था। उन्हीं दिनों,घर से कार्यस्थल जाते समय ट्रेन में जब कभ...