
आप बनारस के किसी कोने के निवासी हों सकते हैं और जो बाहर से आने वाले श्रद्धालु हैं, अगर दोनों को ध्यान में रखा जाए तो यह यात्रा आरंभ होगी चौक से।चौक पर आते ही एक गली जाती है जिसे देखकर ही आप समझ जाएंगे कि आपके गंतव्य तक यही गली ले जाएगी। क्योंकि गली दोमार्गी है,जिसके दाहिने ओर प्रत्येक पल पुलिस मिल जाएगी चौकसी पर। किन्तु उधर नहीं जाना है, हम मुडेंगे बायीं ओर। इसके बाद का मार्ग मैं बताने में असमर्थ हूं कि जो नवागंतुक है वे किस गली से आगे बढ़े! आप स्थानीय सहायता ले सकते हैं और पूछते हुए चलते जाइए मगन होकर।यूं ही बनारस को गलियों का शहर नहीं कहा गया है!
मैं बात कर रहीं हूं काशी स्थित उस सिद्धपीठ की जिन्होंने धार्मिक मान्यताओं अनुसार जगत के नाथ बाबा विश्वनाथ की व्याकुलता हर ली थी, जहां पांडवों ने एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी, जो भक्तों के संकट को हरने वाली हैं! जी,मैं बात कर रहीं हूं माँ संकठा भवानी की। जिनके नाम पर ही समीप स्थित घाट का नाम भी संकठाघाट है।
पौराणिक और धार्मिक मान्यता आप सब को गूगल बाबा तो बता ही देंगे। किन्तु वह अनुभूति जो एक भक्त को होती है, वह तो कोई जगा चेतस मन ही बता सकता है। देखने में कोई ऐसी सुन्दरता नहीं है मंदिर की कि जिसकी मैं झूठ-मूठ बखान करूँ किन्तु व्याकुल मन से प्रवेश करते ही जो अनुभूति होती है, वह बताने में असमर्थ हूं।कहते हैं कि यह मंदिर इतनी जागृत है कि आप माँ से मांगिये, आपको अवश्य मिलेगा किन्तु आप माँगना नहीं चाहते तो भी समस्त यंत्रणा और वेदना माँ की मूरत देखने मात्र से दूर हो जाती है मानो।
आंखें बोलती भी हैं, देखना हो तो सब विस्मरण कर माँ की आंखें देखिए,चुपचाप मुस्कुरा कर कोई आपकी सब बातें सुन ले और बंद होंठों से ढांढस दे, जबकि आपने कुछ न कहा हो तो रूककर माँ के मुख को देखिए! और जो और भी भव्य रूप देखना हो तो आरती के समय आइए, माँ के मूरत पर जब जब आरती की थाल का प्रकाश पड़ता है, प्रतीत होता है माँ कितनी प्रसन्न है अपने भावों से भरे भक्तों को देखकर।
जबकि आधुनिकता और भौतिकता की चकाचौंध सब हृदय के भावों को काठ मारने के लिए प्रतिपल तत्पर हो।
न जाने क्या बात है कि माँ को स्मृत कर रोना आता है और जब मन किसी परेशानी में हो तो माँ का मुख ही दिखता है हरदम चाहे आंखें बंद हो या खुली। सच कहूँ तो किसी को याद कर इस तरह फुट कर रोना जब अम्मा-बाबूजी को याद करती हूं तभी आता है। सोचती हूं कि माँ सबकी मन्नतें पूरी करती हैं तो मैं कुछ मांग लूँ! अबकी सोच कर भी गई थी कि ये तो अवश्य ही मांग लूँगी पर आवश्यकताएं तो बहुतेरे हैं! यह सोच रास्ते में सूझा कि माँ से तो कुछ छुपा नहीं है वह आवश्यकतानुसार देगी ही! कुछ मांगकर क्या ही उसे परेशान करूँ। तो बस यही कहा कि सद्बुद्धि दे,कर्मशील रहूँ और अपनी शरण में रखना।( जबकि मेरे घर में ही माँ ने एक बार संकट में पड़े मेरे भैया और भांजी के दुःख दूर किए हैं)
पर सम्भवतः इसबार थकान कुछ इस तरह मन के संघर्षों का मस्तिष्क पर हावी था कि मंदिर से निकलते समय न जाने क्या शरारत सूझी और कहा कि जब इतनी याद आती हो तो क्यूँ नहीं ऐसा करती कि जब तुम्हारा दिन हो अर्थात् शुक्रवार तो प्रत्येक शुक्रवार को आकर तुम्हारी आरती भी देखूँ और तुमसे भेंट भी हो जाए!😊
यूँ मैं ईश्वर की सत्ता के संदर्भ में इतनी भावुक नहीं हूं! पूजा-पाठ के संदर्भ में अड़भडंगी हूं, काशी से जो हूं।😊जब-तब दार्शनिक कीड़ा काटता है तो तर्कों के बाण से स्व के आस्था का ही भेदन करने लगती हूं किन्तु मेरी समस्त अज्ञानता, अहंकार, समझदारी इस घाट पर आकर बह जाती है और मैं माँ के मंदिर में इस तरह प्रवेश करती हूं मानो मेरे प्राण माँ के भक्ति से प्राणवान है। मैं और कुछ नहीं एक निरीह भावुक प्राणी हूं जिसे मालूम है कि यहां आते ही हिय की व्याकुलता समाप्त होगी ही।
य़ह व्याकुलता पुनः हावी होगी, पुनः माँ के यहां आऊंगी और कभी ऐसा होगा कि माँ फिर अपने पास से नहीं जाने देगी, सदैव अपने पास रख लेगी।।
अगर बुद्धि, तर्क, चंचलता को कुछ क्षण त्याग सकते हैं तो वाराणसी आने पर एक बार माँ के प्रांगण में अवश्य जाएं।।एक बार आरती में अवश्य सम्मिलित हों।।
जय मां संकठा भवानी की...🙏🙏🙏
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