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प्रिय मित्र

प्रिय मित्र,

               सदैव प्रसन्न रहो।

यूँ तो शहर आना अब त्यौहार पर ही होता है लेकिन जब भी लौटते हैं,घर से निकलने में भय लगता है कि कहीं तुम न दिख जाओ!जबकि तुम्हें देखने का इतना मन होता है कि जी करता है अभी ट्रेन पकडूं और तुम्हारे कमरे के दरवाजे पर सीधा दस्तक दूँ और बस देखकर फिर लौट जाऊँ।लेकिन अजनबी की तरह तुम किसी मोड़ पर दिखो,ये सोच भी नहीं पाती क्योंकि यूँ अजनबी देखकर प्राण तो न निकलेंगे किन्तु उस तरह देखने के बाद जीवन जीना एक असाध्य रोग की तरह होगा।
अभी ही क्या कम दुश्वारियां हैं!क्या होता कि हममें तुममे बस इतना सा नेह का धागा होता कि तुम 2-3 दिन में एक बार फोन करके हाल पूछ लेती!कभी मुझसे कहती कि आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है!कभी दिन में दो बार फोन करती और कहती कि बात करने की बहुत इच्छा हो रही है तुमसे!मैं बीमार होती तो आवाज तुम्हारी भारी लगती!जब तब बुलाती शहर,भले समय न दे पाती और हम दोनों कहते कि कितने व्यस्त हो गए हैं हम!
जब 'बच्ची' कहकर बुला लेती और इतने भर से मेरे दुःख उड़ जाते!मैं तुमसे कुछ जरूरी सलाह मांगती!जो घबराती किसी बात पर तो तुमसे कहकर कि कैसे और क्या करूँ?,कुछ हिम्मत पाती।क्या बताऊँ!तुम्हारे बिना सबकुछ है,किंतु प्रेम की एक बूंद नहीं है जीवन में।क्या बताऊँ कि एक तुम्हारे होने भर से तरूवर सा जीवन दिन रात तपता सा मरूधर हुआ है एक तुम्हारे न होने से।।क्या कहूँ कि सब सुख मिलकर भी तुम्हारे साथ न होने की वेदना को कम नहीं कर पाते और कर भी नहीं पाएंगे।
हंसती हूं तो भीतर का खोखलापन और उजागर होता है।मुस्कुराऊं तो लगता है हृदयाघात का दर्द उठा है भीतर।क्या कहूँ कि घबराहट में अब कुछ नहीं सूझता!कि साँसे बस अपना दबाव बढ़ा देती हैं।पता नहीं दया में या किसी और कारण से?
मुझमें अब भी टीस उठता है तुम्हारे साथ न होने का!अब भी तुम याद नहीं आती क्यूंकि भुला ही न पाए हैं तुम्हें अब भी।किन्तु सम्भवतः तुम विस्मृत कर चुकी हो मुझे या फिर स्मरण हो आने पर समझा लेती होगी स्वयं को। मैं मोह में थी तभी इतनी पीड़ा है किन्तु मोह के इस धागे से छुटकर इतनी नीरसता है जीवन में कि स्वर्ग का आनंद भी उस उदासी को समाप्त न कर पाए। मैं कोई साधक तो नहीं कि इस मरघटी सन्नाटे को साध पाऊँ!
मैं बेहद साधारण व्यक्तित्व हूँ जिसने बस ये जाना था कि विश्वास और प्रेम दो,तो बदले में वही वापस मिलता है। किंतु न जाने कैसे मेरे पिछले जन्म के कर्म हैं कि हर बार प्रेम में, मित्रता में सबक ही मिला, ह्रदय का रोग ही मिला।
सोचा था कि बस दो बातें लिखूँगी आज,लेकिन न जाने कितनी बातें हैं मेरे पास।।

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