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रांझणा...

 

एक फिल्म बनाने की इच्छा है रांझणा जैसी!जिसके माध्यम से मुझे बस यही बताना है कि कुंदन हो कि जोया दोनों अतिवादी चरित्र वाले हैं!मैं अपनी इस मान्यता के लिए जब इस दुनिया में तथ्यों को देखती हूँ तो मुझे यही दोनों चरित्र वाले दिखते हैं!

मैंने प्रेम में लोगों को मरते देखा है,घर बार छोड़ते देखा है,पागल होते देखा है,यहाँ तक कि साधु बने भी देखा है,गहरी दोस्ती को किसी के प्रेम में पड़ पीठ में छूरा खाते सुना है,किसी पहाड़ी से धकेल दिया जाना सुना है। पीछे घरवालों को इस अपशकुन का साया जीवनभर घेरे हुए रखना देखा है।इसलिए प्रेम करना बुरा नहीं है,बुरा है प्रेम में कुंदन बन जाना!सब बनना,लेकिन कुंदन नहीं बनना है!जबकि एक दोस्त हो,एक प्रेमिका हो,बनारस जैसा शहर हो,तब तो बिलकुल भी कुंदन बनकर दम तोड़ना गंवारा नहीं करना है। 

मुझे यह भी बताना है कि दुनिया मुरारियों से रिक्त है और मुरारी जैसों की जगह कोई नहीं ले सकता!क्या किया जा सकता है जो इस निष्ठुर प्रपंच संसार में कोई मुरारी जो नहीं मिलता!मिलते हैं तो...।यहाँ खाली स्थान भरने के लिए मुझे मालूम है अनेकों नाम होंगे।इसलिए हम सबको अपने-अपने जीवन का मुरारी स्वयं बनना है।सदैव सबसे पहले स्वयं के लिए खड़ा होना है!दुनिया को खुद को मुरारी बनना ही खूबसूरत बना सकती है।यह ठीक वही बात है जो बुद्ध कहते हैं-'अप्प दीपो भव'। 

मुझे यह बताना है कि भले हम जिसके प्रेम में हों,वो हमें न चाहे तब भी हमें उसे बात-बेबात श्राप नहीं देना चाहिए।क्या जाने कब किसकी जिह्वा से निकली बात सच हो जाए और हमारी चाहत किसी अस्पताल के बेड पर दम तोडे और हमसे देखा भी न जाए!प्रेम करना तो उसका होने में सहाय होना जिसका प्रेम हो जाना चाहे!वह भी चुपचाप!जैसे गंगा बनारस में चुप्पी साधे बहती हैं। 

      मुझे यह भी बताना है कि जोया जैसा महात्वंकाक्षी होना कतई बुरा नहीं है!बुरा है एक जीते इंसान को सीढी़ बनाना!बुरा है प्रेम में सबकुछ हार जाने वाले को जिंदगी की बाजी यूँ बेमुरव्वत हार जाने देना!बुरा है प्रेम को जहर बना किसी के देह में,दिल में उतार देना!माता पार्वती के तरह महादेव के कंठ में हलाहल को देह में उतरने से रोक कर कंठ में ही धारण करवा देना,प्रेम के बल से!उसी कंठ के जहर को किसी महादेव के भक्त के देह में उतार देना!वह भी प्रेम के बल से!यह है बुरा।महात्वंकाक्षी होना नहीं होता बुरा।

मुझे यह भी बताना है कि प्रेम बड़ी कोमल सी कोई शय है।इतनी नाजुक कि नाम भर ले लेने से मुरझा जाए।इसकी कोमलता बनी रहे,इसके लिए यही होना चाहिए कि प्रेम नहीं किया जाना चाहिए!जो हो जाए तो जिससे हो,उसे कभी न बताए!बता दे तो स्पष्ट कह दे कि हम दोनों एक दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखेंगे!जो रख लिया तो उम्मीद टूटने पर स्वयं को बिखेरेंगे नहीं!बिखर गये तो खुद संभलने का हौसला रखेंगे!जो हौसला न मिले कभी तो परिवार के पास वापस लौटेंगे,भले नीमबेहोशी में लौटें।

कोई मुरारी हो अगर सौभाग्य से तो उसके पास लौटेंगे‌।कोई बिंदिया हो तो उसे लौटकर माथे पर सजा लेंगे!लेकिन प्रेम में कभी पागल नहीं बनेंगे,साधु नहीं बनेंगे,घरबार नहीं छोडेंगे!और मरेंगे तो बिलकुल नहीं!बल्कि जिंदा रहकर एक चाय की दुकान लगायेंगे जिसका नाम वही रखेंगे जिसके हाथ की चाय सुबह शाम पीने के ख्वाब देखें थें!जो पढ़ लिखकर कुछ बन गए तो लिखेंगे और लिख-लिखकर चेतायेंगे कि सबकुछ करना मगर कुंदन जैसा प्रेम न करना! 

जो ये सब‌ न हो सके तो इसलिए जी उठेंगे कि फिर से वहीं गंगा किनारे महादेव को पुकारने के लिए जी उठेंगे!जी उठेंगे बार-बार अगर घर बनारस में हुआ तो!बनारस की अकड़ को बनाए रखने के लिए जी उठेंगे कि कोई लाखों करोड़ों जोया मिलकर भी किसी बनारसी को हरा नहीं सकतीं!प्रेम में तो कतई नहीं। 

बस यही कहने के लिए एक फिल्म बनानी है कि अपने-अपने निर्जन शहर पर मर जाना लेकिन किसी के प्रेम में मरकर प्रेम की कोमलता नष्ट न करना!यह इतनी नाजुक,इतनी कोमल सी कोई शै है ही कि करने से नष्ट हो जाती है,नाम लेने भर से मुरझा जाती है,छू लेने भर से दूषित हो जाती है। 

इसलिए कुंदन मत बनना,मुरारी मत ढूंढना,किसी बिंदिया का दिल मत तोड़ना,और जोया तो बिलकुल भी मत बनना! 

बस यही बताने के लिए एक फिल्म बनानी है... 

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